<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753</id><updated>2012-02-15T22:56:21.055-08:00</updated><category term='दूषित पानी'/><category term='भोपाल'/><category term='धरती फटने के हालात'/><category term='पानी चोरी'/><category term='जल'/><category term='थिंक आउटसाइड द बाटल'/><category term='हरे-भरे जंगल'/><category term='सिलेबस में शामिल हो जल समस्या'/><category term='उपजाऊ मिट्टी'/><category term='नर्मदा'/><category term='शिवनाथ नदी'/><category term='सरयू नदी'/><category term='गंगा'/><category term='पूंजीपतियों'/><category term='पौधे बताएंगे पानी में कितना प्रदूषण'/><category term='डॉ. महेश परिमल'/><category term='नदियां नहीं बचीं'/><category term='मण्डीदीप'/><category term='अनुवाद'/><category term='सॉफ्टड्रिंक'/><category term='नदी संरक्षण'/><category term='कथा'/><category term='भूमिगत पानी'/><category term='नरहरियानंद तालाब'/><category term='ब्रज फाउंडेशन'/><category term='जल संरचनाओं के संरक्षण'/><category term='जानलेवा बीमारियां'/><category term='दूषित'/><category term='नदियां बचाने की जिम्मेदारी सरकारों पर नहीं'/><category term='पानी की कमी'/><category term='मथुरा'/><category term='नदी जोड़ परियोजना'/><category term='बरसात का पानी'/><category term='पनबिजली संयंत्र'/><category term='पाताल जा पहुंचा पानी'/><category term='हिमनदों'/><category term='राजेन्द्र सिंह'/><category term='खेलगांव'/><category term='भूजल'/><category term='बाली टाइगर'/><category term='पानी का निजीकरण'/><category term='अक्षरधाम'/><category term='शांतनु गुहा रे'/><category term='अलकनंदा'/><category term='ग्लेशियर'/><category term='जल शुद्धिकरण'/><category term='मैंग्रोव'/><category term='पृथ्वी पर प्रदूषण'/><category term='गंगोत्री'/><category term='जल संकट'/><category term='बानगंगा'/><category term='कीटनाशक'/><category term='सकरी नदी'/><category term='करोरन'/><category term='दिल्ली'/><category term='यमुना की सफाई'/><category term='गंगासागर'/><category term='जल-विहीन'/><category term='जल संरक्षण'/><category term='गुलाम'/><category term='हास्य व्यंग्य'/><category term='फटी धरती'/><category term='नर्मदा-ताप्ती को प्रदूषण से खतरा'/><category term='शिमला'/><category term='पानी की समस्या'/><category term='राजसमंद झील'/><category term='बिन पानी सब सून'/><category term='डा. महेश परिमल'/><category term='धंसजामनी'/><category term='भूगर्भ जल'/><category term='चन्द्रायक'/><category term='नदी महोत्सव'/><category term='वर्षाजल संरक्षण तकनीक'/><category term='अनुपम मिश्र'/><category term='पार्वती नदी'/><category term='साफ माथे का समाज'/><category term='भागीरथी'/><category term='पृथ्वी दिवस'/><category term='जल-दान की परंपरा'/><category term='यमुना'/><category term='हिमालय'/><category term='एक-एक बूँद पानी'/><category term='हवा'/><category term='जहरीला पानी'/><category term='पानी का उपयोग'/><category term='उर्मिल'/><category term='घोंघें'/><category term='गाजियाबाद'/><category term='बुंदेलखंड'/><category term='पीने योग्य जल: क्या कहता है भारतीय मानक ब्यूरो'/><category term='सन्‍मय प्रकाश'/><category term='प्रदूषित पानी से मरीं मछलियां'/><category term='सरस्वती नदी'/><category term='कॉर्बेट टाइगर रिजर्व'/><category term='विनीत नारायण'/><category term='अमृत जल'/><category term='अम्लवर्षा'/><category term='कोक'/><category term='सहगल फाउंडेशन'/><category term='विश्व बैंक'/><category term='जलस्रोतों'/><category term='गंगा नदी'/><category term='कांच का तालाब'/><category term='भूजल में संखिया'/><category term='बड़े बांधों से होने वाले खतरों'/><category term='सिटीजन एक्शन ग्रुप'/><category term='आमरण अनशन'/><category term='झारखंड'/><category term='यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन'/><category term='ई- कचरा'/><category term='बहुराष्ट्रीय कम्पनियों'/><category term='पेप्सीको'/><category term='वर्षा जल को अधिकाधिक संरक्षित करें'/><category term='जल त्रासदी दिवस'/><category term='सियाम'/><category term='भागीरथी गंगा'/><category term='इंस्टीट्यूट आफ रूरल रिसर्च एंड डेवेलपमेंट'/><category term='ओस की बूंदों'/><category term='पेयजल को प्रदूषित कर रहे हैं कॉस्‍मेटिक्‍स'/><category term='गोमती'/><category term='पर्यावरण'/><category term='प्रदूषित पानी'/><category term='बृज खंडेलवाल'/><category term='पानी के दोहन'/><category term='प्रकृति का दुश्मन काला पानी'/><category term='मैट्रो'/><category term='पानी डरा रहा है'/><category term='हुगली'/><category term='पानी'/><category term='जावा टाइगर।'/><category term='सीहोर'/><category term='साइबेरियन टाइगर'/><category term='सुंदरवन'/><category term='नदियां'/><category term='पद्मा नदी'/><category term='प्रदूषित पानी से पेट रोग'/><category term='पौराणिक नदी'/><category term='बंगाल टाइगर'/><category term='प्रदूषण'/><category term='सिर पर मटका रखकर पानी'/><category term='जैविक-शौचालय'/><category term='बारिश का ३८ फीसदी जल जमीन के अंदर'/><category term='फट सकता है धरती का कलेजा'/><category term='आयड़ नदी'/><category term='गंगा के अंदर से मेट्रो'/><category term='बालू'/><category term='रेन वाटर हार्वेस्टिंग'/><category term='नदियों के विनाश'/><category term='गोमुख ग्लेशियर'/><category term='काला तालाब'/><category term='स्टाप डेम'/><category term='जल सेना'/><category term='सूखते जलस्रोत'/><category term='पानी की बर्बादी'/><category term='पानी और स्वास्थ्य'/><category term='पवित्र पानी'/><category term='यमुना प्रदूषण'/><category term='जुर्माना'/><category term='दामोदर नदी'/><category term='दिल्‍ली'/><category term='भू-जलस्तर'/><category term='मंदाकिनी'/><category term='अजरुन बांध'/><category term='बागै'/><category term='धरती'/><category term='कोलकाता'/><category term='पौधों की सैकड़ों प्रजातियां हर साल विलुप्त'/><category term='हैलीपैड'/><category term='बोतलबंद पानी'/><title type='text'>सुजलाम- इधर- उधर से</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>118</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3108512178211251184</id><published>2008-09-24T11:09:00.001-07:00</published><updated>2008-09-24T11:12:24.224-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शिवनाथ नदी'/><title type='text'>शिवनाथ के बारे मे…..</title><content type='html'>कुछ वर्ष पहले शिवनाथ नदी बहुत चर्चा में था। चर्चा मे तब आया जब एक प्रायवेट कंस्ट्रक्शन कम्पनी (रेडियस वाटर कम्पनी), जिनके मालिक राजनान्दगाँव के कैलाश सोनी है को सरकार ने नदी का 23.6 कि. मी. का क्षेत्र 22 वर्ष के लिये लीज़ पर दे दिया है और नदी के पानी के उपयोग को लेकर रेडियस वाटर कम्पनी के कर्मचारियों और बान्ध के किनारे के मोहलाई ग़ाँव के लोगो के बीच झड़प हुई। गाँव वालो के मुताबिक पहले तो रेडियस वाटर कम्पनी और दुर्ग कलेक्टरेट की ओर से पानी का उपयोग नही करने के लिये नोटिस मिला और बाद मे कंपनी के कर्मचारी नदी से लगे पम्प को निकालने गाँव पहुचे। मछुआरों के जाल भी काटे जाने लगे। ग्रामिणो के आक्रोशित होने और बाद मे स्थानीय संगठनों के सहयोग और हस्तक्षेप होने के बाद यह मसला पूरी तरह से शांत हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान मे बान्ध के ऊपर की ओर बने गाँव महमरा और मोहलई के लोग नदी के पानी का भरपूर उपयोग कर रहे है। रेडियस वाटर कम्पनी भी किसी को पानी लेने से मना नही कर रही है। किसी को कोई तकलीफ नही है और किसी प्रकार का कोई आन्दोलन नही हो रहा है। लेकिन कल को यह सब फिर हो भी सकता है इसका डर तो अभी भी गांव वालो को है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छत्तीसगढ़ अपने परम्परागत जल संग्रहण के लिये भी जाना जाता है जैसे छोटे-बड़े तालाब, डबरी, कुआं आदि। यहाँ के गावों में बहुत से छोटे बड़े तालाब देखे जा सकते है यहाँ तक कि कई गाँव मे तो 10 से 15 तालाब भी है। जिसका उपयोग खेती के लिये, पशु के लिये, नहाने धोने के लिये और मछली पालन के लिये किया जाता है। लेकिन शिवनाथ नदी के किनारे के इन गावों में एक या दो ही तालाब है। कहीं-कहीं कुएँ भी है। गाँव वाले पूरी तरह से नदी पर निर्भर है। इसके अलावा यहाँ के आसपास के लगभग हर गाँव मे 60 से ज्यादा बड़े एवं छोटे मोटर पम्प और नलकूप है, खेती के लिये और पीने के लिये। बान्ध बन जाने से महमरा और मोहलाई जैसे गाँव के लोग इस गर्मी मे भी भरपूर खेती किसानी कर रहे है और दो फसल ले रहे है, यही नही नदी के किनारे किनारे निजी स्तर पर भारी मात्रा मे बड़े एवं छोटॆ पैमाने पर तरबूज, खरबूज, पपीता, साग-भाजी की भी पैदावारी हो रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन नीचे के गाँव की हालत ऎसी नही है मलौद और बेलौदी जैसे गाँव मे कुछ वर्ष पूर्व जहाँ बड़ी मात्रा मे अमरूद के बगीचे थे वे सब अब धीरे धीरे सुख रहे है। बेलौदी के सरपंच पति ने बतलाया कि यह अमरूद गाँव वालो के लिये आय का एक बहुत बड़ा स्त्रोत था। यहाँ के अमरूद आस पास के राज्यो मे भी जाते थे। उन्होने इस बात से इन्कार नही किया कि जल स्तर में आई गिरावट इसका एक प्रमुख कारण हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऎसे ही नदी के किनारे के एक गाँव कोटनी में एक रपटा का निर्माण हो रहा है लाखों की लागत से जो नगपुरा को सीधे कोटनी से जोड़ेगी और फिर आगे दुर्ग तक जायेगी। यहाँ मेरी मुलाकात सिविल इंजिनीयर से हुई जो पंचायत मे बैठे हिसाब किताब कर रहे थे। शिवनाथ नदी पर उनका कहना था “पानी को बांध देने से गाँव को फायदा ही हुआ है। पहले तो पानी आगे बह जाता था लेकिन अब यहाँ आस पास के किसान बढ़िया से खेती कर रहे है। गर्मी मे तो नदी वैसे भी सूख जाती थी। सरकार की योजना है की जगह जगह चेक डेम बने, तो यह तो अच्छी ही बात है।“ लेकिन उनके पास इस बात का उत्तर नही था कि इन गावों मे तो ठीक है लेकिन अगर इसी तरह कुछ खास जगहो पर ही पानी का पूरा दोहन होता रहा तो उन गावों का क्या होगा जो नीचे की ओर है। साथ ही इस बात पर भी असमंजस्य की स्थिती बनी हुई है कि सरकार तो उस 23.5 कि. मी. के अन्दर के हिस्सों पर भी ऎनीकेट और रपटा बना रही जो लीज़ पर दी जा चुकी है। कल को अगर कम्पनी और सरकार के बीच तनाव की स्थिती आती है तब क्या होगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदी के किनारे छोटे बड़े बहुत से कई ईट भट्टे भी है। कोटनी, पीपरछेड़ी गाँव के आस पास ईट भट्टे है। इनके कारण बड़ी तेजी के साथ नदी किनारे मिट्टी का कटाव हो रहा है। निर्माण क्षेत्र के लिये रेत का भी उत्खनन बड़ी मात्रा मे हो रहा है। इससे काफी बड़े हिस्से मे नदी के दोनो तरफ समतल होना शुरू हो गया है। खेती-बाड़ी के लिये भी किसान, नदी के दोनो तरफ समतल कर रहे है। इससे पंचायत, अधिकारी और स्थायी नेताओं को आंशिक लाभ जरूर हो रहा होगा लेकिन आने वाले समय में नदी का क्या होगा इसकी चिंता शायद किसी को नही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथ ही रसमड़ा मे उद्द्योगपतियों द्वारा नदी के आस पास के पूरे खाली सरकारी और खेती जमीन को खरीद लेना है। इससे रसमड़ा के लोगो का नदी के पानी का उपयोग करना तो दूर, नदी तक पहुँचा भी नही जा सकता। पूरे जगह को घेर लिया गया है। रसमड़ा के ग्रामीण खेत के बिक जाने से खेती भी नही कर पा रहे है, पर्याप्त उद्योग नही लगने से रोजगार भी नही मिल रहा है और स्पंज आयरन उद्योग के कारण प्रदुषण भी स्थानीय लोगो के लिये एक बहुत बड़ी समस्या है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन गाँवों मे केवट, निषाद, ढीमर आदि मछुआरे जाति के लोग भी बहुत है और कुछ परिवार तो पूरी तरह से आजिवीका के लिए नदी पर ही निर्भर है। लेकिन अब धीरे धीरे नदी के पानी मे कमी आने और पर्याप्त मछली नही मिलने के कारण अब ये लोग मेहनत मजदूरी के लिये गाँव और ग़ाँव के बाहर अन्य शहरों में जाने लगे है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नगपुरा जाते समय भरी दोपहरी मे मेरी मुलाकात नगपुरा के एक मछुआरे विष्णु ढीमर (आयु करीब 60 वर्ष) से हुई जो अपने चौथे और सबसे छोटे बेटे (आयु 13-14 वर्ष) के साथ बहुत दूर किसी पोखर&lt;br /&gt;से मछली मार कर आ रहे थे। गर्मी के दिनों मे नदी मे पानी नही होने के कारण उन्हे मछली पकड़ने के लिये दूर दूर जाना पड़ता है। वे सुबह सुबह निकले थे और दोपहर एक बजे के आस पास घर वापस लौट रहे थे। आज किस्मत से उन्हे केवल एक भुंड़ा मछली ही मिल पाई। वे याद करते है कि वर्षो पहले शिवनाथ मे बहुत पानी हुआ करता था और बहुत प्रकार की मछलियाँ मिलती भी थी लेकिन अब तो “जलगा”, “सवार” जैसी मछलियाँ नही मिलती, विलुप्त हो गयी है। इनके परिवार मे इनके अलावा और कोई भी मछ्ली नही पकड़ता। घर के बाकी सदस्य (महिलाएँ भी) मेहनत मजदूरी करने है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुसरी बार फिर पीपरछेड़ी के पास फिर इसी मछुआरे से मुलाकात हुई इस बार वहाँ उनके साथ सात-आठ मछुआरे और थे और सभी नगपुरा के थे। एक मछुआरे को वहाँ एक कछुआ भी मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस नदी को लीज़ मे दिये जाने की चिंता तो सभी को है लेकिन इसकी चिंता करने वाले तमाम लोगो और यहाँ तक कि पर्यावरणविदों से यदि यह भी पूछा जाये कि कितने और किस प्रजाति की मछलियाँ और अन्य जलचर प्राणी इस नदी मे है और कितनी विलुप्त हो गयी है तो शायद ही संतोषजनक उत्तर मिलें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थिती आज शायद गम्भीर नही है लेकिन अगर यह लगातार चलता रहा तो आने वाले समय में जरूर पानी की बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो जायेगी। आश्चर्य की बात है कि शिवनाथ नदी जैसा हाल छत्तीसगढ़ के बहुत सी नदियों का है लेकिन उस पर चिंता और बात नही हो रही है। शायद लाभ की जुंगाईश न हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शिवनाथ नदी देश का पहला पानी के निजीकरण का और हर प्रकार के दोहन का उदाहरण है इसके लिये कैलाश सोनी से लेकर ग्रामीणों और सम्बन्धित तमाम फिक्रमन्द लोगो को इस पर गौरांन्वित होने कि जरूरत नही है और समय समय पर इस मुद्दे को जिन्दा रखना शायद उतना जरूरी नही है, जितना कि शिवनाथ नदी को मरने से बचाने की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेजेन्द्र ताम्रकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साभार -&lt;a href="http://cgavp.wordpress.com/2007/08/24/शिवनाथ-के-बारे-मे/"&gt; जोहार &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;also see in http://newswing.com/?p=645#more-645&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3108512178211251184?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3108512178211251184/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3108512178211251184' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3108512178211251184'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3108512178211251184'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='शिवनाथ के बारे मे…..'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-8174541587216689375</id><published>2008-08-27T21:35:00.008-07:00</published><updated>2008-08-27T22:00:26.605-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दूषित पानी'/><title type='text'>दूषित पानी से बढ रहीं बीमारियां</title><content type='html'>मध्य प्रदेश, छतरपुर । जिला चिकित्सालय का बच्चा वार्ड इन दिनों बाल रोगियों से भरा हुआ है। रोगियों की संख्या में तेजी से बढोतरी हो रही है। इन रोगों के पीछे प्रदूषित पानी मुख्य वजह है। गंदा पानी पीकर बच्चे कम प्रतिरोधक क्षमता होने के कारण रोगों की चपेट में आसानी से आ जाते है।      &lt;br /&gt;जिला चिकित्सालय की ओपीडी में इन दिनों आने वाले कुल मरीजों में से 4॰ फीसदी संख्या बाल रोगियों की होती है। ये बाल रोगी उल्टी, दस्त, पेट दर्द के साथ पीलिया जैसी घातक बीमारियों के शिकार निकलते है। जिले के ग्रामीण कस्बाई क्षेत्रों के अस्पतालों में आने वाले मरीजों में से 6॰ फीसदी मरीज बाल रोगी होते हैं। &lt;br /&gt;क्यों होते हैं रोगः बारिश के साथ जमीन में कई अलग-अलग झिरें पानी लेकर जल स्रोतों तक पहुंचती हैं। इनमें कई बार घुली हुई मिट्टी के साथ हानिकारण विषाणु भी पानी में सक्रिय रहते हैं। इस पानी को जब बिना शुद्धिकरण किए बच्चे पीते हैं तो उनके शरीर में विषाणु प्रवेश करके उन्हें रोग ग्रसित बना देते हैं। इन विषाणुओं के कारण बच्चे सामान्य रोगों के साथ कई बार डायरिया और पीलिया की चपेट में आ जाते हैं। &lt;br /&gt;क्या कहते हैं डाक्टरः जिला चिकित्सालय के सिविल सर्जन डॉ. हृदेश खरे ने बताया कि बारिश में बच्चे सबसे अधिक रोगग्रस्त होते हैं। कई बार बारिश के पानी में अधिक घूमने या नहाने से वे सर्दी-जुखाम और बुखार के शिकार हो जाते हैं। प्रदूषित पानी पीने से उन्हें पेट संबंधी रोग हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि बारिश के मौसम में चाट-पकौडी, पूडी, पराठे, आइस्क्रीम और मिठाई खिलाने से परहेज &lt;br /&gt;करना चाहिए। डॉ. खरे का कहना है कि इन सभी चीजों के सेवन से भी रोग बढते है। उनका कहना है कि अधिकांश बच्चों में पेट दर्द, उल्टी- दस्त की शिकायत मिल रही है। कई बच्चे प्रदूषित पानी पीकर बीमार होने के बाद उन्हें समय से उचित इलाज न मिलने से पीलिया जैसे रोगों की चपेट में आ रहे हैं। इस बारे में पालकों को विशेष रूप से सावधानियां बरतना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-8174541587216689375?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/8174541587216689375/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=8174541587216689375' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8174541587216689375'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8174541587216689375'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_912.html' title='दूषित पानी से बढ रहीं बीमारियां'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-7512614436958609516</id><published>2008-08-27T21:35:00.007-07:00</published><updated>2008-08-27T21:54:15.002-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दूषित पानी'/><title type='text'>दूषित पानी की मछली बढ़ाए कैंसर</title><content type='html'>न्यूयार्क, 7 नवंबर (आईएएनएस)। प्रदूषित पानी से पकड़ी गई मछली कैंसर का कारण बन सकती है। 'युनिवर्सिटी आफ पिट्सबर्ग' द्वारा किए गए एक अध्ययन में अनुसंधानकर्ताओं ने पाया है कि गंदे नालों और कारखानों के प्रदूषित पानी में पलने वाली 'कैटफिश' जैसी मछलियों में हानिकारक तत्व होते हैं। प्रयोगों के दौरान इन तत्वों के कारण स्तन कैंसर की कोशिकाओं का तेजी से विकास हुआ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार मछलियां दूषित पानी में मौजूद 'ओएस्ट्रोजेन' और 'क्जेनो-ओएस्ट्रोजेन' जैसे रयासनों को शरीर में सोख लेती हैं जिनसे महिलाओं में स्तन कैंसर का विकास हो सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुसंधानकर्ता कोनरैड डी. वोल्ज के अनुसार, ''इस अध्ययन के परिणाम सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। हमारे जल स्रोत भी उस प्रदूषण से प्रभावित होते हैं जिनमें यह मछलियां पलती हैं।'' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंडो-एशियन न्यूज सर्विस&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-7512614436958609516?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/7512614436958609516/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=7512614436958609516' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/7512614436958609516'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/7512614436958609516'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_3641.html' title='दूषित पानी की मछली बढ़ाए कैंसर'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-4148164109119523145</id><published>2008-08-27T21:35:00.006-07:00</published><updated>2008-08-27T21:51:21.151-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भूजल में संखिया'/><title type='text'>बिहार के भूजल में संखिया की मात्रा खतरनाक</title><content type='html'>पटना (एजेंसी)। बिहार के भूजल में पाए जाने वाले संखिया के अनुपात को खतरनाक स्तर पर माना जा रहा है। प्रदेश के 38 में से 12 जिलों में भूजल प्रदूषित है।&lt;br /&gt;आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक संखिया मिले पानी का सेवन करने से पिछले कुछ वर्षों में लोगों को सफेद दाग जैसी त्वचा संबंधी बीमारियां हो रही हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के वरिष्ठ वैज्ञानिक केके सिंह ने कहा कि गंगा नदी के पठार की मिट्टी की जांच में संखिया की एकाग्रता उच्च स्तर पर पाई गई। इससे भूजल प्रदूषित हो रहा है। हाल ही में 12 प्रभावित जिलों में हुए प्राथमिक सर्वेक्षण में यह खुलासा हुआ कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश के आधार पर एक अरब में 10 हिस्से (पीपीबी) के तय मानक से भी ज्यादा संखिया पानी में पाया गया। प्रदेश के 316 ग्रामों के 20 हजार नलकूपों में पीपीबी 10 से भी ज्यादा पाया गया। वहीं 235 जिलों के 36 ग्रामों में पीपीबी 50 से भी ज्यादा था। संखिया से प्रभावित जिले पटना, भागलपुर, कटिहार, खगड़िया, बेगुसराय, मुंगेर, लखीसराय, समस्तीपुर, वैशाली, सरन, भोजपुर और बक्सर हैं। यूनिसेफ के मुताबिक प्रदेश की राजधानी के उपनगरीय इलाकों में स्थित नलकूपों के प्रदूषित पानी की वजह से करीब पांच लाख की जनसंख्या संखिया के रूप में धीमा जहर पी रही है। अध्ययन के मुताबिक पटना में भूजल संखिया रहित है। संखिया और प्रदूषित पानी पटना के उपनगरीय क्षेत्र दानापुर और फाथुआ में पाया गया है। विभाग के प्रमुख एके घोष ने भोजपुर, भागलपुर, पटना और वैशाली जिले से लिए गए 28 हजार नमूनों का विश्लेषण करने के बाद कहा कि भोजपुर के पांडे तोला के पानी में संखिया की मौजूदगी सबसे ज्यादा पाई गई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-4148164109119523145?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/4148164109119523145/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=4148164109119523145' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/4148164109119523145'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/4148164109119523145'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_1537.html' title='बिहार के भूजल में संखिया की मात्रा खतरनाक'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3038781683500841512</id><published>2008-08-27T21:35:00.005-07:00</published><updated>2008-08-27T21:50:14.287-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सकरी नदी'/><title type='text'>सकरी नदी में प्रदूषण रोकने करोड़ रूपए की परियोजना</title><content type='html'>छत्तीसगढ़ राज्य शासन द्वारा कबीरधाम जिले की सकरी नदी को प्रदूषित होने से बचाने के लिए चार करोड़ 88 लाख रूपए की परियोजना को मंजूरी दी गई है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा राज्य में नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए पहली बार इस प्रकार की परियोजना हाथ में ली जा रही है। इस योजना के तहत कवर्धा शहर के गंदे निस्तारी पानी को साफ करके सकरी नदी में बहाया जाएगा। साथ ही गंदे पानी का शुध्दीकरण करने के लिए फिल्टर प्लांट एवं शुध्दीकरण प्लांट भी लगाया जाएगा। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों ने बताया कि कवर्धा शहर के गंदे पानी और कचरे का शहर में बहने वाले जारा नाला में मिलने से नाले का पानी प्रदूषित हो जाता है। यह नाला सकरी नदी में मिलता है। नाले के प्रदूषित पानी के कारण सकरी नदी में भी प्रदूषण की समस्या देखी जा रही है। इसे ध्यान में रखकर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निर्देश पर नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए इस परियोजना की मंजूरी दी गई है। परियोजना के तहत नाले के प्रदूषित पानी सहित शहर की नालियों में बहने वाले गंदे पानी को एक स्थान पर एकत्रित कर उसे शुध्द किया जाएगा। इसके लिए जल शुध्दिकरण संयंत्र की स्थापना की जाएगी। शुध्दिकरण के बाद साफ पानी को विभिन्न प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। शुध्द जल की आपूर्ति से लोगों को जल जनित विभिन्न बीमारियों से बचाव की दृष्टि से भी काफी राहत मिलेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3038781683500841512?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3038781683500841512/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3038781683500841512' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3038781683500841512'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3038781683500841512'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_8642.html' title='सकरी नदी में प्रदूषण रोकने करोड़ रूपए की परियोजना'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-8680513079854976053</id><published>2008-08-27T21:35:00.004-07:00</published><updated>2008-08-27T21:48:57.064-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रकृति का दुश्मन काला पानी'/><title type='text'>प्रकृति का दुश्मन काला पानी.... सचिन शर्मा</title><content type='html'>&lt;strong&gt;प्रदूषित पानी बना पर्यावरण के लिए खतरा, खेत बन रहे बंजर, कुँए-नलकूप भी हो रहे प्रभावित&lt;/strong&gt;सचिन शर्मा&lt;br /&gt;भीलवाड़ा। प्रदेश के लिए अमृत समान महत्वपूर्ण माना जाने वाला पानी भीलवाड़ा जिले में प्रदूषण की समस्या का सबसे ज्यादा सामना कर रहा है। वस्त्र नगरी में चल रहे १९ प्रोसेस हाउस से निकलने वाला यह पानी अपनी प्रवृति इतनी अधिक बदल चुका है कि इसका नाम ही काला पानी पड़ गया है। अपनी काली करतूतों के कारण इस पानी से जिले के तीन दर्जन से अधिक गांवों के ५०० से ज्यादा कुँए खराब हो चुके हैं। हजारों बीघा जमीन भी उजाड़ हो गई है। सरकार और जिला प्रशासन ने जल्दी ही प्रदूषण को रोकने का इंतजाम नहीं किया तो यह भीलवाड़ा के जनजीवन के लिए निश्चित ही बहुत घातक सिद्ध होगा।&lt;br /&gt;पाली, बिठूजा, बालोतरा, जसोल और जयपुर के सांगानेर की तर्ज पर भीलवाड़ा में भी प्रोसेस हाउस प्रकृति के लिए काल बनने का काम कर रहे हैं। प्रतिमाह करीब पाँच करोड़ मीटर कपड़ा तैयार करने वाले ये प्रोसेस हाउस जिन रसायनों का उपयोग करते हैं उनसे ना सिर्फ स्थानीय जलस्त्रोत बल्कि बनास और कोठारी नदियों में भी प्रदूषण की भीषण समस्या उत्पन्न हो गई है। जिले के कुँओं में सीपेज के माध्यम से पहुँचने वाला यह पानी कुँओं को झाग से भर देता है। फिर ना तो इसे पीने के उपयोग में लिया जा सकता है और ना खेती करने के। जिन किसानों ने इससे खेती करने की कोशिश की उनकी जमीनें बंजर हो गईं। &lt;br /&gt;राजस्थान उच्च न्यायालय इस आशय के आदेश दे चुका है कि प्रोसेस हाउस जीरो एमिशन के निर्देश को नहीं अपनाते हैं तो जिला प्रशासन उन्हें बंद कर सकता है, लेकिन भीलवाड़ा की तरक्की और उद्योगपतियों के दबाव के कारण जिला प्रशासन ना तो जीरो एमिशन का नियम लागू कर पा रहा है और ना इन प्रोसेस हाउसेज को बंद करवा पा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ये बने हैं जान के लिए जोखिम&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;काले पानी को डिसॉल्व्ड सॉलिड, सल्फेट, क्लोराइड, फ्लोराइड, नाइट्रोजन, हार्डनेस और कैल्शियम की अधिक मात्रा मिलकर घातक बनाती है। इसको किसी भी प्रकार से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जानवर इसको पीकर मौत के मुँह में भी जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यह है जीरो एमिशन का नियम?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भीलवाड़ा के प्रोसेस हाउसेज से निकलने वाले पानी को जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग द्वारा पूर्व में ही खतरनाक घोषित किया जा चुका है, क्योंकि यह वॉटर एक्ट के मापदण्डों पर खरा नहीं माना गया था। तब यहाँ राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जीरो एमिशन का नियम लागू किया गया जिसके तहत प्रोसेस हाउस प्रदूषित पानी को निर्धारित तकनीकों से प्रदूषण मुक्त करने के बाद अपने ही काम में लें और उसे बाहर बिल्कुल नहीं छोड़ें। लेकिन इस महत्वपूर्ण नियम की ही यहाँ सबसे अधिक अनदेखी होती है और प्रोसेस हाउसेज से यह काला पानी रात के अंधेरे में धीरे-धीरे बाहर छोड़ दिया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इन गांवों पर टूट रहा है कहर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जिले के जिन तीन दर्जन गांवों के कुँओं और जमीनों पर काले पानी का सर्वाधिक असर हुआ है उनमें मण्डफिया, दर्री, झोंपड़िया, स्वरूपगंज, कल्याणपुरा, चोयलों का खेड़ा, कुम्हारिया, पिपली, मंगरोप, गुवारड़ी, आंमा, ठगों का खेड़ा, आटूण, किशनावतों की खेड़ी, बीलिया, काणोली, सूड़ों का खेड़ा, पातलियास, आरजिया, माण्डल, पालड़ी, सांगानेर, सुवाणा आदि प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- प्रोसेस हाउस की निगरानी मुख्यतः राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड करता है। उसकी सिफारिश पर ही जिला प्रशासन कार्रवाई करता है। बोर्ड अगर हमसे मदद माँगेगा तो हम तुरंत कार्रवाई करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- अजिताभ शर्मा, जिला कलेक्टर, भीलवाड़ा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- काले पानी पर काबू पाने के लिए हमने टास्क फोर्स बना रखी है। हम प्रत्येक प्रोसेस हाउस का नियमित निरीक्षण करते हैं। जीरो एमिशन नहीं पाए जाने पर उस पर कार्रवाई होती है, नियमों की पालना के लिए नोटिस दिया जाता है। यह कार्रवाई जयपुर मुख्यालय से होती है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- वीरसिंह, क्षेत्रीय अधिकारी, राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने काले पानी की रोकथाम को लेकर न्यायालय में जनहित याचिका लगा रखी है। इस मामले को लेकर आंदोलन भी छेड़ा गया था, लेकिन प्रशासन ना तो इन प्रोसेस हाउस को बंद करवा पाया और ना किसी अन्य जगह स्थानांतरित करवा पाया। प्रोसेस हाउस कपड़ा साफ करने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग करें तो यह समस्या आधी सुलझ सकती है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- बाबूलाल जाजू, प्रदेशाध्यक्ष, पीपुल फॉर एनिमल्स&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२८ जनवरी, २००६ को लिखा गया&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-8680513079854976053?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/8680513079854976053/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=8680513079854976053' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8680513079854976053'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8680513079854976053'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_3394.html' title='प्रकृति का दुश्मन काला पानी.... सचिन शर्मा'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-9002192168812606001</id><published>2008-08-27T21:35:00.003-07:00</published><updated>2008-08-27T21:45:12.053-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पेयजल को प्रदूषित कर रहे हैं कॉस्‍मेटिक्‍स'/><title type='text'>पेयजल को प्रदूषित कर रहे हैं कॉस्‍मेटिक्‍स</title><content type='html'>बाथरूम से निकला मानव अवशिष्‍ट पीने के पानी को बना रहा है प्रदूषित &lt;br /&gt;रोजाना नहाने के लिए उपयोग में लाए जाने वाले साबुन और शैम्‍पू अब मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। सीवेज के पानी के साथ इन कॉस्मेटिक्स में मिले रसायन पीने के पानी को भी प्रदूषित करने लगे हैं। इस बात का खुलासा किया गया है ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी ऑफ केमिस्ट्री की एक ताजातरीन रिपोर्ट में।&lt;br /&gt;रिपोर्ट में कहा गया है कि साबुन, शैम्पू और परफ्यूम आदि में मिले रसायनों का सीवेज के पानी में अनुपात तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय शहरों के लिए यह बात निश्‍िचत रूप से चिंताजनक है, क्योंकि यहां पेयजल और सीवेज के पानी की लाइनें अक्सर एक साथ बिछाई जाती हैं। &lt;br /&gt;रिपोर्ट में कहा गया है कि सीवेज के पानी का परिशोधन करने वाले संयंत्रों में इन कॉस्मेटिक्स के मिले रसायन ठीक तरह से साफ नहीं हो पाते और पेयजल में घुल जाते हैं। रिपोर्ट में ब्रिटेन के कुछ बड़े शहरों में पेयजल का परीक्षण किया गया, जिससे पता चला कि उनमें थैलेट्स की मात्रा काफी अधिक है। थैलेट्स करीब 120 रसायनों का एक समूह है, जो पुरुषों के शरीर में पहुंचकर प्रजनन तंत्र को प्रभावित करता है। इस रसायन से पशुओं को भी खासा नुकसान पहुंचता है। महिलाओं में यह रसायन स्तन कैंसर का कारण बन सकता है। &lt;br /&gt;रॉयल सोसायटी ऑफ केमिस्ट्री के वैज्ञानिक जेफ हार्डी ने बताया कि हालांकि ब्रिटेन में लोगों को सप्लाई किए जा रहे पेयजल में इन हानिकारक तत्वों की मात्रा काफी कम है, लेकिन एशियाई देशों में इनका स्तर अधिक हो सकता है, क्योंकि वहां के जलशोधन संयंत्र  पश्‍िचमी देशों जितने आधुनिक नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अभी तक वैज्ञानिकों को इन तत्वों को रासायनिक रूप से अलग करने का तरीका मालूम नहीं चला है। ऐसे में इतना तो तय है कि मानव शरीर में अभी भी हानिकारक रसायनों की काफी मात्रा पहुंच रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://merikhabar.com/fullstory.aspx?storyid=160"&gt;http://merikhabar.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-9002192168812606001?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/9002192168812606001/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=9002192168812606001' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/9002192168812606001'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/9002192168812606001'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_3176.html' title='पेयजल को प्रदूषित कर रहे हैं कॉस्‍मेटिक्‍स'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-5172460639901432186</id><published>2008-08-27T21:35:00.002-07:00</published><updated>2008-08-27T21:41:20.092-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रदूषित पानी'/><title type='text'>प्रदूषित पानी पीने से आठ मरे</title><content type='html'>राबर्ट्सगंज (वार्ता),  &lt;br /&gt;उत्तरप्रदेश के सोनभद्र जिले के भिढहवा गाँव में पिछले एक हफ्ते में प्रदूषित जल पीने से आठ लोगों की मौत हो गई।&lt;br /&gt;यह खुलासा अज्ञात बीमारी से गाँव में हो रही मौतों का पता लगाने गए चिकित्सा दल द्वारा सोनभद्र के मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. पीके सिन्हा को सौंपी गई रिपोर्ट में किया गया है।&lt;br /&gt;पिछले एक सप्ताह में जिला मुख्यालय में करीब 45 किमी दूर स्थित भिढहवा गाँव में अज्ञात बीमारी से लगातार हो रही मौतों से ग्रामीणों में भय व्याप्त है।&lt;br /&gt;इस बारे में जानकारी मिलने पर डॉ. सिन्हा ने एक चिकित्सीय दल को अज्ञात बीमारी के बारे में पता लगाने के लिए गाँव भेजा जिसने शुभांगी, कुसुम, आरती, लक्ष्मी, धोधारी, राजेन्द्र, रामू व गोलू समेत आठ लोगों की मौत की पुष्टि करते हुए रिपोर्ट में कहा कि यह मौतें ग्रामीणों द्वारा प्रदूषित नाले का पानी पीने के कारण हुई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-5172460639901432186?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/5172460639901432186/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=5172460639901432186' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5172460639901432186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5172460639901432186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_4007.html' title='प्रदूषित पानी पीने से आठ मरे'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-1609808111938227965</id><published>2008-08-27T21:35:00.001-07:00</published><updated>2008-08-27T21:39:20.019-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यमुना प्रदूषण'/><title type='text'>एसटीपी से भी प्रदूषित पानी ही जा रहा है यमुना मे</title><content type='html'>&lt;strong&gt;एसटीपी से भी प्रदूषित पानी ही जा रहा है यमुना मे&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चंडीगढ़ : करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यमुना एक्शन प्लान के तहत हरियाणा के विभिन्न शहरों में लगे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से भी प्रदूषित पानी ही यमुना में डाला जा रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पलवल के विधायक करण सिंह दलाल इस संबंध में मुख्यमंत्री को खत लिख रहे है और इस मुद्दे को विधानसभा में भी उठाएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौरतलब है कि पर्यावरण व वन मंत्रालय ने 1993 में यमुना एक्शन प्लान के तहत हरियाणा व उत्तर प्रदेश के यमुना किनारे के शहरों और दिल्ली को शामिल किया था। इसके लिए जापान से 700 करोड़ का कर्ज लिया गया था। प्राथमिक तौर पर हरियाणा के यमुनानगर, करनाल, पानीपत, सोनीपत, गुड़गांव और फरीदाबाद जिलों को इसमें शामिल किया गया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर छछरौली, गोहाना, घरौंडा, इंद्री, पलवल और रादौर को भी इसमें ले लिया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करण सिंह दलाल ने मंगलवार को दैनिक जागरण को विशेष भेंटवार्ता में बताया कि कई सरकारे आई और चली गईं पर सीवेज ट्रीटमेंट के नाम पर जन स्वास्थ्य विभाग घोटाला कर रहा है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के नाम पर सरकारी खजाने को लूटा जा रहा है। इसके दोषी अफसरों को निलंबित करके उन्हे सजा दी जानी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने बताया कि प्रशासनिक आयोग के चेयरमैन होने के नाते जब सिंचाई विभाग से यमुना के प्रदूषण के बारे में उनसे पूछा था, तो उन्होंने कहा कि जब तक यमुना एक्शन प्लान के तहत जन स्वास्थ्य विभाग के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से प्रदूषित पानी यमुना में गिरता रहेगा तब तक यमुना को प्रदूषण से मुक्त नहीं किया जा सकता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दलाल ने कहा कि मैंने खुद जाकर देखा कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से प्रदूषित पानी ही वापस यमुना में जा रहा है। ट्रीटमेंट प्लांट के नाम पर एक तालाब में पानी एकत्र किया जाता है। ओवर फ्लो होने पर जब ऊपर का कूड़ा कर्कट बाहर चला जाता है तो यही पानी नालों के जरिए वापस यमुना में डाला जा रहा है। दलाल ने कहा कि ट्रीटमेंट प्लांट आधुनिक होना चाहिए। ट्रीट किए गए पानी को तो दोबारा पिया जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दलाल ने कहा कि यमुनानगर से लेकर मेवात तक बह रही यमुना के प्रदूषण का असर दिखने लगा है। न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की उल्लंघना की जा रही है अपितु लोगों की सेहत से खिलवाड़ भी हो रहा है। यमुनानगर के किनारे के शहरों में खुजली, कैंसर और टीबी जैसे रोग फैल रहे है। इस प्रदूषित पानी से पशुओं में भी कई तरह के रोग फैल रहे है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-1609808111938227965?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/1609808111938227965/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=1609808111938227965' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/1609808111938227965'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/1609808111938227965'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_3573.html' title='एसटीपी से भी प्रदूषित पानी ही जा रहा है यमुना मे'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3673004379999773051</id><published>2008-08-27T21:35:00.000-07:00</published><updated>2008-08-27T21:37:58.738-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रदूषित पानी'/><title type='text'>प्रदूषित पानी - प्रदूषित पेयजल</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SLYrkwEFp7I/AAAAAAAAAg0/LMt84ggO0zA/s1600-h/who_fix-1_1214204416_m.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SLYrkwEFp7I/AAAAAAAAAg0/LMt84ggO0zA/s400/who_fix-1_1214204416_m.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5239423126869485490" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रदूषित पानी से रोजाना 4 हजार की मौत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिंगापुर। विश्व स्वास्थ्य संगठन [डब्ल्यूएचओ] के एक अधिकारी ने चेतावनी दी है कि यदि दुनिया भर की सरकारों ने स्वच्छ जलापूर्ति पर ध्यान नहीं दिया, तो इस वर्ष प्रदूषित पेयजल की वजह से करीब 16 लाख लोग मारे जाएंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डब्ल्यूएचओ के जल, स्वच्छता एवं स्वास्थ्य कार्यक्रम के समन्वयक जेम्स बर्टरेम ने सोमवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट के माध्यम से कहा कि रोजाना 4000 से ज्यादा लोग दूषित पेय जल की वजह से होने वाले बीमारियों की वजह से काल के ग्रास बन जाते है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाचार पत्र द स्ट्रेट्स टाइम्स ने जेम्स के हवाले से प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा है कि यह समस्या विश्व के सभी विकसित और विकासशील देशों में है। उल्लेखनीय है कि मंगलवार से सिंगापुर में अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह प्रारंभ हो रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि जल की बढ़ रही मांग और जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए दुनिया&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3673004379999773051?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3673004379999773051/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3673004379999773051' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3673004379999773051'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3673004379999773051'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_27.html' title='प्रदूषित पानी - प्रदूषित पेयजल'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SLYrkwEFp7I/AAAAAAAAAg0/LMt84ggO0zA/s72-c/who_fix-1_1214204416_m.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-5440647501053673150</id><published>2008-08-25T08:58:00.006-07:00</published><updated>2008-08-25T09:27:49.731-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजसमंद झील'/><title type='text'>राजसमंद झील</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SLLcilf39MI/AAAAAAAAAgs/c1bNOdQ3JfA/s1600-h/rajsamand-lake.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SLLcilf39MI/AAAAAAAAAgs/c1bNOdQ3JfA/s400/rajsamand-lake.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5238491803324773570" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राजसमंद झील का निर्माण महाराणा राज सिंह जी के द्वारा एक बडी अकाल राहत योजना के तहत 1662 AD.में करवाया गया । काफी समय बीतने के बाद जब यह छोटा सा कस्बा जिला बना, तो इसका नाम भी ‌राजसमंद झील के कारण ‌राजसमंद जिला रखा गया । ‌राजसमंद झील पर नौ चोकी स्थापत्य कला का एक बहूत ही अच्छा नमूना है, यहां मार्बल से बनी तीन छतरीयां, व तोरण बने हुए है।  इन पर बहूत बारीकी से मीनाकारी का कार्य किया हुआ है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईस नौ चोकी नामक स्थान की एक खास बात यह हे कि यहां हर नौ सीढ़ीयों के बाद एक चोकी है,  और इस बात का खास खयाल रखा गया था इसके पुरे निर्माणकाल के दौरान । नौ चोकी पर बने तोरण भी नौ पत्थरों के जोड से ही बने हुए है । नौ अंक का हिन्दु धर्म में एक अलग ही महत्व है ।  इसी नौ चोकी पाल पर 25 पत्थरों पर खुदाई करके एक बहुत बडा महाकाव्य लिखा गया था जो राज प्रशस्ति के नाम से जाना जाता है । कहा जाता है कि ‌राजसमंद झील पर पाल का निर्माण पूरा होने में पूरे 14 वर्ष का समय लगा था । ‌राजसमंद झील एशिया में दूसरी बडी मीठे पानी कि झील है । झील के किनारे पाल पर एक तरफ अंग्रेजों के जमाने की बनी हुई एक छोटी हवाई पट्टी भी है, तब यहां पानी पर हवाईजहाज उतरते थे ।&lt;br /&gt;यहीं पर झील के किनारे स्थित हे प्रभू द्वारिकाधीश का पावन मंदिर, दर्शनार्थी दूर दूर से यहां प्रभू के दर्शनो के लिये आते हैं, और पवित्र झील में स्नान करते हें ।‌ राजसमंद झील विगत कुछ समय से खाली पडी थी पर अब यहाँ पानी की कमी नहीं है । झील पर नौकायान का लुत्फ लिया जा सकता है । राजसमंद झील की पाल पर ही सिंचाई विभाग का कार्यालय है, और सिंचाई विभाग का ही एक गार्डन भी है। प्रतिदिन यहां नगर के कई गणमान्य लोग प्रातःकालीन और सायंकालिन भ्रमण के लिये आते हैं। यहां पाल पर पहली छतरी राडाजी की छतरी के नाम से जानी जाती है, आगे ऐसी ही तीन और  छतरीयां है और अंत में आती है चौथी छतरी, कमल कुरज की छतरी ।  यहां की सांय सांय करती हवा और  दूर दूर तक झील के मनोरम नजारे  मन को सुकून देते हैं । यहाँ सुर्योदय और सुर्यास्त के समय आकाश में छाई लालिमा को बैठे बैठे निहारना बहूत आनंददायी होता है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-5440647501053673150?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/5440647501053673150/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=5440647501053673150' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5440647501053673150'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5440647501053673150'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_5793.html' title='राजसमंद झील'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SLLcilf39MI/AAAAAAAAAgs/c1bNOdQ3JfA/s72-c/rajsamand-lake.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-105155881284446319</id><published>2008-08-25T08:58:00.005-07:00</published><updated>2008-08-25T09:16:56.345-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आयड़ नदी'/><title type='text'>आयड़ नदी की लम्बाई दर्शाने पौने ३ लाख खर्च होंगे</title><content type='html'>&lt;strong&gt;३०-३० मीटर की दूरी पर लगेंगे आर डी स्टोन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;उदयपुर, ७ अप्रेल (नसं) । आयड़ नदी विकास योजना के प्रथम चरण के तहत किये जाने वाले कार्यों की श्रेणी में नदी की लम्बाई दर्शाने करीब पौने तीन लाख रूपये खर्च किए जाएंगे।&lt;br /&gt;इस योजना के तहत सिंचाई विभाग ने नदी के सीमांकन का भौतिक सत्यापन का काम शुरू करने के साथ ही नदी की लम्बाई दर्शाने माईल स्टोन की तर्ज पर नदी के सहारे आर डी स्टोन लगाने की योजना तैयार की है। सिंचाई विभाग चिकलवास फिडर के यहां से उदयसागर में जहां नदी मिलती है वहां तक ३०-३० मीटर की दूरी पर आरडी स्टोन लगाएगा।&lt;br /&gt;विभाग के अधिशाषी अभियंता विमल चोरड़िया ने इस कार्य के  लिए २ लाख ७२ हजार का एस्टीमेट बनाकर राशि मंजूरी हेतू नगर विकास प्रन्यास को भेजा है।&lt;br /&gt;करीब २४ किलो मीटर लम्बी आयड़ नदी के विकास की योजना को लेकर सिंचाई विभाग ने नगर परिषद द्वारा पूर्व में करवाए गए नदी के कंटूर सर्वे का अध्ययन भी शुरू कर दिया है।&lt;br /&gt;उल्लैखनीय है कि आयड़ नदी विकास योजना को मूर्तरूप देने नगर परिषद ने जहां अपने वार्षिक बजट में २ करोड़ का प्रावधान कर दिया है वहीं नगर विकास प्रन्यास ने अपने वार्षिक बजट में इस कार्य के लिए फिलहाल ४ करोड़ की राशि तय कर दी है, प्रन्यास का बजट आगामी ११ अप्रेल को पेश होगा। &lt;br /&gt;जानकारी अनुसार दोनों ही एजेंसियां जरूरत पड़ने पर इस राशि में बढ़ोत्तरी करने भी तैयार रहने का मानस भी बना चुकी है।&lt;br /&gt;पिछोला की बाउण्ड्रीवाल का काम शुरू : पिछोला झील पेटे में हो रहे अतिक्रमण को रोकने सिंचाई विभाग ने अपनी कवायद शुरू कर दी है। इसके तहत विभाग ने फिलहाल एकलव्य कॉलोनी छौर पर झील किनारें बाउण्ड्रीवाल बनाने का काम आरम्भ करवाया है। बाउण्ड्रीवाल बनाने का खर्चा नगर विकास प्रन्यास वहन कर रहा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-105155881284446319?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/105155881284446319/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=105155881284446319' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/105155881284446319'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/105155881284446319'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_7357.html' title='आयड़ नदी की लम्बाई दर्शाने पौने ३ लाख खर्च होंगे'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3556143657503599252</id><published>2008-08-25T08:58:00.004-07:00</published><updated>2008-08-25T09:12:15.418-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आयड़ नदी'/><title type='text'>कागजों में ही दबी आयड़ की पहल</title><content type='html'>भास्कर न्यूज&lt;br /&gt;उदयपुर. राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना की बैठक लेकर नगर परिषद और यूआईटी की बैठकों में आयड़ नदी के संरक्षण व सौंदर्यीकरण की योजना केवल कागजों तक सीमित रह गई है। ठीक एक वर्ष पूर्व नगर परिषद द्वारा आयड़ नदी के सौन्दर्यीकरण को लेकर हुई बैठक में संबंधित विभागों के अधिकारियों ने जोर-शोर से खूब बातें की, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस क्रियान्विति नहीं हो पाई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आयड़ नदी को लेकर स्थानीय पर्यावरणविदों सहित झील संरक्षण समिति द्वारा बार-बार सरकार और प्रशासन का ध्यान आकृष्ट किया पर योजना कागजों में ही चलती रही। पिछले माह यूआईटी में हुई बैठक से फिर आयड़ नदी के सौन्दर्यीकरण की उम्मीद बंधी पर अब तक कोई ठोस जमीनी हलचल नहीं दिखाई दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आयड़ नदी के भू-जल स्तर में गिरावट &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भू-जल स्तर के मापदंड़ों के अनुसार आयड़ नदी का जलग्रहण क्षेत्र अतिदोहित की श्रेणी में आता है। जलस्तर की गिरावट खतरे के स्तर तक जा चुकी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नदी का टोपोग्राफिकल व हाइड्रोजिकल सर्वे जरूरी &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विशेषज्ञों कर राय में आयड़ नदी का भू-स्थलीय (टोपोग्राफिकल) तथा हाइड्रोलोजिकल सर्वे जरूरी है। आयड़ नदी के विकास में उदयसागर का संरक्षण जरूरी है। आयड़ नदी के लिए बनास बेसिन नदी के ऊपरी बेड़च बेसिन की पर्यावरण गुणवत्ता का सूचक उदयसागर झील है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कब -कब हुई आयड़ नदी के विकास की बात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना की बैठक&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;12 जनवरी 2004 को दिल्ली के पर्यावरण भवन में राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना की बैठक में राज्य सरकार से बनास नदी के उदयपुर से चित्तौड़गढ़ तक के प्रदूषण वाले हिस्सों का सुधार करने के लिए आग्रह किया गया, लेकिन राज्य सरकार ने इस दिशा में रुचि नहीं दिखाई। इस बैठक में राज्य सरकार की ओर से पर्यावरण विभाग की तत्कालीन प्रमुख शासन सचिव कुशालसिंह ने भाग लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;2004 से प्रयासरत झील संरक्षण समिति : &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झील संरक्षण समिति वर्ष 2004 से ही राज्य सरकार से यह आग्रह कर रही है कि आयड़ नदी की योजना को राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में शामिल कर इसको प्रदूषण मुक्त कराया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;22 मार्च 2007 को झील संरक्षण समिति ने तैयार की योजना &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आयड़ नदी विकास की योजना को लेकर झील संरक्षण समिति ने 22 मार्च को बैठक में योजना तैयार की। योजना के तहत निम्न चरण को प्रस्ताव में शामिल किया गया : द्य 1947 के दस्तावेजों के आधार पर बेदला एनीकट से सूखा नाका तक आयड़ नदी का सीमांकन किया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदी तट से दोनों ओर 50 मीटर की भू-पट्टीका को हरित क्षेत्र घोषित किया जाए तथा इसमें वृक्षारोपण किया जाए। द्य नदी के अंदर 12 से 15 स्थानों पर दो से ढाई फीट की दीवारें बना दी जाए। इन दीवारों के पीछे एकत्र होने वाले गंदे पानी में विशेष प्रकार की जलीय वनस्पति, एल्गी छोड़कर पानी का जैविक उपचार किया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;औद्योगिक इकाइयों को पाबंद किया जाए कि उनके दूषित जल को उपचारित कर ही प्रवाहित किया जाए। द्य नदी जल ग्रहण क्षेत्र में स्थित मार्बल स्लरी डंपिंग यार्ड को हटाया जाए। द्य आयड़ वाटरशेड उपचार योजना जो प्रशासन के पास पड़ा है उसकी क्रियान्विति हो। द्य आयड़ नदी के सौन्दर्यीकरण के लिए विस्तृत प्रस्ताव बनाकर केंद्र सरकार की नदी संरक्षण योजना में भेजा जाए। द्य नदी को वेनिस का दर्जा देना है तो नदी के जलग्रहण क्षेत्र में सुधार की ओर ध्यान दिया जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दस-बारह वर्ष पूर्व भी बनी योजना &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आयड़ नदी के विकास और संरक्षण के लिए जिला प्रशासन के डीआरडीए के पास आयड़ नदी वाटरशेड प्रोजेक्ट बनाया गया लेकिन इस पर भी क्रियान्विति नहीं हुई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अब तक तैयार नहीं हुआ खाका &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टाउन प्लानर को आयड़ नदी का खाका तैयार करने की बात पूर्व बैठकों में की गई, लेकिन इस दिशा में भी प्रगति नहीं के बराबर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बीते माह हुई बैठक भी कागज में&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आयड़ नदी के सौन्दर्यीकरण के लिए फरवरी-2008 को यूआईटी में बैठक हुई जिसमें भी बड़ी-बड़ी बातें होकर रह गई।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3556143657503599252?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3556143657503599252/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3556143657503599252' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3556143657503599252'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3556143657503599252'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_1574.html' title='कागजों में ही दबी आयड़ की पहल'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-2211928715345429796</id><published>2008-08-25T08:58:00.003-07:00</published><updated>2008-08-25T09:06:15.979-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अम्लवर्षा'/><title type='text'>अम्लवर्षा</title><content type='html'>वर्षा, यह प्राकॄतिक रूप से ही अम्लीय होती है. इसका कारण यह है कि CO2  (कार्बन डाय ऑक्साईड) जो पॄथ्वी के वायुमंडल में प्राकृतिक रूप में विद्यमान है जो जल के साथ क्रिया करके कार्बोनिक एसिड बनाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अम्लवर्षा में अम्ल दो प्रकार के वायु प्रदूषणों से आते हैं। So2 &amp; Nox , ये प्रदूषक प्रारंभिक रुप से  कारखानों की चिमनियों, बसों व स्वचालित वाहनों के जलाने से उत्सर्जित होकर वायुमंडल में मिल जाते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;अम्लवर्षा के दुष्परिणाम:&lt;/strong&gt; अम्लवर्षा के कारण जलीय प्राणियों की मृत्यृ खेंतो और पेड़-पौधों की वृद्धि में गिरावट,तांबा और सीसा जैसे घातक तत्वों का पानी में मिल जाना, ये सभी दुष्परिणाम देखे जा सकते है। जर्मनी व पश्चिम यूरोप में जंगलो का नष्ट होने का कारण अम्लवर्षा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;समस्या का समाधान:&lt;/strong&gt; इस समस्या का समाधान एक ही प्रकार से  संभव है। इसके लिये घातक वायु और पदार्थ के स्त्रोत जहाँ से ये प्रदूषक उत्पन्न हो रहे है, उनकों वहीं पर नियंत्रित करना, और वे सभी व्यक्ति और संस्थाएं जो इस विषय पर कार्यरत है उन्हें सारी जानकरी देना।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-2211928715345429796?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/2211928715345429796/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=2211928715345429796' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/2211928715345429796'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/2211928715345429796'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_4071.html' title='अम्लवर्षा'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-7046102791358691063</id><published>2008-08-25T08:58:00.002-07:00</published><updated>2008-08-25T09:05:01.387-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पृथ्वी पर प्रदूषण'/><title type='text'>पृथ्वी पर प्रदूषण</title><content type='html'>&lt;strong&gt; साक्षातकार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. गुफरान बेग़ को अंतरराष्ट्रीय विज्ञान संस्था की तरफ से Norbert-Gerbier-Mumm (NGM)   नामक पुरस्कार से सन्मानित किया गया है। ये  पुरस्कार पृथ्वी पर प्रदूषण से संबंधीत नये संशोधन के लिए दिया गया है। इस संशोधन पर  विस्तार से जानकारी के लिये ये साक्षातकार आयोजित किया गया है।    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न १. प्रदूषण का क्या अर्थ है। भारत मे मुख्यतया किस प्रकार का प्रदूषण पाया जाता है?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊत्तर: प्रदूषण के मुख्यत: ३-४ प्रकार होते है:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  १) वायु प्रदूषण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  २) जल प्रदूषण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  ३) मृदा प्रदूषण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  ४) ध्वनि प्रदूषण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  उदाहरण के लिए: मृदा प्रदूषण जल प्रदूषण का मुख्य कारण बङे - बङे कारखानों में से निकलने वाला गंदा पानी, घरों में उपयोग होने के बाद , नालों में से बहकर जाने वाला पानी नदियों में मिल जाता है, जिसके कारण नदी का पानी प्रदूषित होता है। ऐसे प्रदूषित जल को यदि सब्जियों और फलों की सिंचाई के लिए प्रयोग में लाया जाए तो ये मनुष्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; वायु प्रदूषण आज एक बहुत ही चिंताजनक स्थिति में पहुँच गया है। पूना में भी यह बहुत अधिक चिंताजनक हालत में है। हमारी संस्था (IITM) में हम वायु प्रदूषण से संबंधित सभी विषयों पर अध्ययन करते है और प्रवीणता प्राप्त की है। वायु प्रदूषण का प्रमुख कारण वाहनों की बढती हुई संख्या है, और उससे निकलने वाली प्रदूषित हवा है। कारखानों में उपयोग में लाया जाने वाला कोयला और अनेक दूसरे ईंधन, कृषि अवशेष और गावों में पारंपरिक तौर पर उपयोग में लाया जाने वाला ईंधन जिसमें लकङी और गोबर का जलना, ये सारे वायु में नाईट्रोजन ऑक्साईड, कार्बन मोनोक्साईड और ओज़ोन तथा सूक्ष्म कण की मात्रा को बढाते है, और वायु प्रदूषित करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न २. इन सभी प्रदूषणों का क्या परिणाम हो सकता है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ऊत्तर:   इस वायु प्रदूषण के कारण मनुष्य ही नहीं बल्कि पेङ-पौधों पर भी घातक परिणाम होते है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने जो वायु प्रदूषक बताए हैं, उनमे से सबसे अधिक घातक ज़मीनी ओज़ोन है। ओज़ोन की रासायनिक प्रक्रिया के कारण आँखों में जलन, फेफङों में तकलीफ़ और कर्क रोग जैसी घातक बीमारियाँ हो सकती है ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओज़ोन की मात्रा यदि वायु में अधिक हो जाए तो कृषि उत्पादन में कमी पाई गई है। भारत वर्ष में अभी तक ओज़ोन का मापदंड प्रदूषण विभाग द्वारा नहीं आंका गया है परन्तु हमने इसका आंकलन किया है। जब ओज़ोन की मात्रा ८३ पीपीबीवि ( 83ppbv ) की सीमा रेखा से अधिक हो जाए तब ये मनुष्य के स्वास्थ के लिऎ घातक सिद्ध होती है। और यदि ४० पीपीबीवि (40ppbv) से अधिक हो जाए तो कृषि के लिए अच्छी नहीं है और पैदावार कम हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न ३. प्रदूषण मापन (अंदाज ) किस प्रकार से कर सकते हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊत्तर: प्रदूषण मापन दो प्रकार से संभव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; १) पहला-आधुनिक प्रदूषण मापी उपकरणों द्वारा। परन्तु इसके लिए अलग अलग स्थानों पर उपकरण लगाने होंगे, क्योंकि प्रदूषण वातावरण  में हमारे द्वारा use sources जैसे वाहनों की सँख्या, Traffic Density, जनसँख्या पर निर्भर  करता है जो कि थोङी थोङी दुरी पर बदलते रहते हैं। ये विधी में नेटवर्क करना आसान नहीं है और वित्ती भार भी अधिक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२) दुसरा प्रकार- इस विधी से आज के वातावरण के साथ साथ भविष्य मे वायु प्रदूषण का अंदाज लगाना भी संभव हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न ४. आपके द्वारा प्रदूषण संशोधन और भविष्य में इसके अनुमान के बारे में आपने क्या प्रगति की है हमें बतायें। मुख्यतौर पर  पूना में हमारी जनता कब और कैसे प्रदूषण का अंदाज ले पाएगी?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;ऊत्तर: वातावरण के प्रदूषण से सभी विषयों पर हमारी संस्था IITM में शोध कार्य निरंतर प्रगति पर है। हमारे पास दोनो ऊपर बताये विधी यानी उपकरण और मांडलिग द्वारा शोध हो रही है। पूना के पाषाण भाग में घातक ओज़ोन की मात्रा पिछले २ वर्षो में हर वर्ष ४०-५० घातक माप ८३ पीपीबीवि को पार करी हैं। ये चिंताजनक है। यह घातक level मुख्य Traffic Junctions जैसे स्वारगेट, विद्यापीठ सर्कल, नल स्टॉप, चाँदनी चौक, हङपसर आदि स्थानो पर और भी अधिक हो सकता है। सुक्ष्म कणों की मात्रा और नाईट्रोजन के घटक दुपहिया पुराने वाहनों के कारण बढ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने एक Project भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, दिल्ली के साथ प्रारम्भ किया है जिसमें प्रदूषण का प्रभाव रवी और खरीफ फसल पर देखना है। इस अध्ययन के अनुसार ये आंका गया है कि यदि ओज़ोन स्तर 60ppbv होता है चावल व गेंहू के उत्पादन में १-९% की कमी हो सकती है। २००१ वर्षा औसत से कम हुई थी इस कारण ओज़ोन और कार्बन मोनोक्साईड की मात्रा इस वर्ष बढ गई थी जिसका असर ये देखा गया कि कृषि उत्पादन ८% से २००२ में कम हुआ। ये निष्कर्ष IARI  के CropModel से मिला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न ५. आप हमें भविष्य में प्रदूषार्ण के अंदाज में आपके द्वारा प्रगति के विषय में बताएँ!&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊत्तर:.हा ! हम इस दिशा में गहन अध्ययन कर रहे हैं। हमने REMO नाम का एक क्षेत्रीय रास. वहन मॉडल तैयार किया है। संगणक के द्वारा इस मॉडल से आज का प्रदूषण और पीछे के स्तरों के बारे में सूचना मिल सकती है। इसमें हवामान के सभी घटक तापमान, हवा का दबाव, आर्द्रता, हवा की गति और दिशा के साथ-साथ प्रदूषण Emissions Inventery  जैसे घटक मॉडल में Input दिये जाते है। इनके बारे मे जानकारी भविष्य के अंदाज में निश्चित रुप से अनिश्चित्ता हो तो प्रदूषर्ण अंदाज में भी अनिश्चित्ता आती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न ६. भारत के शहरों और गावों के प्रदूषण में क्या अन्तर हैं?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊत्तर:. शहर में प्रदूषण मुख्यतः वाहनों के आगमन के कारण होता है। वाहन अगर सही हो और उचित तौर पर उपयोग किया जाए तो प्रदूषण के जटिलता कम है । लेकिन हमारे देश में बिना ट्यून किए वाहन, चौराहों पर लाल बत्ती पर २-३ मिनट तक ठहरे मगर धुँआ उङाते वाहन, आदि एक मुख्य प्रदूषण समस्या है। सर्दी में टायरों का जलाना गंभीर समस्या बनता जा रहा है जो काले कार्बन की बढती मात्रा का स्त्रोत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; गावों में खाना अभी भी मुख्यतः लकङी/चूल्हे के उपयोग से बनता है या कोयले की सगङी इस्तेमाल की जाती है। गोबर से बने कंडे उपयोग में लाए जाते हैं। इन सबसे प्रदूषित गैसे मुख्यतः CO अधिक मात्रा में निकलती है।क्योंकि भारत की ७०% जनता अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती हैं। ये गाँवों की अधजली लकङी और गोबर की समस्या अति गंभीर होती जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रश्न ७. प्रदूषण के बारे में लोगों में हम जागरुकता कैसे पैदा कर सकते है। आपकी प्रदूषण पर इस बारे में क्या सुझाव हैं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊत्तर:. मेरे इस बारे में ४-५ सुझाव या Recommendation हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; प्रदूषण की समस्या आकङों में बताकर जनसाधारण को अलग अलग मंचो का उपयोग करके जागरुक करें। अपनी संस्था IITM,Pune में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ( भारत सरकार का उपक्रम ) के अधीन एक कार्यक्रम   ENVIS &amp; SDNP Climate-Change चलाया गया है। इसके अधीन एक वेब साईट  envis.tropmet.res.in बहुत ही साधारण भाषा में बनाई गयी हैं जो इस बारे में जानकारी विस्तृत तौर पर देती है। Kids Corner के नाम से एक  Link इसमें दिया गया है जो चलचित्र द्वारा Animation से प्रदूषण की जानकारी देता हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-7046102791358691063?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/7046102791358691063/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=7046102791358691063' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/7046102791358691063'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/7046102791358691063'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_2252.html' title='पृथ्वी पर प्रदूषण'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-5991895372341908200</id><published>2008-08-25T08:58:00.001-07:00</published><updated>2008-08-25T09:01:18.153-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पौधे बताएंगे पानी में कितना प्रदूषण'/><title type='text'>आवाज बताएगी प्रदूषण का स्तर</title><content type='html'>तेल अवीव : अब पौधे बताएंगे पानी में कितना प्रदूषण है। जल्द ही पौधों की आवाज को सुनकर यह जाना जा सकेगा कि जिस पानी में पौधे पनप रहे हैं वहां कितनी गंदगी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्राइली वैज्ञानिकों ने इस बारे में पौधों की आवाज सुन पाने की एक नई तकनीक विकसित की है। इसके तहत पानी में तैरने वाले शैवालों के उपर लेजर किरणें डाली जाती हैं जिससे एक अजीब तरह की तंरगें निकलती हैं जो पानी में प्रदूषण की मात्रा को बताती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्राइल के बार इलान विश्वविद्यालय के जल जैव प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञ जुवी दुबीनस्की ने कहा कि लेजर किरणें पड़ते ही इन शैवालों में से एक खास तरह की तरंगे निकलने लगती हैं इनसे जल प्रदूषण का पता लग जाता है। दुबीनस्की के मुताबिक शैवाल जल प्रदूषण के प्रति सबसे संवदेनशील होते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-5991895372341908200?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/5991895372341908200/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=5991895372341908200' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5991895372341908200'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5991895372341908200'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_2885.html' title='आवाज बताएगी प्रदूषण का स्तर'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-1801487319564321746</id><published>2008-08-25T08:58:00.000-07:00</published><updated>2008-08-25T08:59:37.451-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रदूषित पानी से मरीं मछलियां'/><title type='text'>उदयसागर के प्रदूषित पानी से मरीं मछलियां</title><content type='html'>भास्कर न्यूज&lt;br /&gt;उदयपुर. प्रदूषित पानी से उदयसागर झील में अब मछलियां और अन्य जलचर प्राणी मर रहे हैं। झील किनारे कई जगह मछलियां मरी हुई पड़ी हैं। मत्स्य विभाग भी इससे बेखबर है। इससे पहले पीछोला व फतहसागर का जलस्तर कम होने व तापमान बढ़ने से मछलियां मरी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदयसागर किनारे मरी हुई मछलियों का आकार मध्यम से बड़ा है। चारों ओर किनारे पर जगह-जगह मछलियां मरी हुई दिखाई दी हैं। कई बार तो लोग इन मछलियों को उठाकर ले जाते हैं, लेकिन कुछ क्षेत्रों में मरी हुई मछलियों की बदबू फैल रही है। इसकी बड़ी वजह झील में पानी का प्रदूषित होना है। पिछले दो-तीन सालों से लगातार जल स्तर घटने पर झीलों में मछलियों के मरने की घटनाएं सामने आई हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिन पहले भी पीछोला में मछलियां मर गई थीं। शहर का इंडस्ट्रीयल वेस्ट जाने से उदयसागर रासायनिक तौर पर सर्वाधिक प्रदूषित झील बन चुकी है। ऐसे में जलचरों के जीवन पर संकट आना स्वाभाविक है। इधर, मछलियों के मरने की घटना की जानकारी मत्स्य विभाग को नहीं मिली है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपनिदेशक, फिशरीज डिपार्टमेंट इस्माईल अली दुर्गा ने बताया कि उदयसागर में मछलियों की मौत के बारे में कोई रिपोर्ट विभाग को नहीं मिली है। पानी व मृत मछलियों के सेंपल लिए जाएंगे जिसके बाद ही मौत के कारणों का खुलासा करना संभव होगा। दुर्गा ने बताया कि मौसम में परिवर्तन होने से कई बार पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे मछलियां व अन्य जल जीव मरने लगते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रिपोर्ट &lt;/strong&gt;: केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल की रिपोर्ट के अनुसार उदयपुर की झीलों में प्रति 100 मिलीलीटर कुल जीवाणु की संख्या (एमपीएन) 4200 से 7600 है जबकि नहाने योग्य पानी में यह 500 से कम होने चाहिए। उदयसागर झील में जीवाणुओं की संख्या 2 हजार से 6200 एमपीएन है। इसी तरह बड़ी तालाब, फतहसागर, स्वरूपसागर, पीछोला, आयड़ नदी की तुलना में उदयसागर पानी की हार्डनेस और क्षारीयता के मामले में दूसरे नंबर पर है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;जोखिम के स्तर को पार कर चुका प्रदूषण&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पर्यावरणविद् अनिल मेहता के अनुसार झीलों में जमा प्रदूषक तत्व व निरंतर गिरते रहे गंदे नालों व ठोस कचरे के कारण पानी की गुणवत्ता निरंतर गिरती जा रही है। झीलों में हानिकारक जीवाणुओं की संख्या भी बहुत अधिक तादाद में है जो जलचरों के अस्तित्व पर बड़ी चुनौती साबित हो रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-1801487319564321746?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/1801487319564321746/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=1801487319564321746' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/1801487319564321746'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/1801487319564321746'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_25.html' title='उदयसागर के प्रदूषित पानी से मरीं मछलियां'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-6051499914521456243</id><published>2008-08-21T08:47:00.000-07:00</published><updated>2008-08-21T08:49:48.259-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पानी का निजीकरण'/><title type='text'>पानी का निजीकरण और सरकारी रवैया</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SK2OaxQ1B4I/AAAAAAAAAgk/2wtJZ-GXrQA/s1600-h/water+privatisation.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SK2OaxQ1B4I/AAAAAAAAAgk/2wtJZ-GXrQA/s400/water+privatisation.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5236998532253419394" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;संदीप पांडे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जल जैसे प्राकृतिक संसाधन, जो पूरे समाज के उपयोग के लिए उपलब्ध हैं तथा जिन पर समाज का सामूहिक स्वामित्व है, के प्रति सरकारों के नजरिए में परिवर्तन आ गया है। अब इसको एक ऐसे संसाधन के रूप में देखा जाने लगा है जिसका व्यावसायिक मुनाफे के लिए दोहन किया जा सकता है। यह अलग बात है कि इस प्रक्रिया में क्षेत्रीय भू-गर्भ जल स्तर में न सिर्फ गिरावट आ रही है, बल्कि उसके जहरीले होने के मामले भी सामने आ रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले वर्ष अक्टूबर माह में उत्तरप्रदेश के बलिया जिले में स्थित कोकाकोला बॉटलिंग संयंत्र के बाहर स्थानीय ग्रामीणों ने धरना दिया हुआ था। वे जानना चाहते थे कि यह कारखाना अपने खतरनाक कचरे का निपटारा कैसे करता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञात हो कि 2005 में केरल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पलक्कड़ जिले में स्थित प्लाचीमाडा गांव के कोकाकोला बॉटलिंग संयंत्र को बंद करने का आदेश दिया था क्योंकि इस कारखाने से निकलने वाले कचरे में कैडमियम, क्रोमियम व लैड जैसे तत्व पाए गए थे जिनसे भू गर्भ जल के जहरीले होने का खतरा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में बलिया के किसानों के लिए यह जानना जरूरी था कि उनके गांव में स्थित कोकाकोला संयंत्र कहीं रासायनिक कचरा भूगर्भ में तो नहीं दफना रही है? वहां ग्रामीणों को पुलिस अधीक्षक के स्तर पर निरीक्षण की अनुमति तो दी गई, लेकिन ऊपरी दबाव के आगे फिर रद्द कर दी गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोकाकोला व पेप्सी कंपनियों के भारत में 90 के ऊपर बॉटलिंग संयंत्र हैं, जो प्रत्येक जगह से रोजाना 15 से 20 लाख लीटर पानी का दोहन करते हैं। इन कंपनियों द्वारा एक लीटर शीतल पेय बनाने के लिए छह से दस लीटर पानी का इस्तेमाल किया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगातार इतने पानी के दोहन की वजह से उन इलाकों में जहां ये बॉटलिंग संयंत्र स्थित हैं, भूगर्भ जल स्तर में तेजी से गिरावट आई है। प्लाचीमाडा में तो संयंत्र के आसपास के गांवों में कोकाकोला टैंकरों से पीने के पानी की आपूर्ति करती है। भूगर्भ जल पीने, नहाने, खाना बनाने अथवा कपड़े धोने लायक भी नहीं रह गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेहदीगंज, वाराणसी स्थित कोकाकोला बॉटलिंग संयंत्र से तीन किमी के दायरे में स्थित प्रत्येक जलस्रोत का सर्वेक्षण करने पर यह मालूम हुआ कि 1996-2006 के दौरान भूगर्भ जलस्तर में 18 फीट की गिरावट आई है जबकि 1986-96 के दौरान यह गिरावट मात्र 1.6 फीट थी। कुओं व तालाबों के सूख जाने पर बड़ी संख्या में हैंडपंप लगाए गए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1996 में यहां सिर्फ 45 हैंडपंप थे, जबकि 2006 में इनकी संख्या बढ़कर 220 तक पहुंच गई। स्पष्ट है कि जल की उपलब्धता का संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है। दर्जन भर गांवों में राजकीय व निजी नलकूपों से पानी निकलना बंद हो चुका है तथा एक चौथाई हैंडपंप भी जवाब दे चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा प्रस्ताव था कि बिना अनुमति के इस इलाके में हैंडपंप या नलकूप लगाने पर रोक लगाई जाए। कृषि या पेयजल की जरूरत को पूरा करने के लिए तो ऐसी अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है, किंतु कोकाकोला कंपनी द्वारा व्यावसायिक उद्देश्य से जल दोहन पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट, देहरादून द्वारा मेहदीगंज, वाराणसी स्थित कोकाकोला बॉटलिंग संयंत्र के आसपास के भूगर्भ जल, सतही जल व मिट्टी के नमूनों की जांच करने पर यह पाया गया कि जल के ज्यादातर नमूनों में कैडमियम व क्रोमियम आपत्तिजनक मात्रा में विद्यमान हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी आशंका है कि कोकाकोला अपना विषैला कचरा भूगर्भ जल में ही दफना रहा है जिसकी वजह से आसपास के ग्रामीणों के लिए पेयजल के विषाक्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। मिट्टी में भी लैड, कैडमियम व क्रोमियम पाए गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जल के निजीकरण का सबसे हास्यास्पद किंतु गंभीर मामला रायपुर से है जहां मध्यप्रदेश औद्योगिक केंद्र विकास निगम लिमिटेड ने एक स्थानीय निजी कंपनी रेडियस वॉटर लिमिटेड को 20 वर्षो की अवधि के लिए व्यावसायिक मुनाफा कमाने के उद्देश्य से राज्य का एक प्रमुख जलस्रोत व नैसर्गिक साधन शिवनाथ नदी पूर्णरूपेण हस्तांतरित कर दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राज्य शासन की अनुमति के बिना रुपए 500 लाख से अधिक की जल प्रदाय योजना की परिसंपत्तियां निजी कंपनी को लीज पर मात्र एक रुपए के प्रतीकात्मक मूल्य पर सौंप दी गई थीं यानी प्रकृति से निशुल्क जल प्राप्त कर उसे बोतल में बंद कर बेच देना अब एक वैध व्यावसायिक गतिविधि है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोकाकोला व पेप्सी खुद किनले व एक्वीफिना नाम से बोतलबंद पानी का व्यापार करती हैं। इसलिए इनके कारखानों के खिलाफ तमाम शिकायतें होते हुए भी इन कंपनियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करवाना बहुत मुश्किल हो गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन देशी-विदेशी निजी कंपनियों ने हमारी शासन-प्रशासन व्यवस्था में जबदस्त घुसपैठ की है तथा हमारे राजनेताओं व अधिकारियों की सोच बदली है, यह प्रक्रिया अत्यंत खतरनाक है। एक प्राकृतिक संसाधन व आम जनता का उस पर पारंपरिक अधिकार कुछ मुनाफा कमाने की सोच से प्रेरित निहित स्वार्थ वाला वर्ग छीनना चाहता है। यदि जनता जागरूक न रही तो उसके जीवन का एक प्रमुख आधार देखते ही देखते उसके हाथों से निकल जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-6051499914521456243?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/6051499914521456243/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=6051499914521456243' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/6051499914521456243'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/6051499914521456243'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_21.html' title='पानी का निजीकरण और सरकारी रवैया'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SK2OaxQ1B4I/AAAAAAAAAgk/2wtJZ-GXrQA/s72-c/water+privatisation.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-8927477375901317307</id><published>2008-08-19T05:27:00.001-07:00</published><updated>2008-08-19T05:29:53.634-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यमुना'/><title type='text'>ज़रा सुनो तो, क्या कहती है ये यमुना!</title><content type='html'>&lt;strong&gt;बड़े दिनों बाद बेपरवाह बह रही है ये,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;के है मुश्किल थामना पानी को ज़ंजीरों में है। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों बड़े दिन बाद मुझे मौका मिला यमुना किनारा देखने का और दिल बाग़-बाग़ हो गया।पानी अजी पानी का क्या,लहरें यूँ उठ रही थी मानो आज इनका इरादा रुकने का नही है। रास्ते में आने वाले झाड़ , टूटे हुए पेड़, कूड़ा कुछ भी ऐसा नही था जो कि इसको रोक सके। हवा ऐसी कि जैसी पिछले ६-7 सालों में शायद ही चली हो।और नदी ऐसे बेपरवाह के जैसे उसे किसीसे कोई मतलब ही न हो, मानो कह रही हो "बहुत मौका दिया तुम्हे के तुम मुझे साफ़ करो. तुम तो इतने सालों में कामयाब नही हुए मगर मैंने इस बार कमर कस ली है के इस बारिश के मौसम में सारा कूड़ा और करकट, सारा गंद मुझे ही बहा के ले जाना है।" सच में मुझे ऐसे लगा कि जैसे यमुना पे बहार आई हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि कुछ लोगों को हो सकता है मेरा ऐसा कहना बुरा लगे कि "एक तो यमुना का जल स्तर बढ़ रहा है और ख़तरा भी मगर इस बन्दे को क्या पसंद आया इसका।" तो जनाब वैसे मेरा यमुना के साथ पुराना रिश्ता है। अगर में ये कहता हूँ कि बड़े दिन बाद किनारे पर गया तो इसमें मुझे अफ़सोस भी होता है, मगर वहां जाना मैंने उस बदबू के कारण छोड़ा जो कभी आपको नाक से कपड़ा हटाने नही देती। मैं लक्ष्मी नगर में रहता हूँ और इस इलाके को जानने वालों को पता होगा कि ये यमुना के किनारे ही बसा हुआ है। कभी अपना बचपन, अपनी उदासी के लम्हे, और अपनी पढाई के दिन सब वही हुआ करते थे। जब दिल करता कि यार बैचैनी हो रही है तब साइकिल लेकर या पैदल ही उस ओर चल पड़ते। सुबह को घूमने जाना हो या शाम को दोस्तों के साथ वक्त गुजारना हो, गर्मियों की छुट्टियां तो मानों वही ख़त्म होती थी। उसी इलाके के आसपास के खेतों ओर किनारे पर जमें पेड़ों से पत्ते तोड़कर अपनी प्रयोग की पुस्तक को सजाया जाता था। जब पता चला कि उदासी नाम की भी कोई चीज़ होती है तो भी वही जा बैठते थे। इसके बाद इम्तिहान की तैयारी, सब इकठ्ठा हुए और चल दिया यमुना के तीर।मुझे आज भी याद है हम कक्षा १० कि तैयारी कर रहे थे। फरवरी के माह में शाम को किनारे बैठे - बैठे ऐसी सर्द हवाएं चलने लगी कि मानो आज ये बैठने ही नही देंगी और हमने अपनी साइकिल उठा के वापस लौटना ही बेहतर समझा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर वो वक्त भी आया के जब यमुना के किनारे बैठना तो दूर, खड़े होना भी मुहाल होने लगा। ये ऐसा वक्त था जब बड़े ज़ोर शोर से यमुना बचाओ और यमुना सफाई अभियान चल रहे थे। हम ये सोचकर हैरान थे कि हो क्या रहा है। बजाये साफ़ होने के ये यमुना गन्दी क्यूँ होने लगी है। मगर कोई जवाब नही। और फिर धीरे यमुना का हाल ज़माने ने देखा और सब इस यमुना को गंदे नाले के नाम से जानने लगे। जब भी कोई इसे गन्दा नाला कहता मुझे बड़ा अफ़सोस होता था। मगर सच्चाई से मुँह फेरना काम नही देता। अपना भी मन हुआ कि किसी ऐसी संस्था से जुडा जाए जो इसे साफ़ करने का इरादा रखते हैं। कुछ संस्थाओं का पता भी चला मगर अधिकतर का इरादा सफाई से शोर ज़्यादा मचाने में था। हर कोई बस यही चाहता है कि सरकार कुछ करे और बाकी लोग बस नुक्ताचीनी करते रहे। ख़ुद का इरादा बस अखबार और टीवी पर ही आना होता था। आज भी जितनी संस्थाएं है अधिकतर अपना प्रदर्शन केवल टीवी के सामने ही करती है और उसके बाद अपने टेंट उखाड़ कर चलती बनती हैं। यहाँ भी दिल टूट गया तो फिर यमुना किनारे ही आकर बैठ गए और नाम पर एक कपड़ा रख लिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर यमुना को साफ़ करने का जो रास्ता आज यमुना ने दिखाया है हमें उसको समझना चाहिए। हमें यमुना को साफ़ करने कि ज़रूरत नही है। अपनी गन्दगी तो यमुना ख़ुद बहाकर ले जायेगी, ज़रूरत इस बात की है कि हम इसमें और गंदगी को न जाने दें। आज यमुना काफ़ी हद तक साफ़ है यदि इसमें आगे से हम गंदगी को जाने न दें तो ये दुबारा अपनी पुरानी रंगत में आ जायेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-8927477375901317307?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/8927477375901317307/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=8927477375901317307' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8927477375901317307'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8927477375901317307'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_19.html' title='ज़रा सुनो तो, क्या कहती है ये यमुना!'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-243110665188794024</id><published>2008-08-18T21:52:00.000-07:00</published><updated>2008-08-18T21:53:24.306-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भूजल'/><title type='text'>भूजल कृत्रिम पुनर्भरण योजना के प्रस्ताव तैयार करें</title><content type='html'>उदयपुर/ जिला कलक्टर कुलदीप रांका ने समस्त विकास अधिकारियों को निर्देश दिए है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में कूप द्वारा भू जल कृत्रिम पुनर्भरण योजना के प्रस्ताव तैयार करें ताकि कृषकों को अधिकाधिक लाभ दिलाया जा सके। &lt;br /&gt;जिला कलक्टर गुरुवार को कलक्ट्रेट सभागार में आयोजित कूप द्वारा भूजल कृत्रिम पुनर्भरण योजना संबंधी बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इस योजना का उद्देश्य निरन्तर गिरते हुए भूजल स्तर को रोकने तथा भूजल भण्डार में वृद्घि करने का है। इसमें गांवों में कृषि पैदावार में वृद्घि, आर्थिक सम्पन्नता व रहन-सहन में बदलाव आयेगा। इस योजना से फलोराइड प्रभावित क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता में भी सुधार होगा। &lt;br /&gt;उन्होंने बताया कि देश के सात राज्यों आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडू के साथ राजस्थान में भी लागू होने जा रही है। योजना की क्रियान्विति के लिए जिला स्तर पर क्रियान्वयन एवं मोनिटरिंग समिति का गठन भी किया गया है। उन्होंने सभी विकास अधिकारियों से अधिक से अधिक प्रस्ताव तैयार करवा कर प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। &lt;br /&gt;बैठक में मुख्य कार्यकारी अधिकारी बी.आर.भाटी ने बताया कि प्रस्ताव जिला स्तरीय समिति को प्राप्त होने के पश्चात लाभान्वित कृषकों को नाबार्ड के बक खातों में पुनर्भरण संरचना के लिए राशि जमा करवाई जाएगी। नाबार्ड संबंधित एजेन्सी को केपिसिटी बिल्डिंग, मोनिटरिंग, इम्पेक्ट एसेसमेंट के लिए राशि प्रदान करेगा। संरचना में लगाये जाने वाले आवक पाईप की गहराई आने वाले वर्षा जल प्रवाह को ध्यान में रखते हुए रखी जाएगी। उन्होंने बताया कि प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक मॉडल की संरचना, पंचायत समिति में नियुक्त अभियंता के द्वारा भूजल विभाग को दिशा निर्देश को तैयार किया जाना प्रस्तावित है। उन्होंने इस कार्य के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार कर काश्तकारों में जागरुकता लाने के भी निर्देश दिए। बैठक में अतिरिक्त जिला कलक्टर (प्रशासन) रामजीवन मीणा सहित समस्त विकास अधिकारी उपस्थित थे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-243110665188794024?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/243110665188794024/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=243110665188794024' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/243110665188794024'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/243110665188794024'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html' title='भूजल कृत्रिम पुनर्भरण योजना के प्रस्ताव तैयार करें'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-6002580907273333168</id><published>2008-08-08T00:02:00.001-07:00</published><updated>2008-08-08T00:19:20.792-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जल-दान की परंपरा'/><title type='text'>लोक जीवन में जल-दान की परंपरा</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SJvzU5vwx2I/AAAAAAAAAac/SjAV9N7AYvg/s1600-h/surya_namaskar.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SJvzU5vwx2I/AAAAAAAAAac/SjAV9N7AYvg/s320/surya_namaskar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5232042932545046370" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक गीत मैं रोज सुनता हूं `किसी प्यासे को पानी पिलाया नहीं, तो मंदिर में जाने से क्या फायदा।' प्यासे को पानी पिलाना लोक-जीवन में बड़ा पुण्य माना जाता है। ग्रीष्मकाल में कस्बों और नगरों में प्याऊ की व्यवस्था इसी पुण्य-बोध का परिणाम है, पर आज सभी स्थानों पर पानी विक्रय की वस्तु बन गया है। जिस समाज में कभी दूध नहीं बेचा जाता था, उसमें पानी के पाउच और पानी की बोतलें बिक रही हैं। जहां इनकी पहुंच नहीं है, वहां मटकों में भरा पानी बिक रहा है। यह बदलते व्यावसायिक युग की मानसिकता भी है और एक अनिवार्यता भी। जो चीज दुर्लभ होने लगती है, उसकी कीमत पहचानी जाने लगती है और फिर वह व्यावसायिक चलन में आ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी का अब व्यावसायिक मूल्य है। पीने के पानी को बेचने के लिए अरबों रुपयों का व्यवसाय किया जा रहा है। एक समय था, जब राज्य सत्ताएँ राहगीरों की प्यास बुझाने के लिए मार्ग में कुओं-बावड़ियों का निर्माण करती थीं। सामाजिक संस्थाएं और दानशील व्यक्ति भी ऐसे जल केन्द्र का निर्माण सार्वजनिक स्थानों और पानी की अनुपलब्धता वाले स्थानों में प्राथमिकता के आधार पर कराते थे और अशासकीय एवं धर्मार्थ संस्थाओं के माध्यम से पानी सुलभ होता था। प्याऊ का बदलता स्वरूप इन दिनों नलों में देखा जा सकता है। सार्वजनिक सुविधाओं के प्रति जैसी उदासीनता आम नागरिकों में पनपी वैसी उदासीनता सार्वजनिक जल-केन्द्र के संबंध में भी अनुभव की जा सकती है। नलों की तोड़-फोड़, उनसे व्यर्थ ही पानी बहना और ऐसे जल केन्द्र की स्वच्छता में अरुचि आदि कारणों ने हमारे समय के जल विषयक चिंतन को ही बदल दिया है। सार्वजनिक जल केन्द्र के पानी का प्रदूषित होना और उसे प्रदूषित समझना दोनों तरह की स्थितियों का प्रचलन आम सोच का विषय बना है। यह भी प्रचारित किया जा रहा है कि स्वास्थ्य के लिए बोतलबंद पानी ही पिया जाए। ऐसी परिस्थितियों में जल-दान का महत्व भी कम होता जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोक-परंपरा में जल-दान का महत्व अभी भी बना हुआ है। गांव में घर के दरवाजे पर आने वाले प्रत्येक आगंतुक का स्वागत आज भी जल पिला कर ही किया जाता है। घर पधारे अतिथि को जल पिलाना लोक-संस्कार में अब भी अपनी जगह जस का तस है। चैत्र का महीना जब आधा व्यतीत हो जाता है, तब सूर्य की किरणों का ताप इतना बढ़ने लगता है कि हवा में तीखी तपिश का अहसास होने लगता है। दोपहरी का विस्तार हो जाता है। आंगन में रखे जाने वाले पानी के घड़े घर के भीतर की घिनौची में चले जाते हैं। ऐसी स्थिति में घर के आसपास रहने वाले चिरई-चिनगुन, जो अक्सर आंगन में रखे बर्तनों में चोंच डुबाकर अपनी प्यास शांत कर लेते थे, पीने के लिए पानी प्राप्त करने में असमर्थ होने लगते हैं। इन पक्षियों की प्यास बुझाने के लिए गांव में घर के सायवान में, दहलान में अथवा खुले किन्तु छायादार स्थान में एक खुले पात्र में पानी टांग दिया जाता है। ज्यादातर ऐसा पात्र मिट्टी के घड़े को आधा फोड़कर बनाया जाता है। घड़े का नीचे वाला आधा हिस्सा तसलानुमा रहता है। इसमें पानी भी अच्छी मात्रा में भर जाता है। टूटे घड़े की गोलाई वाली सतह पर बैठी चिड़ियां पानी पीती रहती हैं। चिड़ियों को पानी पिलाना पुण्य का कार्य माना जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांवों में कुओं के पास बड़ा हौज बनाया जाता है। इस हौज में गर्मी प्रारंभ होते ही कुएं से पानी खींचकर भरने का रिवाज रहा है। सबेरे-सबेरे हौज को भर दिया जाता था। दिनभर गर्मियों में विचरण करने वाले पशु इस हौज से पानी पीते रहते थे। गांवों के रईस, मालगुजार और धनाढ्य जन कुएं और हौज बनवाया करते थे। उसे प्रतिदिन जल से आपूरित भी कराते थे। लोहे की लंबी सांकल में बंधा धातु का एक डोल कुएं की जगत से स्थायी रूप से बंधा रहता था। यहां से गुजरने वाले यात्रीगण इस डोल से पानी निकालते थे और अपनी प्यास शांत करते थे। पशु-पक्षियों और मनुष्यों को पानी पिलाने की ये प्रथाएं स्पष्ट करती हैं कि लोक-जीवन में पानी पिलाने को धार्मिक दृष्टि से पुण्य-कार्य माना गया था। आज ये प्रथाएं लुप्त प्राय हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जल-दान का महत्व देवताओं को जल समर्पित करने में भी रेखांकित किया जा सकता है। स्नान के उपरांत अंजुरी में जल लेकर सूर्य को समर्पित करने का विधान हमारे दैनिक क्रिया-कलापों में शामिल है। पांच या सात अंजुरी अर्घ्य सूर्य देवता को दिया जाता है। लोटे या धातु के अर्घा से भी जल समर्पित किया जाता है। देवताओं के श्री विग्रहों पर जल चढ़ाने की परंपरा है। प्राय तीर्थ-स्थानों में जलाभिषेक अनिवार्य रहता है। विभिन्न पवित्र नदियों का जल वर्षों तक घर में इसलिए रखा जाता है कि उसे किसी विशेष देवता को चढ़ाना है। एक धार्मिक विधान है कि गंगोत्री से लाया गया गंगाजल रामेश्वरम् में शंकर को समर्पित किया जाता है। गांवों की दिनचर्या में यह संभव नहीं हो पाता है कि गंगोत्री की यात्रा करने वाला तत्काल रामेश्वर की यात्रा कर सके। इसलिए गंगाजल कुछ दिन घर में निवास करता है। अनुकूल समय आने पर जल चढ़ाने के लिए दक्षिण की अलग से तीर्थयात्रा की जाती है। लोक में इन दोनों यात्राओं के नाम जल केन्द्रित है। गंगोत्री की यात्रा जल भरने जाने की यात्रा होती है, जबकि रामेश्वरम की यात्रा जल चढ़ाने की यात्रा होती है। यह देवताओं के लिए किया गया जलदान ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैशाख माह में शंकर की प्रस्तर पिंडी पर दिन-रात जल प्रवाहित किया जाता है। शिव स्थापना चाहे आंगन के तुलसी चौबर पर हो या मंदिर के गर्भगृह में, सभी जगह एक माह तक उनको जल से भिगोया जाता है। प्रस्तर पिंडी से थोड़ी अधिक ऊंची एक तिपाई पर एक घड़ा रखा जाता है, घड़े की तलहटी में छेद किया जाता है। इस छेद से एक बत्ती सीधे शंकर की पिंडी के शीर्ष पर लटकती रहती है। इस बत्ती से एक-एक बूंद पानी शंकर जी पर टपकता रहता है। घड़ा खाली होते ही फिर से भर दिया जाता है। शिव-मंदिरों में यह जल-दान परंपरा अभी भी सभी जगह प्रचलित है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार शंकर ने जब समुद्र-मंथन के समय समुद्र से निकले विष का पान कर लिया था तब यह विष उनके गले में इसलिए अटक कर रह गया था कि विष-पान के बाद शंकर को यह ध्यान आया कि उनके हृदय में तो विष्णु का निवास है। इसलिए यदि यह विष गले से नीचे उतर गया तो विष्णु को कष्ट होगा। अत शंकर ने विष को अपने गले में ही धारण कर लिया। इस प्रक्रिया में उनका गला नीला पड़ गया। वे तब से नीलकंठ कहलाते हैं। शंकर ने चूंकि विष लोक-कल्याण के लिए पिया था और विष-पान की पीड़ा को सहा था, इसलिए वे कल्याणकारी शिव के नाम से सम्बोधित किए गए। सामाजिक स्तर पर भी जल-दान विधान विभिन्न तिथि-त्योहारों पर किया गया है। समस्त उत्तर भारत में `बसुआ अष्टमी' का आयोजन ग्रीष्म में ही किया जाता है। पूरा घर इस दिन बासी भोजन करता है। गांव की कन्याओं को आमंत्रित करके उन्हें कोरे घड़े में शीतल जल भरकर दान दिया जाता है। अक्षय तृतीया को भी घड़ों का पूजन किया जाता है। सात घड़ों में पानी भरा जाता है। आम के पत्ते और आम के फल इन घड़ों पर रखे जाते हैं। पूजन के बाद इन घड़ों को पानी सहित दान में दे दिया जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक काल में जल-दान के पुण्य को एक बेहतर सामाजिक सेवा के रूप में अनुभव किया जा सकता है। रेलवे स्टेशनों पर अनेक सामाजिक संगठन जल-दान का सेवा-कार्य करते हैं। शीतल-स्वच्छ जल की आपूर्ति हेतु समर्पित कार्यकर्ता इस कार्य में संलग्न रहते हैं। बाजारों और मेलों में भी इस तरह की निशुल्क जलापूर्ति जल-दान के महत्व का बोध कराने वाली ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जल-दान की इस परंपरा का पालन करने के लिए हमें अब अलग तरह से सक्रिय होना पड़ेगा। जल की कमी का सामना करना धीरे-धीरे कठिन होता जा रहा है। ऐसे समय में दान करने के लिए जल की प्राप्ति असंभव हो जाएगी। इसलिए जल-संग्रहण करना अब जरूरी हो गया है। जल-संग्रहण ही प्रकारांतर से जल-दान होगा। हमारे घर के आस-पास और घर पर बरसने वाला पानी व्यर्थ न बहे, इसकी एक-एक बूंद बचाने का हमें प्रयास करना होगा। जल-संग्रह की जो अनेक तरकीबें हैं- उन्हें हम अपनाएं और अपनी धरती को जल से लबालब बनाए रखें। यह हमारा पृथ्वी के प्रति जल-दान होगा। इस जल-दान में ही सृष्टि-रक्षा का भाव सन्निहित है। इस तकनीक से लोक परिचित था। इसी आधार पर उसने तालाबों की संरचना की थी और खेतों में बंधानों को महत्व दिया था। यह समस्त आयोजन पृथ्वी को सुजलां-सुफलां बनाने का भी था और पृथ्वी का यह जलाभिषेक भी था। जल से संबंधित लोक आचरण प्रजातांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने वाला रहा है। हम जल के इस भाव को सुरक्षित रखने का प्रयास करके ही जल को सर्वसुलभ बना सकते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-6002580907273333168?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/6002580907273333168/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=6002580907273333168' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/6002580907273333168'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/6002580907273333168'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_9520.html' title='लोक जीवन में जल-दान की परंपरा'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SJvzU5vwx2I/AAAAAAAAAac/SjAV9N7AYvg/s72-c/surya_namaskar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3018543734380700502</id><published>2008-08-08T00:02:00.000-07:00</published><updated>2008-08-08T00:03:49.497-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पाताल जा पहुंचा पानी'/><title type='text'>पाताल जा पहुंचा पानी</title><content type='html'>वीरेंद्र राजपूत&lt;br /&gt;भोपाल.प्रदेश में पानी के लिए जमीन की अंधाधुंध खुदाई जारी है। यही कारण है कि भोपाल समेत पूरे प्रदेश में जमीन का पानी लगातार नीचे जा रहा है। सूखते कुएं, तालाब और ट्यूबवैल इसकी नजीर हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि अब भी लोगों ने पानी के महत्व को नहीं समझा है। जानकारों का कहना है कि पानी को रीचार्ज करके ही पानी के ‘संकट’ से पार पाया जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुताबिक वर्ष 1998 से 2007 तक प्रदेश में भूजल स्तर में गिरावट के ट्रेंड पर गौर करें तो यह बात सामने आती है कि बुंदेलखंड, बघेलखंड, निमाड़ और चंबल इलाकों में भू जलस्तर में तेजी से गिरावट आ रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे सिद्ध होता है कि राज्य शासन द्वारा पिछले तीन वर्र्षो से चलाए जा रहे जलाभिषेक अभियान में मैदानी प्रगति नहीं हुई है। जब तक पानी बचाव के लिए बंड, पोखर, तालाब आदि का जिलेवार मास्टर प्लान अथवा एटलस तैयार नहीं होगा, तब तक किए जाने वाले सारे उपाय व्यर्थ साबित होंगे। मालवा, महाकौशल और मध्य भारत में जरूर कुछ स्थानों पर भू जलस्तर में बढ़ोतरी हुई है। इसका कारण इन इलाकों में सामान्य या इससे अधिक बारिश होना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानकारी के मुताबिक भू जलस्तर में कमी आने से भविष्य में कई जिले जल अभाव ग्रस्त की श्रेणी में आ सकते हैं। इसकी रोकथाम के लिए बरसातीपानी को रोकने के लिए अगर जमीनी स्तर पर काम नहीं हुए तो नतीजे गंभीर हो सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संवेदनशील जिले&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रदेश में 20 से अधिक जिले ऐसे हैं, जहां भूजल स्तर में कमी के ट्रेंड में प्रति वर्ष 20 सेंटीमीटर या उससे अधिक की कमी आ रही है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के मुताबिक भू जलस्तर की दृष्टि से इन जिलों को संवेदनशील माना जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;इन जिलों में है भयावह हालात&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भिंड, बुरहानपुर, छतरपुर, मुरैना, टीकमगढ़, उमरिया, बालाघाट, ग्वालियर, गुना, सीधी, रीवा, श्योपुरकलां, सागर, रायसेन, शिवपुरी, शाजापुर, राजगढ़, पन्ना, नरसिंहपुर, खंडवा, मंडला, दतिया और देवास। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लोगों में जागरूकता की जरूरत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भू जलस्तर में कमी चिंता का विषय है। लोग जमीन से पानी तो भरपूर निकाल रहे हैं, पर पानी को रीचार्ज करने को लेकर कोई गंभीर नहीं है। इसलिए भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। पानी बचाने को लेकर लोगों में जागरूकता जरूरी है। लोगों को चाहिए कि वे पानी की बर्बादी रोकें और पानी को रीचार्ज करें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- डा. डीके गोयल, वरिष्ठ वैज्ञानिक सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.bhaskar.com/2008/05/08/0805080047_water.html"&gt;http://www.bhaskar.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3018543734380700502?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3018543734380700502/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3018543734380700502' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3018543734380700502'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3018543734380700502'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post_08.html' title='पाताल जा पहुंचा पानी'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-1762095051113423903</id><published>2008-08-03T21:37:00.000-07:00</published><updated>2008-08-03T21:38:22.796-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ओस की बूंदों'/><title type='text'>पहरेदार ओस की बूंदों के</title><content type='html'>भुज [कच्छ], [आशुतोष शुक्ल]। आईआईएम अहमदाबाद के प्रो. गिरजा शरण, कोठारा गांव के हारुन व रफीक बकाल, सात सौ साल से भी अधिक पुराने जैन तीर्थ सुथरी के प्राण जीवन गोर और सायरा प्रायमरी स्कूल के हेडमास्टर सोढ़ा प्रताप सिंह में भला क्या समानता हो सकती है? अलग-अलग पृष्ठभूमि के इन लोगों में बस एक विचार साझा है। वे सब ओस की बूंदों के पहरेदार हैं। उन्होंने ओस की बूंद-बूंद जमा करके टंकियां भरने का करिश्मा कर दिखाया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैदानी इलाकों में लोगों को पानी बर्बाद करते हुए देख कर दुख होता है। लेकिन समुद्र से लगे कोठारा में, जहां चार सौ फीट धरती खोदने पर भी पानी की गारंटी नहीं, जहां पांच बार खोदने पर चार दफा खारा पानी निकलता है, वहां ओस की बूंदों से जमा पानी पीते बच्चों को देखना सुखद अहसास है। जल संरक्षण का यह वह चमत्कार है जो न केवल भारत के साढ़े सात हजार किलोमीटर लंबे समुद्र तटों बल्कि पर्वतीय और रेगिस्तानी इलाकों की भी कायापलट कर सकता है। यही वजह है कि इजरायल, यूनान और चिली जैसे देशों में पानी बचाने के इस निराले तरीके पर अब गोष्ठियां हो रही हैं। अपने मैदानों में यह कल्पना भी नहीं की जा सकती है कि इस विधि से गुजरात के तटीय क्षेत्रों में एक व्यक्ति को औसतन चार लीटर पेयजल रोज दिया जा सकता है। 120 वर्ग फुट में आठ महीने में करीब बारह सौ लीटर पेयजल बनाया जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अभिनव प्रयोग का ही कमाल है कि पाकिस्तान सीमा से लगे कोटेश्वर में गुजरात मिनरल डेवलेपमेंट कारपोरेशन ने 850 वर्ग मीटर में यह काम शुरू किया है। कृष्ण की द्वारका सहित कई और स्थानों पर भी 'ड्यू वाटर हार्वेस्टिंग' सफलतापूर्वक हो रही है। आइए समझें यह प्रयोग है क्या? इसकी शुरूआत दिलचस्प है। अहमदाबाद से पांच सौ किलोमीटर दूर कोठारा गांव में आईआईएम अहमदाबाद का ग्रीन हाउस है। अप्रैल 2002 की एक सुबह कर्मचारी हारुन ने ग्रीन हाउस की ढलवां छत के नीचे पानी की काफी मात्रा देखी। उसने यह बात इलाहाबाद में पढ़े और मूलत: कृषि वैज्ञानिक प्रो. गिरजा शरण को बताई। प्रो. शरण को भी ग्रीन हाउस के आसपास की जमीन गीली लगी तो उन्होंने पानी एकत्र करके अहमदाबाद जांच के लिए भेजा। प्रो. शरण कहते है जांच रिपोर्ट ने हमारा उत्साह बढ़ा दिया, पता चला कि यह तो शुद्ध पेयजल है। यह वह रिपोर्ट थी जिसने जल संरक्षण में मानों क्रांति ला दी। यह अलग बात है कि इस खोज के खरीददार नहीं मिले। प्रो. शरण को अगले प्रयोगों के लिए दो लाख रुपये चाहिए थे, लेकिन काफी कोशिशों के बाद कोई संस्थान उनकी मदद को आगे नहीं आया। भाग्य से उसी समय विश्व बैंक ने जल संरक्षण पर प्रोजेक्ट आमंत्रित किए। प्रो. शरण ने इस रिपोर्ट को भेजा तो उन्हें बीस हजार डालर का इनाम मिल गया। यही रकम प्रोजेक्ट में लगी। प्रो. शरण बताते हैं कि कोठारा और दूसरे समुद्र तटीय क्षेत्रों में आश्चर्यजनक रूप से अक्टूबर से अप्रैल तक यानी आठ महीने ओस पड़ती है। और इस अवधि का फायदा उठाया जा सकता है। इस तकनीक को इंजीनियरिंग संस्थानों और हाइड्रोलाजिस्टों को पढ़ाने की जरूरत है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामान्य है तरीका &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओस की बूंदों को पानी में बदलने का तरीका सामान्य है। मकान या स्कूल की छत पर सीमेंट, प्लास्टिक, एल्युमिनियम, फाइबर या टीन की ढालू चादरें डालनी होती हैं। वैसे आईआईएम ने पाली एथलीन में कुछ और मिश्रण डालकर नई चादर तैयार की है। इमारत के नीचे पाइप होते हैं जो एक बड़े ड्रम से जुड़े होते हैं। जरूरत हुई तो स्कूल आदि में इस पानी को पक्के अंडर ग्राउंड टैंकों में जमा कर लेते हैं। इसी पानी से फूलों की सिंचाई हुई तो कच्छ जैसे इलाके [सुथरी] में बिल्वपत्र, हल्दी, नींबू और सायरा में गुलमोहर फलने लगे। यह प्रयोग मामूली लागत में सौ वर्ग फीट पर भी हो सकता है। कोटेश्वर में तो जमीन पर चादर डाली गई है। प्रो. शरण के अनुसार मध्य काल में सहारा रेगिस्तान में चलने वाले बद्दू और अरब इसी तकनीक के सहारे पानी पाते थे। उनका दावा है कि रेगिस्तान में ड्यूटी करने वाले सिपाही के लिए छाते जैसी एक ऐसी किट बनाई जा सकती है जो उसके बैग में आ जाए और हर सुबह एक-डेढ़ लीटर पेयजल दे सके।&lt;br /&gt;__________________&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या करें, अपना तो कुछ ऐसा ही भुरभुरा स्वभाव है |&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-1762095051113423903?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/1762095051113423903/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=1762095051113423903' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/1762095051113423903'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/1762095051113423903'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='पहरेदार ओस की बूंदों के'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-5129402589114704952</id><published>2008-06-27T05:54:00.001-07:00</published><updated>2008-06-27T05:56:45.583-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास्य व्यंग्य'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पानी डरा रहा है'/><title type='text'>पानी डरा रहा है -प्रेम जनमेजय</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SGTje5oxGrI/AAAAAAAAAaE/Sdpo10XFvLA/s1600-h/pani.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SGTje5oxGrI/AAAAAAAAAaE/Sdpo10XFvLA/s320/pani.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216544388409268914" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;strong&gt;हास्य व्यंग्य &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;मैं दिल्लीवासी हूँ इसलिए मेरे नल में दिल्लीवाली यमुना का जल आता है, हरियाणा या उत्तर प्रदेश वाली यमुना का जल नहीं। आप भी तो महाराष्ट्र, सौराष्ट्र आदि राष्ट्रों के वासी होंगे और आपके नल में भी आपके राष्ट्र वाला पानी ही आता होगा। तो मित्रों मेरे नल में जो दिल्ली वाली यमुना का जल आता है उसको पीते ही आपको ईश्वर समीप दिखाई देने लगता है। ऐसे ही पवित्र जल में नहाते हुए मैं नहाने के अतिरिक्त गा रहा था... कान्हा तेरी यमुना मैली हो गई, दिल्ली के पाप धोते-धोते।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राधा कांत ने तो मेरी पुकार नहीं सुनी, राधेलाल ने सुन ली। राधेलाल मेरे पड़ोसी हैं, भगवान ऐसा पड़ोसी सब को दे, निंदक को नेवरे रखने की आवश्यकता खत्म हो जाती है। राधेलाल में विरोधी दल की आत्मा का निवास है इसलिए मेरे विरोध का कोई अवसर वो चूकते नहीं हैं। इस बार भी नहीं चूके और मेरी पत्नी के सामने मेरे फ़िल्मी ज्ञान की खिल्ली उड़ाते हुए बोले, ''देखा भाभी जी इसे कोई भी काम सही नहीं आता है। इसे आसान-सा गाना नहीं आता है। प्यारे गाना इस तरह से है- राम तेरी गंगा मैली हो गई पापियों के पाप धोते-धोते। यमुना ने आज तक किसी के पाप धोए हैं?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच कहा राधेलाल ने कि यमुना ने पाप धोए नहीं हैं, एकत्रित ही किए हैं, ख़ासकर दिल्ली वाली यमुना ने। और सच कहा मेरी पत्नी ने, ''अरे भाई साहब, इन्होंने आजतक कोई काम सही किया है जो अब करेंगे? किया होता तो क्या हम इस दो कमरों के सरकारी मकान में सड़ रहे होते, इनके साथ काम करने वाले शर्मा जी की तरह तिमंज़िला कोठी न होती हमारी? हमारी तो गंगा और यमुना क्या मैली होंगी, उनमें तो पानी ही नहीं है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पत्नी की बात को सदा की तरह अनसुना करते हुए कहा, ''पर राधेलाल हमारी दिल्ली की नदी तो यमुना है, हम तो दिल्ली की ही बात करेंगे। वैसे भी राधेलाल वो गंगा हो या यमुना, कृष्णा हो या कावेरी सभी के किनारों पर इन नदियों को मैला करने वाले उपादान-- विधानसभाएँ, पुलिस स्टेशन, सरकारी कार्यालय आदि मौजूद हैं। ये गीत तो किसी भी नदी के साथ गाया जा सकता है। जहाँ नदी न हो समुद्र के साथ गा लो।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राधेलाल ने फिर मेरी खुश्की उड़ाते हुए कहा, ''गा लो पर प्रेम भाई जितना गाना है, ये गाने आप अधिक नहीं गा पाएँगे क्योंकि बहुत जल्दी बिन पानी सब सून होने जा रहा है। भविष्यवाणी हो चुकी है कि अगला विश्वयुद्ध पानी पर लड़ा जाएगा। और आप तो हिंदी वाले हैं जानते ही हैं कि रहीम ने बहुत पहले ही चेता दिया था, ''रहिमन पानी रखिए, बिन पानी सब सून। हमने पानी रखा नहीं तो अब सब सून होने ही जा रहा है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने पाया मेरा पड़ोसी होने और चिर विरोधी होने के बावजूद राधेलाल मुझसे सहमति जता रहा है। वो मेरी ही तरह चिंतित है। मैंने कहा, ''राधेलाल जी यह क्या पाकिस्तान की तरह आप अपना पड़ोस-धर्म भूल रहे हैं, आपको तो मेरे निरंतर विरोध से मुझे आतंकित करना है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राधेलाल ने कहा, ''प्रेम भाई जब मानवता पर संकट हो तो हमें छोटे विरोध भूल ही जाने चाहिए। आप तो देख रही रहे हैं कि पीने का ही नहीं मनुष्य के अंदर का पानी भी सूख रहा है। मानवीय रिश्ते सूखकर काँटा हो गए हैं। हमारे सामाजिक जीवन में से गाँव, मोहल्ला तो गायब हो ही चुके थे, अब परिवार भी छिन गया है। अलग-अलग स्वाद वाला पानी गायब हो गया है, रह गया है तो एक ही स्वाद वाला मिनरल वॉटर। बदलते होंगे कुछ कोस में भाषा और कुछ कोस में पानी, आजकल कुछ नहीं बदलता। मैं पशुवत जीवन जीने वाले मनुष्य की बात नहीं कर रहा हूँ जो आज भी जोहड़, तालाब और कुँओं का पानी पीता है और अपनी भाषा बोलता है, मैं तो उस सभ्य मनुष्य की बात कर रहा हूँ जो मिनरल वॉटर पीता है और पाँच सितारा भाषा बोलता है। ऐसे सभ्य मनुष्य कितने कोस चल लें उनकी भाषा और पानी नहीं बदलता है। सभ्य मनुष्य तो दूसरों को सभ्य बनाता है ताकि उसकी सभ्यता टिकी रहे और उसे सँभालने वाले गुलाम मिल जाएँ। आप तो जानते ही हैं कि आजकल अमेरिका विश्व को सभ्य बनाने में लगा हुआ है। उसने हमारे देश को बता दिया है कि हमारा खानपान असभ्य है और इसके कारण ही विश्व में अन्न संकट पैदा हुआ है। वो हमें बता रहा है कि हमारे खानपान की आदतें ठीक नहीं हैं और हमें खाने की तमीज़ नहीं है। हमारी राजनीति, हमारे शेयर बाज़ार, हमारी युवा शक्ति आदि तो वहाँ से संचालित हो ही रहे हैं, वो दिन दूर नहीं जब हमारा खानपान भी वहाँ से संचालित होने लगेगा।'' ये कहकर राधेलाल ऐसे उदास हो गया जैसे वो संस्कारयुक्त बहन जी दिखने वाली भारतीय लड़की का पिता हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी सदा से डराता रहा है कभी अपने अतिरेक से और कभी अपने सूखेपन से। ज़मीन का पानी सूख रहा है और समुद्र का पानी किनारे बसे शहरों की लीलने के लिए अपना विकास कर रहा है। मुझे विश्वास हे कि जबतक मनुष्य के अंदर का पानी नहीं सूखेगा, राधेलाल की तरह चिर विरोधी होने के बावजूद मनुष्य हर खतरे के ख़िलाफ़ एकजुट रहेगा, तबतक पानी चाहे मानव को कितना डरा ले पर पराजित नहीं कर सकेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२६ मई २००८ &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/vyangya/2008/panidararahahai.htm"&gt;http://www.abhivyakti-hindi.org&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-5129402589114704952?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/5129402589114704952/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=5129402589114704952' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5129402589114704952'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5129402589114704952'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_27.html' title='पानी डरा रहा है -प्रेम जनमेजय'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SGTje5oxGrI/AAAAAAAAAaE/Sdpo10XFvLA/s72-c/pani.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-8678412658506841576</id><published>2008-06-26T22:51:00.000-07:00</published><updated>2008-06-26T22:52:07.054-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बुंदेलखंड'/><title type='text'>यूपी में दरकती धरती से हड़कंप</title><content type='html'>लखनऊ: उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने सूखाग्रस्त बुंदेलखंड समेत कई इलाकों में जमीन फटने की बढ़ती घटनाओं की जांच का निर्देश अधिकारियों को दिया है। जहां-जहां धरती दरकी है, उस इलाके को डेंजर जोन मानते हुए हाई अलर्ट घोषित किया गया है। इस बीच, इलाहाबाद जिले के यमुना पार इलाके के कई गांवों में जमीन में दरार पड़ने के बाद लोगों में दहशत फैल गई। प्रभावित गांव मेजा तहसील में हैं। वहां भूजल के गिरते लेवल पर लंबे समय से चिंता जताई जा रही थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रामीणों ने बताया कि दरारें 3-4 फुट तक चौड़ी और 20 फुट तक लंबी हैं। आसपास के कुछ मकानों में भी दरारें देखी गईं। इलाहाबाद जिले से होकर गुजरने वाले दिल्ली-हावड़ा रेल मार्ग को भी खतरे की आशंका जताई जा रही है। कानपुर देहात, कानपुर शहर, औरेय्या, इटावा, और फतेहपुर में बुंदेलखंड की तरह जमीन में दरार पड़ने की खबर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जमीन फटने की घटनाओं की जानकारी मिलने पर मायावती ने पिछले शुक्रवार को यहां एक उच्चस्तरीय बैठक भी की थी। राज्य सरकार को सौंपी गई अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने दावा किया कि जमीन फटने की घटना किसी भूगर्भीय गतिविधि के बजाए भूगर्भ जल के अत्यधिक दोहन की वजह से हो रही हैं। इन घटनाओं की जांच कर रहे भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण ने राज्य सरकार को भूगर्भ जल के अत्यधिक दोहन को नियंत्रित करने और भूगर्भ जल संसाधन को बढ़ाने के लिए तुरंत कदम उठाने का सुझाव दिया है। टीमें हमीरपुर, जालौन और इटावा भेजी हैं। वह इस बारे में राज्य सरकार को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सोमवार को दे सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वेक्षण के उप महानिदेशक दीपक श्रीवास्तव के अनुसार सूखाग्रस्त इलाकों में जमीन फटने या दरार पड़ने की घटनाएं भूगर्भ जल के अत्यधिक दोहन की वजह से हो रही हैं। पिछले हफ्ते इस क्षेत्र में हुई बारिश की वजह से भूमिगत जल की पहली परत रीचार्ज हो गई, जिससे तनाव कम होने पर जमीन में दरार पड़ गई। हमीरपुर और जालौन जिलों के गांवों का दौरा करने वाली टीम ने पाया कि जमीन फटने की घटनाएं उन्हीं जगहों पर हुई हैं, जहां पानी के अत्यधिक दोहन की वजह से भूमि की सतह कमजोर हो गई थी। श्रीवास्तव ने इस बात से इनकार किया कि इस तरह की घटनाएं भूकंप आने का पूर्व संकेत हो सकती हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-8678412658506841576?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/8678412658506841576/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=8678412658506841576' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8678412658506841576'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8678412658506841576'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_8237.html' title='यूपी में दरकती धरती से हड़कंप'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-1438162915969699101</id><published>2008-06-26T22:46:00.000-07:00</published><updated>2008-06-26T22:48:26.440-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भूगर्भ जल'/><title type='text'>भूगर्भ जल में भी पांव पसार रहा प्रदूषण</title><content type='html'>लखनऊ, 9 जून : गिरते भूजल स्तर से निपटने की रणनीति बना रहे प्रदेश में अब धरती के नीचे बह रहे पानी में भी प्रदूषण का प्रकोप पांव पसार रहा है। प्रदेश के छह जिलों में भूजल फ्लोराइड से प्रदूषित हो चुका है, जबकि पांच जिलों के भूजल में आर्सेनिक की उपस्थिति दस्तक दे चुकी है। लखनऊ में जमीन के नीचे उथले या प्रथम स्तर के पानी में नाइट्रेट की मात्रा अधिक मिली है। आगरा व मथुरा में भूगर्भ जल खारा हो चुका है, जबकि कानपुर में भूजल के अधिक नमकीन होने के साथ ही कुछ क्षेत्रों में पानी में क्लोराइड का प्रदूषण भी पाया गया है। कानपुर में ही जाजमऊ के चमड़ाशोधन उद्योगों से रिसा क्रोमियम भूगर्भ जल में इतना घुल चुका है कि वहां के पानी का रंग ही पीला हो गया है। यह तथ्य केंद्रीय भूगर्भ जल बोर्ड द्वारा प्रदेश में टयूबवेल व हैंडपम्प के पानी के नमूनों की रसायनिक जांच में सामने आये हैं। रिपोर्ट के मुताबिक मथुरा और आगरा का भूजल इतना खारा हो चुका है कि वहां अधिकांश सम्पन्न लोग रिवर्स आसमोसिस प्लांट द्वारा भूजल शोधित कर पी रहे हैं जबकि गरीब लोग इस महंगी तकनीक का इस्तेमाल न कर पानी के कारण हैंडपंप का पानी पी रहे हैं और इसी के चलते बीमार हो रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-1438162915969699101?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/1438162915969699101/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=1438162915969699101' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/1438162915969699101'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/1438162915969699101'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_1398.html' title='भूगर्भ जल में भी पांव पसार रहा प्रदूषण'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-2866567129779964934</id><published>2008-06-26T19:37:00.002-07:00</published><updated>2008-06-26T19:43:22.534-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='धरती फटने के हालात'/><title type='text'>बागपत में भी बन रहे धरती फटने के हालात</title><content type='html'>बागपत। भूजल स्तर गिरावट में यूपी में बागपत नम्बर वन पर पहुंच चुका है। जिले में हर साल भूजल रिकार्ड 70 सेमी गिर रहा है, पर न तो प्रशासन चिंतित है और न लोग ही भूजल के अतिदोहन से बाज आ रहे हैं। जिस तेजी से यहां पर जलस्तर गिर रहा है, उससे कभी भी धरती फटने जैसे हालात बन सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ध्यान रहे कि यूपी में हमीरपुर, कानपुर देहात, इलाहाबाद तथा उन्नाव आदि में जमीन फटने की घटनाएं हो चुकी हैं। भूगर्भ जल शास्त्री मान चुके हैं कि वहां धरती फटने की वजह भूजल का अति दोहन है। दरअसल निरन्तर पानी निकाले जाने से धरती की सतहों के बीच खाली जगह बन गई। तब ऐसी घटनाएं घटीं। फिर तो बागपत में भी कभी भी धरती फट सकती है, क्योंकि यहां तो भूजल का अतिदोहन जारी है। 1.2 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती होती है और नहरों में पानी न होने से शत-प्रतिशत सिंचाई भूगर्भ जल से की जाती है। सत्तर फीसदी रकबा पर गन्ने की पैदावार ली जाती है। गन्ना की फसल को सबसे ज्यादा सिंचाई चाहिए। बिजली व इंजन चलित करीब चालीस हजार नलकूपों को दिन रात धरती के पेट से पानी निकालते देखा जा सकता है। यूं भी घर-घर सब-मर्सिबल पम्पों से भूगर्भ जल का अतिदोहन जारी है। चौदह हजार इंडिया मार्का हैण्डपम्प तथा तीस हजार शैलो हैण्डपम्पों से भी भूगर्भ जल का दोहन होता हैं। यह वजह है कि भूगर्भ जल गिरावट के मामले में यूपी में बागपत नम्बर वन पर पहुंच चुका है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूगर्भ जल विभाग उत्तर प्रदेश ने 10 जून को स्मारिका जारी की है। उसका अवलोकन करने पर साफ हो जाता है कि जनपद बागपत में रिकार्ड 70 सेमी भूगर्भ जल की गिरावट प्रति वर्ष हो रही है, जो प्रदेश में सर्वाधिक है। बागपत के छह में से बिनौली व पिलाना अति दोहित तथा छपरौली व खेकड़ा क्रिटिकल श्रेणी में काफी पहले आ चुके हैं। विस्फोटक हालात हैं। हालांकि अब लोगों को दुष्परिणाम भी भुगतना पड़ रहा है। गत पांच साल में 10 हजार से ज्यादा नलकूप तथा 1000 इंडिया मार्का हैण्डपम्प और 70 हजार शैलो हैण्डपम्प ठप हो चुके हैं। भूगर्भ जल स्तर 165 फुट से भी ज्यादा गहरे तक पहुंचने से बाकी नलकूपों से भी कम पानी निकलता है। चौगामा समेत कई क्षेत्रों में तो हालात यह है कि यदि एक नलकूप पहले चालू हो जाये तो फिर दूसरे नलकूपों से पानी ही नहीं निकलता। अगर ऐसे में बागपत में भी धरती फटने की घटना घट जाये तो फिर आश्चर्य न होगा। सोचनीय बात यह भी है कि भूगर्भ जल के अतिदोहन से न तो लोग ही बच रहे हैं और न ही वाटर रिचार्ज की योजनाएं परवान चढ़ती नजर आ रही हैं। आदर्श जलाशय योजना हो चाहे सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना रही हो या कोई और तालाबों की खुदाई कागजों तक सिमट कर रह गई है। जो तालाब खुदें भी हैं उनमें से ज्यादातर सूखे पड़े हैं। 1,074 तालाब तो अभी खुदने के इंतजार में हैं। फिर कैसे वाटर रिचार्ज होगा? प्रभारी सीडीओ माखन लाल गुप्ता भी मानते हैं कि भूजल गिरावट में बागपत का प्रदेश में पहला स्थान है। पर राहत की बात यह है कि भूजल विकास के मामले भी बागपत प्रदेश में दूसरे स्थान पर है। यहां भूजल विकास दर विकास की दर 98.23 प्रतिशत है। इस मामले में पहला स्थान जनपद बदायूं का है जहां भूजल विकास दर 100.85 प्रतिशत है। उनका यह भी कहना है कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के धन से भी वाटर रिचार्ज का कार्य कराया जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_4569135.html"&gt;http://in.jagran.yahoo.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-2866567129779964934?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/2866567129779964934/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=2866567129779964934' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/2866567129779964934'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/2866567129779964934'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_4367.html' title='बागपत में भी बन रहे धरती फटने के हालात'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3928001306612967005</id><published>2008-06-26T19:37:00.001-07:00</published><updated>2008-06-26T19:39:43.837-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फटी धरती'/><title type='text'>एक सप्ताह में दर्जन भर स्थानों में फटी धरती</title><content type='html'>बिन्दकी (फतेहपुर)। तहसील क्षेत्र में एक सप्ताह के अन्दर लगभग एक दर्जन स्थानों पर धरती फटने की घटनाओं से किसानों में दहशत का माहौल रहा। अब भी किसान खेत व बगीचों में फूंक-फूंक कर कदम रखते है। सबसे अधिक धरती फटने की घटनाएं अमौली विकास खंड क्षेत्र में रही। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्षेत्र में धरती फटने की पहली घटना चौदह जून को ग्राम शिवरी में हुई थी, जिसमें शिवबरन के खेल में तीस मीटर लम्बी एवं एक फीट चौड़ी दरार हो गयी थी इसके बाद पन्द्रह जून को चार स्थानों में धरती फटी, जिसमें अमौली के बेहटा गांव के हनुमान प्रसाद व राम किशोर की बाउन्ड्रियों से घिरी भूमि फट गयी। जिसकी लम्बाई पचास-पचास मीटर थी। इसी दिन ग्राम सैठी में महादेव प्रसाद की तथा विक्रमपुर में हिम्मत सिंह की भूमि फट गयी। सोलह जून को फिर तीन घटनाएं हुई। जिसमें अमौली कस्बे के समीप मेढ़ापाटी गांव मे समरजीत पाल के घर के पास तथा धमना खुर्द में संतोष के खेत तथा शिवराज सिंह के बाम में तीस-तीस मीटर लम्बी तथा दो फिट चौड़ी में धरती फट गयी। उन्नीस जून को बिन्दकी तहसील के ग्राम फरीदपुर गांव लगभग आठ फिट के व्यास तथा अथाह गहराई में धरती धस गयी, जो क्षेत्र में कौतूहल का विषय बन गया। सैकड़ों लोग इसे देखने के लिए एकत्र हो गये। इसे देखने के लिए तहसीलदार भी मौके पहुंचे थे। गढ्डें के इर्द गिर्द मेड़बंदी के निर्देश भी खेत मालिक को दिया था। इक्कीस जून को अमौली से तीन किलोमीटर दूर गांव द्वारिकापुर में धरती फटी। जिसमें शिवराम के बगीचे में लगभग अस्सी मीटर की लम्बाई तथा एक से दो फिट तक की चौड़ाई में धरती फटी थी। इस प्रकार क्षेत्र में एक सप्ताह में लगभग एक दर्जन स्थानों में धरती फटने व धसने की घटनाएं हुई। जिसको लेकर किसानों के माथे पर चिंता की लकीरे खिंची है। बागों व खेतों में घुसने के वक्त किसान फूंक-फूंक कर पैर रख रहा है। उसे खेतों में घुसते समय धरती फटने का भय बना रहता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3928001306612967005?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3928001306612967005/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3928001306612967005' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3928001306612967005'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3928001306612967005'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_692.html' title='एक सप्ताह में दर्जन भर स्थानों में फटी धरती'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-5318964716217066315</id><published>2008-06-26T19:37:00.000-07:00</published><updated>2008-06-26T19:38:11.103-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='फट सकता है धरती का कलेजा'/><title type='text'>कभी भी फट सकता है धरती का कलेजा</title><content type='html'>बुलंदशहर। जनपद में कभी भी धरती दरक सकती है। जिले के तीन ब्लाक डार्क जोन में तब्दील हो चुके हैं। भू-जलस्तर लगातार गिरता जा रहा है। मानव की खुशहाली का आधार प्रकृति है, लेकिन जब प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया जाता है, तो वह भी विकराल रूप धारण कर लेती है। प्रदेश में कई स्थानों पर धरती फटने के मामले इसका प्रमाण हैं। बुलंदशहर में भी धरती फटने की काली छाया मंडरा रही है। दरअसल, धरती के फटने के पीछे मुख्य कारण जलदोहन और तापमान में अंतर है। भू-जलस्तर के लगातार नीचे गिरते रहने से धरती की परतों में ख्िाचाव आता है। इस कारण धरती की परतें खिसकती हैं। धरती के आंतरिक हिस्से की यह घटना ऊपरी परत पर धरती फटने के रूप में दिखाई देती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिले का भू-जलस्तर लगातार गिर रहा है। प्रशासन ने तीन ब्लाक क्षेत्रों को डार्क जोन घोषित कर दिया है। इनके अलावा भी पांच ब्लाक क्षेत्र खतरे में हैं। सिकंदराबाद, शिकारपुर और ऊंचागांव ब्लाक डार्क जोन में बदल गए हैं। यहां भू-जलस्तर लगातार गिरते हुए खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अधिकतर स्थानों पर भू-जल की पहली परत खत्म हो चुकी है। हर तीसरे साल नलकूप बोरिंग और नल गहरे करने पड़ते हैं। कई क्षेत्रों में सामान्य नल, जो उथले लगाए जाते हैं, ने पानी देना बंद कर दिया है। कृषि विज्ञान केंद्र के निदेशक और प्रमुख मौसम, कृषि भू-गर्भ वैज्ञानिक डा. विवेकराज का कहना है कि जब जमीन में पानी का ऊपरी रिसाव कम हो जाता है और दोहन लगातार जारी रहता है, तो परतों के बीच में नमी की कमी हो जाती है। इसका नजारा जमीन फटने के रूप में देखने को मिलता है। मानकों के अनुसार डार्क जोन में नलकूप लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। जल रिसाव के साधनों को बढ़ावा दिया जाता है। डा. विवेकराज ने बताया कि सतह पर हरे पेड़-पौधों की कमी के कारण तापमान बढ़ जाता है, जबकि धरती का तापमान पानी की कमी से बढ़ता रहता है। जनपद के अलावा भू-गर्भ विभाग की रिपोर्ट में पूरा मेरठ जनपद खतरे के मुहाने पर बैठा है। सबसे ज्यादा खतरा बुलंदशहर और नोएडा क्षेत्र पर है। सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि व प्रौद्योगिकी शोध संस्थान के पूर्व निदेशक डा. ओडी शर्मा ने बताया कि जमीन का फटना हालांकि ज्यादा खतरनाक नहीं है, फिर भी बड़े खतरे का संकेत जरूर है। यदि अभी से सावधानी नहीं बरती गई तो आने वाला समय प्राकृतिक दुर्घटनाओं वाला होगा। उप कृषि निदेशक एसएस चौहान का कहना है कि बुलंदशहर सहित मेरठ मंडल के हालात अच्छे नहीं हैं। समाज को अब जागरूक हो जाना चाहिए। यदि लापरवाही जारी रही, तो आने वाले समय में प्रकृति हमें संभलने का मौका नहीं देगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-5318964716217066315?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/5318964716217066315/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=5318964716217066315' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5318964716217066315'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5318964716217066315'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_8424.html' title='कभी भी फट सकता है धरती का कलेजा'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-642189940132640416</id><published>2008-06-26T19:14:00.002-07:00</published><updated>2008-06-26T19:22:07.493-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोमती'/><title type='text'>पूरे बहाव में सबसे दयनीय लखनऊ में है गोमती</title><content type='html'>लखनऊ। अपने पूरे 940 किमी. लम्बे बहाव में गोमती की सबसे दयनीय स्थिति लखनऊ में ही है। नीमसार से लखनऊ में प्रवेश करते समय गोमती काफी साफ रहती है। शहर के अंदर प्रवेश करते ही गऊघाट से आगे यह बहुत मैली और बदबूदार हो जाती है। वहीं शहर के बाहर जाते गंगागंज से ही इसकी स्थिति सुधरने लगती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौरतलब है कि पीलीभीत में माधव टांडा से निकलकर यह शाहजहांपुर, लखीमपुर, हरदोई, सीतापुर से होती हुई लखनऊ में प्रवेश करती है। शहर में प्रवेश करते ही गऊघाट के आगे जाकर मंझीघाट से इसमें प्रदूषण का जहर घुलने लगता है। मोहन मीकिन्स से पिपराघाट तक गोमती सर्वाधिक प्रदूषित स्थिति में रहती है। पिपराघाट के बाद लखनऊ से बाहर जाते ही बाराबंकी, सुलतानपुर, जौनपुर में इसकी स्थिति सुधरने लगती है। गाजीपुर में यह गंगा में विलीन होने से पहले यह एकदम साफ-सुथरी हो जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार गोमती का लगातार अनुश्रवण करके केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तरी क्षेत्र (सीपीसीबी)द्वारा उसकी नियमित रिपेार्ट न्यायालय को भेजी जाती है। वहीं भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान (आईआईटीआर) भी नीमसार, भातपुर, गऊघाट, मोहन मीकिन, गंगागंज डाउन स्ट्रीम, सुल्तानपुर अप स्ट्रीम, सुल्तानपुर डाउन स्ट्रीम, जौनपुर अप स्ट्रीम और जौनपुर डाउन स्ट्रीम बिन्दुओं पर गोमती के जल की लगातार निगरानी करता है। आईआईटीआर रिपोर्ट के मुताबिक लखनऊ से आगे चलकर गंगागंज में फिर इसकी स्थिति में आंशिक सुधार होता है और सुलतानपुर में इसकी स्थिति काफी सुधर जाती है। मोहन मीकिन नाले से लेकर पिपराघाट के बीच गोमती में घुलित आक्सीजन (डीओ) की मात्रा सबसे कम और इसकी जैविक आक्सीजन की मांग (बीओडी) सर्वाधिक है। जो इन बिन्दुओं पर गोमती के जल की दुर्दशा बयान करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_4573327_1.html"&gt;http://in.jagran.yahoo.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-642189940132640416?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/642189940132640416/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=642189940132640416' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/642189940132640416'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/642189940132640416'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_8761.html' title='पूरे बहाव में सबसे दयनीय लखनऊ में है गोमती'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3933483854069004444</id><published>2008-06-26T19:14:00.001-07:00</published><updated>2008-06-26T19:20:41.439-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोमती'/><title type='text'>गोमती: एक नदी की उदास कहानी</title><content type='html'>लखनऊ। दरअसल गोमती अवध को परमेश्वर से वरदान के रूप में मिली नदी है। शिवपुराण में नदी को आदेश दिया गया है कि वह मां बन कर जनता का लालन-पालन करे। गोमती, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी माता की भूमिका निभा रही है, यह बात दीगर है कि अवध खासकर लखनऊ के लोग अपनी भूमिका भूल चुके हैं। ऋग्वेद के अष्टम और दशम मण्डल में गोमती को सदानीरा बताया गया है। शिव महापुराण में भगवान आशुतोष ने नर्मदा और गोमती नदियों को अपनी पुत्रियां स्वीकारा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वस्तुत: गोमती एक नदी ही नहीं संस्कृति की संवाहिका भी है। कितनी मछलियों ने इससे जीवन पाया है, कितने मगरमच्छों ने इसके तट पर विश्राम किया है। कितनी नौकाएं इसके किनारों से होकर गुजरी हैं। इसके घाटों पर बने मंदिरों में कितने वेद मंत्र गुंजित हुए हैं, कितने घंटे निनादित हुए है, कितने लोगों ने यहां के घाट पर वजू के लिए आब लिया है? कितने आबदारों को पाला-पोसा है इस सरिता के जल ने इसका हिसाब लगा पाना नामुमकिन ही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने कंठों की तृषा का शमन किया है इसके मृदुल जल ने यह तो वही बता सकता है जिसने उस जल का सेवन किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई कालखण्डों के इतिहास को अपने हृदय में समेटे है गोमती। नदी ने देखा है कि किस प्रकार मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनुज ने अपनी नगरी इसके तट पर बसायी थी। उसने यह भी देखा है कि कैसे दो बच्चों ने उनसे अपनी माता के परित्याग का प्रतिकार लिया था। किस प्रकार उसके तट पर अनेक ऋषियों ने अपने आश्रम स्थापित किये, किस प्रकार इस क्षेत्र में कथाओं का सूत्रपात हुआ किस भांति इस क्षेत्र में पौरोहित्य का विश्वविद्यालय स्थापित हुआ? श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम ने अपने अपराध का प्रायश्चित किया। किस तरह से तथागत ने इसके तट पर विश्राम किया और धम्म पद के उपदेश दिये? एक महान सम्राट की लाल चीवर धारी शांति सेना अपने नृपति के आदेशों-संदेशों के साथ इसके कूलों के किनारों से आगे बढ़ते हुए आत्ममुग्ध भाव से गुजरी थी। कैसे एक विदेशी पर्यटक ह्वेनसांग धम्म सभा में सम्मलित होने के लिए थेरी गाता हुआ यहां से गुजरा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस प्रकार भारशिवों ने श्रीहर्ष की धम्म सभा में उपद्रव करने के बाद नदी को पार करके उत्तरांचल की ओर प्रस्थान किया था। श्रीहर्ष की सेनाएं नदी के तट पर आकर उनकी खोज में काफी समय भटकती रह गयी थीं। राजा जयचन्द ने प्रसिद्ध वीर आल्हा- ऊदल को पासी और भारशिवों का दमन करने के लिए यहां भेजा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महान मुगल अकबर ने यहां पर वाजिपेय यज्ञ कराने के लिए एक लाख रुपये यहां के ब्राह्मणों को दिये और गोमती का तट यजु:वेद की ऋचाओं सेगूंज उठा। इसके बाद अपनी विभेद कारी नीति के तहत विप्रों की मर्यादा आंकी गयी। इसी काल में संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास ने अपनी प्रिय नदी धेनुमती के जल से मार्जन किया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3933483854069004444?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3933483854069004444/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3933483854069004444' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3933483854069004444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3933483854069004444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_1789.html' title='गोमती: एक नदी की उदास कहानी'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-9040033347425013914</id><published>2008-06-26T19:14:00.000-07:00</published><updated>2008-06-26T19:17:24.851-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुवाद'/><title type='text'>अनुवाद से संबंधित ऑनलाइन जर्नल</title><content type='html'>इंटरनेट उन लोगों के लिए वरदान से कम नहीं है जिन्हें भाषाओं से लगाव है। ऐसी कई वेबसाइटें हैं जहाँ आप नई भाषाएँ सीख सकते हैं या अन्य भाषाओ के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण वेबसाइट हैं:&lt;br /&gt;1. http://ejw।i8.com/forweb.htm&lt;br /&gt;2. www.vistavide.com&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. www.ielanguages.com &lt;br /&gt;4. http://www.ilovelanguages.com &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुवाद से संबंधित ऑनलाइन जर्नल &lt;br /&gt;इंटरनेट पर अनुवाद से संबंधित अनेक उपयोगी जर्नल हैं। इनमें अनुवाद की नवीनतम प्रवृत्तियों की जानकारी मिलती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजकल मशीनी अनुवाद, इलेक्ट्रोनिक शब्दकोशों आदि का महत्त्व बढ़ता जा रहा है। ऐसी स्थिति में अनुवादकों को तकनीक के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना पड़ेगा। इंटरनेट पर आधुनिक तकनीक के बारे में अच्छी जानकारी मिलती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने नीचे अनुवाद से संबंधित कुछ ऑनलाइन जर्नलों के नाम दिए हैं:&lt;br /&gt;1. http://www.accurapid.com/journal &lt;br /&gt;2. http://www.sil.org/siljot &lt;br /&gt;3. http://www.iatis.org/content/pubs/bulletin/archive.php &lt;br /&gt;4. http://www.jostrans.org/index.php&lt;br /&gt;इंटरनेट और अनुवाद &lt;br /&gt;इंटरनेट के आने से फ्रीलांस अनुवाद का स्वरूप बिल्कुल बदल गया है। अब आप घर में बैठकर दुनिया भर के लोगों या कंपनियों के लिए अनुवाद का काम कर सकते हैं। अगर आप दो या दो से अधिक भाषाएँ जानते हैं तो इंटरनेट पर अनुवाद करके आप अच्छी-खासी कमाई कर सकते हैं। कभी-कभी एक शब्द के अनुवाद के लिए २ से ३ रुपये मिल जाते हैं। अगर आपने १० दिनों में १०००० शब्दों का अनुवाद कर लिया तो आप ३०००० रुपये कमा लेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब सवाल यह उठता है कि इंटरनेट पर अनुवाद का काम किन वेबसाइटों पर मिलेगा? अभी अनुवाद के क्षेत्र में निम्नलिखित वेबसाइटें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१. www.proz.com&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२. www.translatorscafe.com&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३. www.translatorsbase.com&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://anuvaadkidunia.blogspot.com/2008/06/blog-post.html"&gt;http://anuvaadkidunia.blogspot.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-9040033347425013914?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/9040033347425013914/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=9040033347425013914' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/9040033347425013914'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/9040033347425013914'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_5443.html' title='अनुवाद से संबंधित ऑनलाइन जर्नल'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-5553867225795514040</id><published>2008-06-26T18:47:00.004-07:00</published><updated>2008-06-26T19:00:31.998-07:00</updated><title type='text'>कोका कोला संयंत्र के सामने प्रदर्शन</title><content type='html'>वाराणसी में कोका कोला संयंत्र के सामने प्रदर्शन (लीड)  &lt;br /&gt;वाराणसी, 31 मार्च (आईएएनएस)। वाराणसी के मेंहदीगंज में स्थित शीतल पेय कंपनी कोका कोला के संयंत्र के सामने रविवार को नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटेकर और मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित संदीप पांडे ने लोक समिति नामक संस्था के बैनर तले विशाल प्रदर्शन में हिस्सा लिया।&lt;br /&gt;लगभग दो हजार ग्रामीणों को संबोधित करते हुए संदीप पांडे ने कहा, "सरकार की विकास नीतियों को जनता पर नहीं थोपी जानी चाहिए। शीतल पेय कंपनियां और पानी के निजीकरण के खिलाफ लड़ाई मेंहदीगंज और कला डेरा राजस्थान से जारी है।" उन्होंने कहा की सेज-मेत्रेय परियोजना (कुशीनगर) और गंगा एक्सप्रेस वे जैसी विकास की तमाम परियोजनाओं से बड़े पैमाने पर विस्थापन और पर्यावरण का नुकसान होगा। प्रदर्शनकारियों ने संयंत्र स्थल के नजदीक पुलिस द्वारा लगाए गए अवरोध को भी तोड़ने का प्रयास किया। कोका कोला कंपनी द्वारा भूजल का दोहन किए जाने के विरोध में ग्रामीणों ने रैली भी निकाली। इलाके में पानी की कमी और जल एवं भूमि को प्रदूषित किए जाने को लेकर भी ग्रामीणों ने विरोध दर्ज किया।&lt;br /&gt;मेंहदीगंज में हाल ही में जल अधिकार को लेकर एक दो दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। सम्मेलन में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधि घनश्याम ने भी स्वीकार किया था कि जल संकट और भूजल दोहन के लिए कोका कोला कंपनी जिम्मेदार है। इस सम्मेलन के बाद ही ग्रामीणों ने लोक समिति नामक संस्था के साथ कोका कोला के संयंत्र के विरोध में प्रदर्शन में हिस्सा लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-5553867225795514040?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/5553867225795514040/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=5553867225795514040' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5553867225795514040'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5553867225795514040'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_9584.html' title='कोका कोला संयंत्र के सामने प्रदर्शन'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-6110017136240531400</id><published>2008-06-26T18:47:00.003-07:00</published><updated>2008-06-26T18:57:34.052-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रदूषण'/><title type='text'>शहर को क्यों लगा प्रदूषण का ग्रहण?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;भास्कर न्यूज&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जोधपुर. सर्वाधिक औद्योगिक प्रदूषण के शिकार देश के 24 शहरों में शामिल हुए जोधपुर के निकटवर्ती जोजरी नदी पर इसकी सबसे ज्यादा मार पड़ी है। जोधपुर प्रदूषण निवारण ट्रस्ट ने रंगाई-छपाई और स्टील री-रोलिंग की फैक्ट्रियों से निकले प्रदूषित पानी को उपचारित करने के लिए यहां ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया है, लेकिन यह भी हकीकत है कि आज भी बिना उपचारित प्रदूषित पानी की निकासी से जोजरी के जख्म हरे ही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने इस संकट से चेताते हुए जोधपुर के लिए एनवायरमेंट मैनेजमेंट प्लान बनाने की वकालत की है। ‘भास्कर’ ने जोजरी नदी, भूजल, जैव विविधता सहित मानवीय स्वास्थ्य के लिए खतरा बने औद्योगिक प्रदूषण की वजह जानने की कोशिश की तो चिंताजनक हकीकत उजागर हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्यावरणीय नियमों और हाईकोर्ट के आदेश के बाद शहर में प्रदूषित पानी की निकासी करने वाली उन फैक्ट्रियों के संचालन की ही अनुमति दी जा सकती है, जो नियमानुसार ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़ी हों और कृषि भूमि या आवासीय क्षेत्रों में प्रदूषण का सबब नहीं बनी हों। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल सहित प्रदूषण निवारण ट्रस्ट का दावा है कि स्टील री रोलिंग एवं रंगाई-छपाई की कमोबेश सभी फैक्ट्रियां ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़ी हुई हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि कई फैक्ट्रियां प्लांट से जुड़े बिना ही प्रदूषित पानी बहा रही हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जैव-विविधता पर मंडराता खतरा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जोधपुर के आस-पास औद्योगिक प्रदूषण के प्रभावों का अध्ययन कर रहे जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी के वनस्पति शास्त्र विभाग के युवा वैज्ञानिक डॉ. सुखाराम विश्नोई के अध्ययन के नतीजे काफी चौंकाने वाले हैं। विश्नोई का कहना है कि इस एरिया की बॉयोमॉनिटरिंग स्टडी बताती है कि खेजड़ी, आक, बुई, सनिया, रोहिड़ा जैसी स्थानीय वनस्पति इस प्रदूषित पानी की मार सहन नहीं कर पा रही है। जोजरी नदी का तल तो बुरी तरह प्रदूषित पानी की चपेट में है और यहां की वनस्पति करीब-करीब जल चुकी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विलायती बबूल, अश्वगंधा, नीम सहित चुनिंदा वनस्पति ही है, जो ऐसी विषम स्थिति में बची है। विडंबना यह है कि प्रदूषित पानी से सिंचित होने के कारण अश्वगंधा सहित ऐसी ही अन्य वनस्पति के उत्पाद घातक रसायन युक्त हो गए हैं। इनका उपयोग मानवीय स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। यही नहीं, यहां के प्रदूषित पानी, मिट्टी और अन्य उत्पादों में भावी तत्वों की मौजूदगी पाई गई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रिपोर्ट में भी चिंता मुखर&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;राज्य सरकार के निर्देश पर एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज के डॉ. एसके सिंह के संयोजन में गठित कमेटी की रिपोर्ट में भी जोजरी के प्रदूषित होने पर चिंता जाहिर की गई है। कमेटी ने पाया कि यहां के पानी में प्रदूषण का स्तर मानक से ज्यादा है। प्रदूषित पानी का सीओडी 12 मिलीग्राम प्रति लीटर तक है। कलर कई सैंपल में मौजूद था और नाइट्रेट की मौजूदगी ५क् मिलीग्राम प्रति लीटर तक थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमेटी का सुझाव है कि औद्योगिक क्षेत्र के अलावा अन्य क्षेत्रों में लगी फैक्ट्रियां स्थानांतरित की जाएं। क्षेत्र के सभी उद्योगों को ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ा जाए। जो क्षेत्र सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से नहीं जुड़े हुए हो, वहां नए प्लांट की स्थापना की जाए। कमेटी ने झालामंड से भांडू क्षेत्र को नो डिस्चार्ज जोन घोषित करने की सिफारिश की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;और भी हैं कई खतरे&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बालोतरा और पाली में हाईकोर्ट के आदेश पर फैक्ट्रियां बंद करवाने की नौबत आने से जोधपुर पर दबाव बढ़ गया है। इन कस्बों के फैक्ट्री मालिक रंगाई-छपाई की फैक्ट्रियां जोधपुर में शिफ्ट करने की कोशिश में लग गए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ट्रीटमेंट प्लांट पर अतिरिक्त बोझ की आशंका से ट्रस्ट ने पहले ही सार्वजनिक सूचना जारी करते हुए पहले रजिस्ट्रेशन करवाने की अनिवार्यता लागू कर दी है। इसी तरह फिलहाल दो तरह के उद्योगों को ही प्रदूषण का सबब माना जा रहा है, जबकि हालत यह है कि अन्य तरह के उद्योगों से भी प्रदूषण फैल रहा है, लेकिन उन्हें नियमों के दायरे में नहीं लिया गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-6110017136240531400?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/6110017136240531400/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=6110017136240531400' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/6110017136240531400'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/6110017136240531400'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_1890.html' title='शहर को क्यों लगा प्रदूषण का ग्रहण?'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-1519215012427237128</id><published>2008-06-26T18:47:00.002-07:00</published><updated>2008-06-26T18:54:11.568-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जल संरक्षण'/><title type='text'>मुद्दा : वर्षा जल संरक्षण के बिना बेमानी हैं सभी प्रयास</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SGRIFfGOdQI/AAAAAAAAAZk/SFRTacq1MZ8/s1600-h/1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SGRIFfGOdQI/AAAAAAAAAZk/SFRTacq1MZ8/s320/1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216373527486035202" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;ज्ञानेन्द्र रावत&lt;br /&gt;जल संकट देश ही नहीं, समूचे विश्व की गंभीर समस्या है। दुनिया के विशेषज्ञों की राय है कि वर्षा जल संरक्षण को बढ़ावा देकर गिरते भूजल स्तर को रोका व उचित जल–प्रबंधन से सबको शुद्ध पेयजल मुहैया कराया जा सकता है। उनका मानना है कि यही टिकाऊ विकास का आधार हो सकता है। इसमें ंदो राय नहीं कि जल संकट ही आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती होगी, जिस पर गौर करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, वरना स्थिति इतनी भयावह होगी जिसका मुकाबला कर पाना असंभव होगा। इसलिए तेजी से कम होते भूजल को संरक्षित करने के लिए जल–प्रबंधन पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है। इसमें दो राय नहीं कि भूजल पानी का महत्वपूर्ण स्रोत है और पृथ्वी पर होने वाली जलापूर्ति अधिकतर भूजल पर ही निर्भर है। लेकिन आज वह चाहे सरकारी मशीनरी हो, उघोग हो, कृषि क्षेत्र हो या आम जन हों, सभी ने इसका इतना दोहन किया है, जिसका नतीजा आज हमारे सामने भूजल के लगातार गिरते स्तर के चलते जल संकट की भीषण समस्या आ खड़ी हुई है, बल्कि पारिस्थितिकीय तंत्र के असंतुलन की भयावह स्थिति पैदा हो गई है। हालात यहां तक खराब हो रहे हैं कि इससे देश में कहीं धरती फट रही है, कहीं जमीन अचानक तप रही है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखण्ड, अवध व ब्रज क्षेत्र के आगरा की घटनाएं इसका प्रमाण हैं। ये संकेत देती हैं कि भविष्य में स्थिति विकराल रूप ले सकती है।&lt;br /&gt;वैज्ञानिकों व भूगर्भ विशेषज्ञों का मानना है कि बुंदेलखण्ड, अवध, कानपुर, हमीरपुर व इटावा में यह सब पानी के अत्यधिक दोहन, उसके रिचार्ज न पाने के कारण जमीन की नमी खत्म होने, उसमें ज्यादा सूखापन आने, कहीं दूर लगातार हो रही भूगर्भीय हलचल की लहरें यहां तक आने व आगरा में पानी में जैविक कूड़े से निकली मीथेन व दूसरी गैसों के इकट्ठे होने के कारण जमीन की सतह में अचानक गर्मी बढ़ जाने का परिणाम हैं। यह भयावह खतरे का संकेत है, क्योंकि जब–जब पानी का अत्यधिक दोहन होता हैे, तब जमीन के अंदर के पानी का उत्प्लावन बल कम होने या खत्म होने पर जमीन धंस जाती है और उसमें दरारें पड़ जाती हैं। इसे उसी स्थिति में रोका जा सकता है, जब भूजल के उत्प्लावन बल को बरकरार रखा जाये। पानी समुचित मात्रा में रिचार्ज होता रहे। यह तभी संभव है जब ग्रामीण-शहरी, दोनों जगह पानी का दोहन नियंत्रित हो, संरक्षण, भंडारण हो ताकि वह जमीन के अंदर प्रवेश कर सके। जल के अत्यधिक दोहन के लिए कौन जिम्मेदार है, इस बारे में योजना आयोग के अनुसार भूजल का 80 फीसद उपयोग कृषि क्षेत्र द्वारा होता हैै। इसे बढ़ाने में सरकार द्वारा बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी जिम्मेदार है। आयोग की रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि यह सब्सिडी कम की जाये। वह, इस रूप में दी जाये ताकि किसान भूजल का उचित उपयोग करें। सब्सिडी के बदले किसान को निश्चित धनराशि नकद दी जाये। इससे भूजल का संरक्षण होगा तथा विघुत क्षत्र पर भी आर्थिक बोझ कम होगा। विश्व बैंक की मानें, तो भूजल का सर्वाधिक 92 फीसद उपयोग और सतही जल का 89 फीसद उपयोग कृषि में होता है। 5 फीसद भूजल व 2 फीसद सतही जल उघोग में, 3 फीसद भूजल व 9 फीसद सतही जल घरेलू उपयोग में लाया जाता है। आजादी के समय देश में प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति पानी की उपयोगिता 5,000 क्यूबिक मीटर थी, जबकि उस समय आबादी 40 करोड़ थी। यह उपयोगिता कम होकर वर्ष 2000 में 2000 क्यूबिक मीटर रह गयी और आबादी 100 करोड़ पार कर गई। 2025 में यह घटकर 1500 क्यूबिक मीटर रह जाएगी, जबकि आबादी 1 अरब 39 करोड़ हो जाएगी। यह आंकड़ा 2050 तक 1000 क्यूबिक मीटर ही रह जाएगा और आबादी 1 अरब 60 करोड़ को पार कर जाएगी।&lt;br /&gt;आयोग के मुताबिक, 29 फीसद इलाका पानी की समस्या से जूझ रहा है। हकीकत यह है कि जल संकट गहराने में उघोगों की अहम भूमिका है। विश्व बैंक मानता है कि कई बार फैक्ट्रियां एक ही बार में उतना पानी जमीन से खींच लेती हैं, जितना एक गांव पूरे महीने में भी न खींच पाये! सवाल है कि जिस देश में भूतल व सतही विभिन्न साधनों के माध्यम से पानी की उपलब्धता 2300 अरब घनमीटर है और जहां नदियों का जाल बिछा हो, सालाना औसत वर्षा 100 सेमी से भी अधिक होतीे है, जिससे 4000 अरब घनमीटर पानी मिलता हो, वहां पानी का अकाल क्यों है? असल में वर्षा से मिलने वाले जल में से 47 फीसदी यानी 1869 अरब घनमीटर पानी नदियों में चला जाता है। इनमें से 1132 अरब घनमीटर पानी उपयोग में लाया जा सकता है लेकिन इसमें से भी 37 फीसद उचित भंडारण–संरक्षण के अभाव में समुद्र में चला जाता है जो बचाया जा सकता है। इससे काफी हद तक पानी की समस्या का हल निकाला जा सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-1519215012427237128?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/1519215012427237128/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=1519215012427237128' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/1519215012427237128'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/1519215012427237128'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_9335.html' title='मुद्दा : वर्षा जल संरक्षण के बिना बेमानी हैं सभी प्रयास'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SGRIFfGOdQI/AAAAAAAAAZk/SFRTacq1MZ8/s72-c/1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3712789822370109631</id><published>2008-06-26T18:47:00.001-07:00</published><updated>2008-06-26T18:52:06.958-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रदूषित पानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जानलेवा बीमारियां'/><title type='text'>मुद्दा : जानलेवा बीमारियां बढ़ाता प्रदूषित पानी</title><content type='html'>&lt;strong&gt;ज्ञानेन्द्र रावत&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;संयुक्त राष्ट्र का आकलन है कि दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोगों को साफ पानी उपलब्ध नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनेस्को सहित संयुक्त राष्ट्र की चौबीस एजेंसियों का पानी और दूसरी अन्य बुनियादी सुविधाओं के बारे में किया गया एक अध्ययन सबूत है कि यदि लोगों को पीने का साफ पानी मुहैय्या करा दिया जाता है तो हर साल प्रदूषित पानी पीने की वजह से अतिसार, मलेरिया और दूसरी अन्य बीमारियों से होने वाली लाखों मौतों को टाला जा सकता है। इसके लिए उक्त एजेंसियां अव्यवस्था भ्रष्टाचार, नौकरशाही का संवेदनहीन रवैया, सक्षम संस्थानों की अनुपलब्धता और बुनियादी सुविधाओं का अभाव तथा नागरिकों से जुड़ी इन समस्याओं पर सरकार का अंकुश न होना अहम मानती हैं।&lt;br /&gt;अब यह जगजाहिर है कि दुनिया की कुल आबादी के पांचवे हिस्से को पानी मयस्सर नहीं है। दुनिया के 123 देशों में जहां बड़ी संख्या में लोग प्रदूषित पानी पीने के लिए बाध्य हैं, उन देशों में भारत का नम्बर 121 वां है। जबकि हमारा पड़ोसी देश बांग्लादेश साफ पानी के मामले में हमसे 80वें व श्रीलंका और पाकिस्तान हमसे 40 स्थान ऊंचे हैं। समूची दुनिया में पानी के भारी संकट से प्रभावित होने वाले भारत और चीन की अकेली 40 फीसद आबादी को इसका सामना करना पड़ रहा है। जल उपलब्धता के मामले में भारत का स्थान 180 देशों में 133वां है। असलियत में दुनिया में 2.6 अरब आबादी को साफ–सफाई, स्वच्छ पेयजल और गंदे नाले के निकास जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। भारत में भू–जल के अतिशय दोहन एवं प्रदूषण के कारण नाइट्रेट, अमोनिया, क्लोराइड व फ्लोराइड जैसे तत्वों का भू–जल पर अत्याधिक दबाव है, जिसके परिणाम स्वरूप उसमें घुलन आक्सीजन की मात्रा दिनों–दिन लगातार कम होती जा रही है।&lt;br /&gt;दुनिया के सभी वैज्ञानिक इस बात पर एकमत हैं कि सदियों से पीने का साफ व सुरक्षित माना जाने वाला भूमिगत जल कृषि कार्यो में रासायनिक खादों व उघोगों में रसायनों के बेतहाशा इस्तेमाल और उसके विषाक्त निकास से बुरी तरह प्रदूषित हो गया है। वैज्ञानिकों ने भूमिगत जल में मौजूद तरह-तरह के रसायनों से कैंसर समेत अन्य किस्म की बीमारी होने की पुष्टि बहुत पहले से कर दी है। लंदन के शोधकर्ताओं ने यह साबित किया है कि जहां पेयजल में लिंडेन, मालिथयोन, डीडीटी और क्लोपाइरियोफोस जैसे कीटनाशक तत्व मौजूद रहते हैं, वहां के लोगों में कैंसर, स्तन कैंसर, मधुमेह, रक्तचाप, कब्ज और गुर्दे सम्बंधी रोग बहुतायत में पाये जाते हैंं। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है। भूजल स्रोतों की हालत इससे भी ज्यादा खराब है। सर्वेक्षण इस बात के प्रमाण हैं कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश व पश्चिम बंगाल के भूमिगत जल में नाइट्रोजन, फास्फेट, पोटेशियम के अलावा सीसा, मैग्नीज, जस्ता, निकिल और लौह जैसे रेडियोधर्मी पदार्थ व जहरीले तत्व निर्धारित मान्य स्तर से काफी ज्यादा मात्रा में मौजूद हैं। मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व पश्चिम बंगाल के भूमिगत जल में सीसा, कैडमियम, डीडीटी आदि कीटनाशकों के साथ–साथ सल्फेट की अधिकांश मात्रा मौजूद है। वैज्ञानिकों की सर्वसम्मत राय है कि किसानों द्वारा अधिक पैदावार लेने के उद्देश्य से भारी मात्रा में रासायनिक खादों के इस्तेमाल से भूमिगत जल का प्रदूषण और बढ़ा है और इसमें वृद्धि हो रही है।&lt;br /&gt;विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कृषि कार्य में इस्तेमाल की गई खाद का 50 फीसदी फसल में समा जाता है, 25 फीसदी मिट्टी में मिल जाता है और शेष 25 फीसदी भूमिगत जल में मिल कर उसे प्रदूषित करता है। मिट्टी में मिला 25 फीसदी खाद का हिस्सा नाइट्रोजन गैस के रूप में बदल जाता है। रासायनिक खादों का जो भी हिस्सा भू–जल से जा मिलता है, वही उस क्षेत्र के भूमिगत जल को प्रदूषित करने के लिए काफी है। नाइट्रेट का संकेद्रण ही भूजल के प्रदूषण का प्रमुख कारण है। औघोगिक संस्थानों, कारखानों, मिलों द्वारा बहाये जाने वाले रसायन, कूड़ा व प्रदूषित पानी ने जहां भू–जल व नदियों को प्रदूषित करने में अहम भूमिका निभायी है, वहीं नदियों का प्रदूषित पानी पीने योग्य न रहकर भयंकर जानलेवा बीमारियों को न्यौता दे रहा है। हमारे यहां प्रदूषित पानी पीने से हर साल 16 लाख, बच्चे अकाल मौत के मुंह में चले जाते हैं। देश में कुल बीमारियों में से 80 फीसदी प्रदूषित पानी पीने के कारण होती हैं। दुख इस बात का है कि हमारे यहां तकरीबन एक अरब दस करोड़ के लगभग रहने–बसने वाले लोगों को साफ पीने का पानी मुहैय्या कराने के लिए पानी की शुद्धता की जांच व उसे कीटनाशक–रसायन विहीन करने की कोई समुचित व्यवस्था ही नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3712789822370109631?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3712789822370109631/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3712789822370109631' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3712789822370109631'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3712789822370109631'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_5604.html' title='मुद्दा : जानलेवा बीमारियां बढ़ाता प्रदूषित पानी'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-2987091828512450000</id><published>2008-06-26T18:47:00.000-07:00</published><updated>2008-06-26T18:48:45.731-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जल त्रासदी दिवस'/><title type='text'>आगरा में मनाया गया जल त्रासदी दिवस</title><content type='html'>आगरा, ताजमहल के शहर के नाम से मशहूर आगरा के निवासी स्वच्छ जल के लिए आज भी तरस रहे हैं। आज से 14 साल पहले प्रदूषित पानी पीने से इसी शहर में 21 लोगों की मौत हो गयी थी। मृतकों को याद करते हुए सोमवार को शहर में जल त्रासदी दिवस मनाया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दिन स्वच्छ पानी और अन्य सुविधाओं के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया गया। 21 मई, 1993 को खटिकपारा और मंडी सईद खान क्षेत्र के 21 लोग प्रदूषित पानी पीने से मौत के शिकार हो गए थे। यह पानी स्थानीय नागरिक संस्था द्वारा उपलब्ध कराया जाता था। जांच के बाद पानी को अत्यधिक प्रदूषित पाया गया था। जहरीला पानी पीने से 21 लोगों की मौत के 14 साल बीत जाने के बाद भी शहर के लोग स्वच्छ पानी के लिए तरस रहे हैं। अब तक न स्वच्छ पानी की व्यवस्था की गयी है और न ही मृतकों के परिवार वालों को अनुदान दिया गया है। जल दिवस त्रासदी को मनाने के लिए शहर के कई हिस्सों में बैठकें आयोजित की गयीं और स्वच्छ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित न करा पाने के लिए सरकार को जिम्मेदार मानते हुए आलोचना की गयी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खटिकपारा क्षेत्र के निवासियों ने सिर पर काली पट्टी बांध कर और काला झंडा लहरा कर अधिकारियों का विरोध किया और 1993 में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी। शहर का भूजल भयंकर रूप से प्रदूषित और नुकसानदायक है। पर्यावरण कार्यकर्ता विनय पालीवाल का कहना है कि ऊंची ऊंची इमारतें और कुछ बड़े होटल ज्यादातर पानी के दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि वे बोरिंग के माध्यम से जमीन के नीचे का पानी सोख लेते हैं और बदले में कचरे का पानी जलाशयों में डालते हैं। इससे भूजल का स्तर गिरता जा रहा है और प्रदूषण बढ़ रहा है। आगरा के निवासी अपनी जरूरतों के लिए लगभग पूरी तरह यमुना नदी पर निर्भर करते हैं, लेकिन सरकार यमुना को प्रदूषण से बचाने में नाकाम रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंडो-एशियन न्यूज सर्विस&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-2987091828512450000?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/2987091828512450000/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=2987091828512450000' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/2987091828512450000'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/2987091828512450000'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_26.html' title='आगरा में मनाया गया जल त्रासदी दिवस'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-9088093172290983831</id><published>2008-06-10T08:07:00.000-07:00</published><updated>2008-06-10T08:08:59.864-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पानी का उपयोग'/><title type='text'>पानी भी याद दिलाएगा नानी</title><content type='html'>तेल का व्यापार दुनिया में समृद्धि का पर्याय बनकर उभरा है लेकिन संभव है, आने वाले कुछ दशकों में पानी का करोबार तेल का प्रतिस्पर्धी व्यापार बनकर उभरे। दुनिया में पानी का बाकायदा आयात शुरू हो गया है। स्पेन के शहर बार्सिलोना ने फ्रांस से 5॰ लाख गैलन पानी का आयात किया है। बार्सिलोना में बगीचों में पानी देने पर रोक लगा दी गई है। यदि कोई पानी देता पाया जाता है उसे पर 13॰॰॰ डालर का जुर्माना तय है। बात स्पेन की नहीं है, और भी देश इस लाइन में है। साइप्रस यूनान से पानी खरीदेगा। आस्ट्रेलिया के कई शहर किसानों व भवन निर्माताओं से पानी खरीद रहे हैं। चीनी हिमालयी पानी की धारा का रुख मोडने के प्रयास में है। अमरीका के कैलिफोर्निया में पहली बार पानी की राशनिंग की जा रही है। &lt;br /&gt;तो पानी होगा नीला सोना &lt;br /&gt;-डाऊ केमीकल्स के अध्यक्ष एंड्रयू लेवरिस ने फरवरी में विश्व आर्थिक मंच की बैठक में कहा था कि पानी इस शताब्दी का तेल है। यह नीला सोना बनता जा रहा है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पानी का विश्व कारोबार &lt;/strong&gt;-&lt;br /&gt;ग्लोबल इनवेस्टमेंट रिपोर्ट 2॰॰7 के अनुसार विश्व पानी बाजार करीब 5॰॰ अरब डालर का है। इसमें पेयजल वितरण, प्रबंधन और अपशिष्ठ उपचार व कृषि जल शामिल हैं। &lt;br /&gt;पेयजल की खपत &lt;br /&gt;- दुनिया भर में इंसानी जरुरतों के लिए हर रोज 24.॰5 अरब लीटर पीने योग्य पानी की आवश्यकता है, लेकिन करीब 1॰ अरब लीटर स्वच्छ जल ही- उपलब्ध। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;-कहां जाता है पानी &lt;/strong&gt;- &lt;br /&gt;संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विश्व का 97 प्रतिशत पानी खारा है। शेष पानी की आपूर्ति उद्योग 2॰ प्रतिशत, कृषि 7॰ प्रतिशत और घरेलू उपयोग 1॰ प्रतिशत। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बढ गया पानी का उपयोग &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;-ज्यूरिख की एक कंपनी ससटेनबल एसेट मैनेजमेंट (एसएएम)ग्रुप इनवेस्टमेंट कंपनी की 2॰॰7 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ताजा पानी का उपयोग बढकर लगभग दो गुना से अधिक हो गया है। &lt;br /&gt;और बढेगी पानी की मांग &lt;br /&gt;-विश्व की आबादी 195॰ में 2.5 अरब थी। आज यह करीब 6.3 अरब है और इसके 2॰5॰ तक 9 अरब हो जाने की उम्मीद है। साफ है इतनी बडी आबादी को खिलाने के लिए और सिंचाई के पानी की जरूरत होगी। &lt;br /&gt;ये भी हैं कारण &lt;br /&gt;आबादी बढने के साथ बढता प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, पिघलते ग्लेशियर और घटता भूमिगत जल भी संभावित जल संकट के अन्य कारण हैं। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारत और चीन के लिए चिंता का सबब &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;पिघलते ग्लेशियर भारत और चीन के लिए चिंता का सबब हैं। भारत और चीन की सभी प्रमुख नदियां -ब्रह्मपुत्र, सिंधु, यांगत्सी, गंगा और मिकांग हिमालय-तिब्बत के पठार से निकलती हैं। दुनिया की करीब 38 प्रतिशत आबादी को यह पानी उपलब्ध कराता है। जलवायु परिवर्तन के चलते ग्लेशियर पिघलने से आने वाले वर्ष में जल संकट और बढने की आशंका है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-9088093172290983831?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/9088093172290983831/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=9088093172290983831' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/9088093172290983831'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/9088093172290983831'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_7819.html' title='पानी भी याद दिलाएगा नानी'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3957257025661519490</id><published>2008-06-10T00:00:00.000-07:00</published><updated>2008-06-10T00:02:37.959-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गंगा'/><title type='text'>नोएडा-बलिया एक्सप्रेस-वे</title><content type='html'>रामदत्त त्रिपाठी, बीसीसी संवादददाता, उत्तर प्रदेश&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;एक्सप्रेस-वे को उत्तर प्रदेश के पिछड़े क्षेत्र पूर्वांचल के लिए सौगात माना जा रहा है उत्तर प्रदेश सरकार ने दिल्ली के पास ग्रेटर नोएडा से पूर्वांचल के बलिया तक आठ लेन के एक्सप्रेस-वे की महत्वाकांक्षी परियोजना की घोषणा की है. &lt;br /&gt;गंगा एक्सप्रेस-वे नामक इस एक्सप्रेस-वे पर पर्यावरणविदों ने आपत्ति जताई है और कहा है कि इससे गंगा घाटी की पारिस्थितिकी पर असर पड़ेगा. &lt;br /&gt;मुख्यमंत्री मायावती ने बुधवार को संवाददाताओं को बताया कि इस परियोजना पर लगभग 40 हज़ार करोड़ रुपए की लागत आएगी. इसके तहत राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के निकट ग्रेटर नोएडा से लेकर बलिया तक गंगा नदी के किनारे लगभग 1000 किलोमीटर लंबा सड़क मार्ग तैयार होगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ऐतिहासिक परियोजना&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत में ग्रैंड-ट्रंक यानी जीटी रोड के बाद संभवत यह दूसरी सबसे बड़ी सड़क परियोजना होगी. निश्चित रूप से पर्यावरण पर इसका असर पड़ेगा. मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होगी और जाहिर सी बात है फसल उत्पादन पर भी असर पड़ेगा &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हीरालाल यादव, प्रोफेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब जीटी रोड बनी थी तब वह कोलकाता से पेशावर (पाकिस्तान) तक जाती थी. इसे सोलहवीं शताब्दी में दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी ने बनवाया था. उम्मीद है कि 100 मीटर चौड़ा आठ लेन का यह सड़क मार्ग बनने से इसके किनारे औद्योगिक नगर और व्यावसायिक परिसर बनेंगे. मायावती ने कहा कि नए सड़क मार्ग से पूर्वी उत्तर प्रदेश के विकास में तेज़ी आएगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;औद्योगिक विकास की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का पूर्वी इलाका काफ़ी पिछड़ा हुआ है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आशंकाएँ&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालाँकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लेकर कुछ आशंकाएँ भी जताई जा रही हैं. कहा जा रहा है कि इससे गंगा में प्रवाहित होने वाले पानी का बहाव प्रभावित होगा. गंगा उत्तर भारत की प्रमुख नदी है, जिसमें कई छोटी-बड़ी नदियां मिलती हैं. हालाँकि उत्तर प्रदेश के कैबिनेट सचिव शशांक शेखर ने भरोसा दिलाया है कि निकासी व्यवस्था का पूरा ख़्याल रखा जाएगा ताकि बाढ़ और पानी के जमाव जैसी समस्याओं से बचा जा सके. लेकिन एक्सप्रेस-वे के निर्माण को लेकर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है. उनका कहना है कि इस परियोजना का पर्यावरण पर विपरीत असर होगा. लखनऊ विश्वविद्यालय के भूगोल के प्रोफेसर हीरालाल यादव कहते हैं, "निश्चित रूप से पर्यावरण पर इसका असर पड़ेगा. मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होगी और जाहिर सी बात है फसल उत्पादन पर भी असर पड़ेगा."&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3957257025661519490?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3957257025661519490/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3957257025661519490' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3957257025661519490'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3957257025661519490'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_10.html' title='नोएडा-बलिया एक्सप्रेस-वे'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-8270360452318407707</id><published>2008-06-09T23:57:00.000-07:00</published><updated>2008-06-09T23:59:36.301-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गंगा'/><title type='text'>कहीं इतिहास ना बन जाए गंगा</title><content type='html'>&lt;strong&gt;फ्रेंकलिन निगम&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों उत्तराखंड अपने ही जल, जंगल और जमीन को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। नियति देखिए कि जिस राज्य को बने अभी कुछेक साल ही हुए हैं उसे ही अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। उत्तराखंड की रगों मे 13 छोटी-बड़ी नदियां बहती हैं। ऊंचे-ऊंचे पहाड़, नदियां और जंगल यहां आने वाले पर्यटकों के लिए हंसीन वादियां हो सकती है लेकिन उत्तराखंडियों के लिए रोजी-रोटी और घर भी हैं। गौरतलब है कि उत्तराखड को तथाकथित ऊर्जा प्रदेश बनाने का सपना देखा और दिखाया गया है। उत्तराखंड की नदियों पर 220 जल विद्युत परियोजनाएं बनाने के निर्णय लिया जा चुका है। इस सपने के तहत उत्तराखंड में जल के निजीकरण पर विचार चल रहा है और उजाZ प्रदेश और बांधों के नाम पर जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है। जंगल साफ हो रहे हैं। पहाड़ों में सुरंगे खोदी जा रही है ताकि बहती नदियों को इन सुरंगों से गुजारा जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उत्तराखंडी अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचाने के लिए अभियान-आन्दोलन पर उतर आए हैं। सही मायने में उनका आन्दोलन प्रकृति की रक्षा के लिए प्राकृतिक सुरक्षा बनाम विकास का है। नदियां, पहाड़ और पेड़ों की सुरक्षा के लिए लम्बी लम्बी पदयात्राएं और जल यात्राएं की जा रही है। गांव के युवक नुक्कड़ नाटकों और गीतों के जरीए लोगों को जागरूक करने में लगे हैं। इस सबके बीच हिन्दुत्व विचारधारा वाले लोग भी उत्तराखंड के आंदोलनों में दिखाए देने लगे है क्योंकि इस बार हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक गंगा का भी अस्तित्व खतरे में है। वॉटर मैन माने जाने वाले और मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेन्द्र सिंह मानते है कि ``गंगोत्री में बांध नहीं बनने देंगे क्योंकि ये प्रकृति के साथ साथ हमारी संस्कृति का सवाल भी है। हम विकास के नाम पर गंगा का अस्तित्व दांव पर नहीं लगा सकते´´&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया में बढते तापमान, पिघलते ग्लेिशयर, और मौसम का बदलते मिजाज के नाम पर गंगा विश्व की लुप्त होने वाली 10 नदियों में से एक है। एक अनुमान के मुताबिक आज के हालातों को देखते हुए आने वाले 20 सालों में गंगा सूख जाएगी। गंगोत्री ग्लेिशयर पिछले 3500 सालों में आठ किलोमीटर पीछे खिसका जबकि पिछले 15 सालों में ये तकरीबन 210 मीटर सिकुड़ गया है। ये मानना है 15 सालों से गंगोत्री ग्लेिशयर का अध्ययन कर रहे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर स्टडी ऑफ रिजनल डेवलपमेंट विभाग के वैज्ञानिक डॉ मिलाप शर्मा का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंगा नदी को सुरंग, बांधों से रोककर बिजली पैदा करने की योजना है। टिहरी से धरासू तक टिहरी बांध का जलाशय ही नज़र आता है, पानी रूका हुआ और हरा है यानि यहां गंगा मर चुकी है। अब इसके आगे गंगा को धरासू से गंगोत्री तक की दूरी 125 किमी है अब यहां भी गंगा के रास्ते का बदलकर सुरंगों और बांधों से होकर गुजरना होगा। गगा को इस तरह बाधित करने से उसके सूख जाने की संभावनाएं लगातार बढ़ रही हैं। धरासू से गंगोत्री तक बनने वाली परियोजनाओं में मनेरी भाली प्रथम, मनेरी भाली द्वितीय, पाला मनेरी, लोहारी नागपाला, भैरो घाटी प्रथम और द्वितीय शामिल है। इन परियोजनाओं में भैरो घाटी प्रथम और द्वितीय गंगोत्री में ही बनने वाली है। ये सब विकास और बिजली उत्पादन के नाम पर किया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास के नाम पर इस बार जब गंगा का अस्तित्व ही दाव पर लगा तो सारे आस्थावादी और हिन्दुवादी इकट्ठा होने लगे हैं। उनकी ये आस्था प्रकृति के प्रति ना होकर संस्कृति और पौराणिक गंगा के प्रति है। वैज्ञानिक और इंजीनियर डॉण् जी डी अग्रवाल गंगा के प्रति अपनी श्रद्धा के चलते नदी के अस्तित्व की लड़ाई के लिए 13 जून को अमरण अनशन पर बैठने जा रहे हैं। उनके शब्दों में ``लोगों को रोटी-रोजगार मिले या ना मिले, मुझे फर्क नहीं पडता। मेरी लड़ाई सिर्फ गंगा जी के अस्तित्व की लड़ायी है।´´ गंगा के अस्तित्व को बचाने का डॉ अग्रवाल का अभियान प्रकृति की रक्षा की बजाय आस्था और संस्कृति से इस कद्र प्रभावित है कि उनकी आस्था के आगे जल, ज़मीन जंगल कोई मायने नहीं रखते। वे इसे एक नदी की लडायी ना मानकर मां के जीवन के लिए संघषZ मानते हैं। इसी तरह हिन्दुत्ववादी विचारधारा और उत्तराखंड के पर्वतों में अपने अपने आश्रम चला रहे साधू संत भी इस आंन्दोलन में कूदने लगे हैं। हैरानी की बात ये है प्रकृति की सुध किसी को नहीं, सिर्फ गंगा के ही प्रति आस्था और सस्कृति के चलते इस आंदोलन में भाग ले रहे हैं। प्रकृति की सुरक्षा के लिए किए जा रहे अभियानों पर कुछ हिन्दुत्ववादी संगठनों की नज़र पड़ जाने से कहीं ये आंन्दोलन धार्मिक मुददा ना बन कर रह जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिमालय के मध्य भाग में गंगा की दो धाराएं जो विपरीत दिशाओं में अलकनन्दा और भागीरथी के नाम से बहती हुई देवप्रयाग स्थान पर एक दूसरे से मिल जाती हैं और यही से ये गंगा बनती है। गोमुख से निकलने के बाद भागीरथी भेजवासा, चीड़वासा, गंगोत्री से होते हुए भैरोघाटी पहुंचती है। यहां जाड़गंगा नामक सरिता और उत्तर काशी से आगे गाड़ गधेरे इसमें मिलते हैं। बहुत जल्द गंगा हमारी आंखों से ओझल हो जाएगी और सुरंगो और बांधो बंधकर बहेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकास के नाम पर गंगा का जीवन दांव पर नहीं लगा है बल्कि दूसरी नदियां भी अपनी मौत का इंतजार कर रही है। कुमाउंं विश्वविद्यालय के जल वैज्ञानिक डॉ जे एस रावत की कोसी नदी पर तैयार रिपोर्ट के मुताबिक यही स्थिति कुमाउ की लगभग सभी नदियों की है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कोसी नदी की समस्या को उजागर किया है। वैज्ञानिक डॉ जे एस रावत मुताबिक 1994 में कोसी नदी का बहाव 994 लीटर प्रति सेकेण्ड था और 2003 तक यह 65 लीटर प्रति सेकेण्ड हो गया। यही नहीं कोसी नदी का उद्गमस्थल पिनाथ पहाड़ पर था लेकिन अब ये खिसकर 25 किलोमीटर दूर सोमेश्वर पहाड पर आ गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भागीरथी नदी घाटी के जलग्रहण ़क्षेत्र में लोहारी नामगपाला और पाला मनेरी परियोजनाओं से होने वाला नुकसान सबसे ज्यादा पाला गांव के लोगों को झेलना होगा। हमने यहां को दौरा किया। जलविद्युत परियोजना के कारण पाला गांव में छोटे बड़े भूस्खलन हो रहे हैं। दर्जनों स्कूलो और घरों में दरारे पड़ चुकी हैं। सुरंगों के निर्माण के लिए की जाने वाली ब्लािस्टंग से गांव की ज़मीन कांप उठती है और सड़कों टूट जाती है। उत्तराखंड को उर्जा प्रदेश बनाने के सरकार के जो सपने थे उसके आधार पर नदियों पर बांध बनाने के तरीक बदल गए हैं। अब पहाडों के दिलों में सुरंगे खोदी जा रही है। जिससे कृषि भूमि तो बरबाद हो ही रही है, सबसे खतरनाक कि इन सुरगों पर गांव बसे हैं। जो देर सबेर धस सकते हैं। अलकनन्दा नदी के प्रयाग पर बनी विष्णुप्रयाग बांध परियोजना से चाईं गांव तबाह हुआ। धौली गंगा परियोजना से धारचुला का बंलातोक, भागीरथी पर निर्मित् मनेरी भाली-1 से दर्जनों गांव तबाह हो चुके हैं। टिहरी शहर तो जलसमाधि पहले ही ले चुका है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगलों से राई, कैल, मुरेंडा, देवदार, मौरू, बुरास, फल्याट जैसी पेड़ों की प्रजाति खत्म हो रही हैं। पाला गंाव के पास टकनौर रेंज के तहत स्वारी और पिटारा में राष्ट्रीय राजमार्ग के चौड़ा करने के नाम पर 1200 से अधिक की बलि चढ़ा दी गयी। विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों को बेददीZ से कत्ल किया जाना कहां तक उचित है। रोजगार के नाम पर भी लोगों को आश्वासन मिलता रहा है। स्थानीय लोगों को ठेके पर काम दिया जाता है। हैरानी की बात ये कि उत्तराखंड जलविद्युत निगम के पास स्थानीय लोगों को स्थायी रोजगार देने की कोई योजना नहीं हैं। उत्तराखंड को नदी बचाओं 2008 के रूप में मनाया जा रहा है। इस प्रदेश में यमुना, अलकनन्दा, मंदाकनी, सरयू, पिण्डर, कोसी जलकुर, काली छोटी बड़ी नदियां अविरल बहा करती थी। इन तमाम नदियों पर बांध बनाकर अनुमानित 25 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य है। जिससे 22 लाख लोग प्रभावित होंगे। राज्य की कुल आबादी ही 84 लाख हैं। राज्य में 16 हजार नहरे हैं यदि इन नहरों को नियमित करके टरबाईन लगा कर 30 हजार मेगावाट बिजली प्राप्त की जा सकती हैं और सिंचाई के लिए पानी मिलेगा सो अलग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुलाम भारत में भी अंग्रेजों ने गंगा नदी को बांधने की कोिशश की थी। लेकिन मदन मोहन मालवीय इसके विरूद्ध आंदोलन छेड़ दिया। जिसके आगे अंग्रेजों को झुकना पडा और अंग्रेजों के साथ समझौता हुआ। समझौते के तहत दो बाते तय हुई। पहली की गंगा की अविरल धारा को कभी भी नहीं रोका जाएगा(अनुच्छेद 32, पैरा 2) दूसरी की हिन्दु समाज से परामर्श किए बिना ऐसा कदम भविष्य में दोबारा नही उठाया जाएगा। यह समझौता आज भी संविधान की धारा 363 के अंतर्गत सुरक्षित है। 1916 के समझौता और संविधान की धारा 363 का उल्लंघन किया जा रहा है। ये सब विकास के झूठे सपने दिखा कर किया जा रहा है। बहुराट्रीय कम्पनियों और निजी कम्पनियों से समझौता के चलते उत्तराखण्ड को पावर हाउस बनाने के लिए उर्जा प्रदेश का सपना दिखाया जा रहा है। अफसोस ये है कि इन परियोजनाओं के कारण जल जमीन और जंगल खत्म हो रहे हैं। अगर हालात यही रहे तो सनकी वैज्ञानिकों की विकास के नाम पर की जा रही नई नई खोजे एक दिन भस्मासूर बन जाएगी। हमें संभल जाना चाहिए क्योंकि प्रकृति हमें अतिभोग की इजाजत नहीं देती। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://franklinnigam.blogspot.com/2008/06/blog-post.html"&gt;http://franklinnigam.blogspot.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-8270360452318407707?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/8270360452318407707/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=8270360452318407707' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8270360452318407707'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8270360452318407707'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_09.html' title='कहीं इतिहास ना बन जाए गंगा'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-8221740507844828933</id><published>2008-06-08T23:46:00.000-07:00</published><updated>2008-06-08T23:48:30.891-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आमरण अनशन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जल-विहीन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भागीरथी गंगा'/><title type='text'>भागीरथी गंगा जी के संरक्षित हितार्थ ''आमरण अनशन संकल्प'' के सन्दर्भ में</title><content type='html'>प्रिय......&lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संस्कृति एवं चिन्तन में भागीरथी गंगा जी और और उनकी संसार में अद्वितीय पाप-विमोचनी, स्वास्थ्यवर्ध्दिनी पवित्रता में आस्था से आप भली-भांति परिचित हैं। पिछले कुछ र्वों में जल-विद्युत परियोजनाओं द्वारा अन्य नदियों की भांति ही, भागीरथी गंगा जी के प्रवाह की अविरलता को भंग कर, इस आस्था-स्रोत को छिन्न-भिन्न किया जा रहा है। अभी भी मनेरी से नीचे भागीरथी गंगा जी की धीरा लम्बी दूरी और लम्बे समय तक जल-विहीन रहती है। आगे चलकर तो शायद पूरी गंगा जी की यही नियित हो जाये। पर्यावरण विज्ञान का एक गम्भीर छात्र और एक आस्थावान हिन्दू होने के नाते यह विचार भी मेरे लिए असहनीय है। हम तो गंगा जी को माँ मानते हैं- क्या माँ की हत्या, उसका जल-विहीन, छिन्न-भिन्न किया जाना चुपचाप देखते रहें? मैं महीनों के आत्ममंथन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि कम से कम उद्गम-स्थल से उत्तरकाशी नगरी तक तो भागीरथी की धारा को आस्थावान हिन्दुओं और भारतीय संस्कृति के लिए अविरल, निर्बाध छोड़ दिया जाना चाहिए और मेरी आत्मा की आवाज है कि इस भाग के साथ किसी भी मानवीय छेड़छाड़ का मुझे यथाशक्ति विरोध करना चाहिए। &lt;br&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान भारतीय सरकारों और समाज में भौतिक-आर्थिक विकास और बिजली उत्पादन पर इतना बल है, इतनी ललक है कि मुझ सरीखे क्षुद्र व्यक्ति के विरोद्द का अर्थ ही क्या है, नक्कारखाने में तूती की आवाज भी कौन सुनेगा ? पर हमारी संस्कृति में तो सदा से आत्म बल और तपोबल का बड़ा महत्व रहा है और इसके लिए तपना पड़ता है, बलि देनी पड़ती है। वह आस्था ही क्या जिसके लिए अन्य सभी कुछ प्राण का भी उत्सर्ग न किए जा सकें। मैं तो बचपन में स्कूल की दैनिक प्रार्थना में ''जिस देश-जाति में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जाये'' और झण्डा-गान मैं ''देश धर्म पर बलि-बलि जायें'' गाते हुए पला-बढ़ा हूँ। क्या आज भारतीय संस्कृति, हिन्दू-आस्था मुझे बलि के लिए नहीं पुकार रही है ? सोच-विचार कर मैने उत्तरकाशी से ऊपर की भागीरथी गंगा की धारा के सा छेंड़छाड़ के विरोद्ध में '' आमरण अनशन '' करने का निश्चय किया है। &lt;br&gt;&lt;br /&gt;भगवान राम की तप:स्थली चित्रकूट धाम में उनके पावन जन्म दिन रामनवमी, 14 अप्रैल 2008 को मैं संकल्प करता हूँ कि कोई अनहोनी ही न घट जाये तो मैं उत्तरकाशी तक भागीरथी गंगा की धारा के अविरल-निर्बाध रखे जाने के हित में गंगा दशहरा 13 जून 2008 से '' आमरण अनशन '' करूंगा। प्रभु राम मुझे अपने संकल्प पर दृढ़ रहने की शक्ति दें। &lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप मुझसे स्नेह रखते हैं- उसी स्नेह का वास्ता देकर प्रार्थना करता हूँ कि अपने संकल्प से डिगाने का प्रयास कृपया न करें। यदि मेरा यह प्रयास आपको नि:स्वार्थ, उचित और धर्मानुकूल लगे तो इसके उद्देश्यों की अन्तोगत्वा सफलता के लिए प्रभु से प्रार्थना करें। &lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं 15 मई 2008 से अद्दिकांय समय उत्तरकाशी में रहूँगा, उपयुक्त ठिकाने की खोज कर रहा हूँ। पता - M.C Mehta, Env. Foundation ;k Peoples’ Science Institute (Tel : 0135-2763649) से ज्ञात हो सकेगा। &lt;br /&gt;हार्दिक स्नेह और युभकामनाओं सहित &lt;br&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपका अपना आत्मीय &lt;br&gt;&lt;br /&gt;(गुरूदास अग्रवाल) &lt;br&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-8221740507844828933?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/8221740507844828933/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=8221740507844828933' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8221740507844828933'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8221740507844828933'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_3388.html' title='भागीरथी गंगा जी के संरक्षित हितार्थ &apos;&apos;आमरण अनशन संकल्प&apos;&apos; के सन्दर्भ में'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3420850765263571855</id><published>2008-06-08T22:39:00.000-07:00</published><updated>2008-06-08T22:41:59.734-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैंग्रोव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुंदरवन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कोलकाता'/><title type='text'>समुद्र लील सकता है कोलकाता को</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEzCSVUppJI/AAAAAAAAAZc/-pkuqlDz5p0/s1600-h/hawrah-bridge1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEzCSVUppJI/AAAAAAAAAZc/-pkuqlDz5p0/s400/hawrah-bridge1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5209752489178014866" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;मैंग्रोव के नष्ट होने से सुंदरवन भी नहीं बचेगा &lt;/strong&gt;mandhata singh &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैश्विक तापमान जितनी तेजी से बढ़ रहा है उससे हिमालय की ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। कई हिमनदियां सूख रही हैं । इतना ही नहीं गंगोत्री या गोमुख भी यथावत नहीं रह गया है। वैश्विक तापमान बढ़ने से तेजी से पिघल रहे ग्लेशियर से समुद्र का जलस्तर भी बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। इससे विश्व की नायाब प्राकृतिक धरोहर सुंदरवन के अस्तित्व को भी खतरा पैदा हो गया है। संदरवन के लिए काम कर रही एक सामाजिक संस्था एनईडब्लूएस और कोलकाता विश्वविद्यालय के समुद्रविग्यान विभाग ने शोधोपरांत पाया है कि इस बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण समुद्र का जलस्तर हर साल तीन मिलीमीटर बढ़ रहा है। अगर समुद्र का जलस्तर इसी तरह बढ़ना जारी रहा तो अगले ३० सो १०० साल के भीतर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और इसके तीन जिले-उत्तर २४ परगना, दक्षिण २४ परगना और पूर्व मेदिनीपुर समुद्र में समा जाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल सुंदरवन से बाघों के विलुप्त होने का संकट तो अभी खत्म हुआ ही नहीं था कि उल्टे सुंदरवन के ही नष्ट हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। दुर्गापूजा के बाद छठ पूजा के ठीक एक दो जिन पहले बांग्लादेश से जो सीडर तूफान भारत की बढ़ा था उसने सबसे ज्यादा नुकसान सुंदरवन को ही पहुंचाया था। अगर सुंदरवन बचा तो उन्हीं मैंग्रोव की कृपा से, जो आज इतने भी नहीं बचे हैं कि सुंदरवन को महफूज रख सकें। १०८ द्वीपों में बिखरे सुंदरवन के ३५०० किलोमीटर लंबे तट में से २००० किलोमाटर तट ऐसा है जहां मैंग्रोव हैं ही नहीं। ये मैंग्रोव दो तरह से सुंदरवन की रक्षा करते हैं। पहला यह कि इनकी मजबूत घनी जड़ें तटों का कटाव नहीं होने देतीं और दूसरा यह कि बेहद घने मैंग्रोव तूफान की गति काफी कम कर देते हैं। यानी मैंग्रोव आबादी की तरफ जाने वाले तूफान को इतना धीमा कर देते हैं कि जिससे बंगाल तटीय आबादी वाले इलाके भी भारी तबाही से बच जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ विशेष किस्म के मैंग्रोव न सिर्फ ग्लोबलवार्मिंग से लड़ पाएंगे बल्कि सुंदरवन को कटाव व तेज तूफानों से भी बचा पाएंगे। कम कर पाएंगे। ऐसा भरोसा कोलकाता विश्वविद्यालय के वैग्यानिक और प्रोफेसर अभिजीत मित्र को रिसर्च के बाद हासिल हुआ है। केवड़ा और कुछ दूसरे मैंग्रोव हवा में कार्बनडाईआक्साइड को बढ़ने से रोकते हैं। अगर कार्नडाईआक्साइड को बढ़ना वायुमंडल में रोका जा सका तो ग्लोबलवार्मिंग व उससे होने वाले खतरों पर भी अंकुश रखा जा सकेगा। &lt;br /&gt;मैंग्रोव के इस महत्व को देखते हुए ब्रिटेन की आर्थिक मदद से ४० लाख मैंग्रोव सुंदरवन के तटीय इलाके में रोपे जाएंगे। भारत सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार ने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार विमर्श किया है। इस किस्म की परियोजना की कोलकाता की संस्था नेचर इनवायर्नमेंट एंड वाइल्ड लाइफ सोसायटी (एन ई डब्लू एस ) ने जिम्मेदारी ली है। ब्रिटिश सरकार ने इस परियोजना के लिए ६० हजार अमेरिकी डालर मंजूर किए हैं। कोलकाता में ब्रिटिश उपउच्चायुक्त सिमोन विल्सन ने यह जानकारी दी। ब्रिटेन के सहयोग वाली यह परियोजना सुंदरवन को तो बचाएगी ही कोलकाता को प्राकृतिक आपदा से बचाने के लिए सुरक्षा कवच का काम करेगी। एनईडब्लूएस प्रोजेक्ट कोआर्डिनेटर अजंता दे का तो दावा है कि इससे इलाके के ग्रामीण इलाकों को भी आर्थिक फायदा हासिल होगा। क्यों कि सुंदरवन से गुजरने वाले तूफान इन ग्रामीण इलाकों में जानमाल का काफी नुकसान पहुंचाते हैं। मैंग्रोव इन तूफानों की गति ७० से ८० प्रतिशत कम कर देते हैं।( खबर स्रोत- समाचार एजंसी पीटीआई )&lt;br /&gt;&lt;a href="http://chintan.mywebdunia.com/2008/02/11/1202738520000.html"&gt;http://chintan.mywebdunia.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3420850765263571855?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3420850765263571855/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3420850765263571855' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3420850765263571855'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3420850765263571855'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_6443.html' title='समुद्र लील सकता है कोलकाता को'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEzCSVUppJI/AAAAAAAAAZc/-pkuqlDz5p0/s72-c/hawrah-bridge1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-331817826518442712</id><published>2008-06-08T22:30:00.000-07:00</published><updated>2008-06-08T22:38:47.126-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरस्वती नदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोमुख ग्लेशियर'/><title type='text'>‘सरस्वती’ न बन जाए ‘गंगा’</title><content type='html'>यदि ग्लोबल वामग से इसी प्रकार पृथ्वी का तापमान बढ़ता रहा तो बहुत जल्द सरस्वती की तर्ज पर गंगा भी लुप्त हो गंगा मात्र जलधारा नहीं वरन् भारतीय संस्कृति की आत्मा है, उसके बिना भारतवर्ष की कल्पना संभव नहीं है। गंगा आज प्रदूषण के अत्यंत भयावह दौर से गुजर रही है। यदि पृथ्वी का तापमान इसी तरह बढता रहा तो गंगा का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और गंगा भी इतिहास के पन्नों में उसी प्रकार सिमट कर रह जाएगी जैसे सरस्वती।पृथ्वी के तापमान में निरंतर होती वृद्वि से गंगा बेसिन क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। गंगोत्री से कुछ किमी पैदल दूरी पर गंगा का उद्गम स्थल गोमुख ग्लेशियर निरंतर पीछे खिसक रहा है। ताजा आकड़े के अनुसार वर्ष 1990 से लेकर 2006 तक गोमुख ग्लेशियर 22.8 हेक्टेयर पीछे खिसका है। इंटरनेशनल कमीशन फार स्नो एण्ड आइस के एक समूह द्वारा हिमालय स्थित ग्लेशियरों का अध्ययन किया गया। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार आने वाले 50 वषा में मध्य हिमालय के तकरीबन 15 हिमखंड पिघलकर समाप्त हो जाएंगे। गोमुख ग्लेशियर पर अध्ययन से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार कुछ चौकानें वाले तथ्य सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1935 से 1956 तक गोमुख ग्लेशियर 5.25 हेक्टेयर, 1952 से 1965 तक 3.65 हे., 1962 से 1971तक 12 हे., 1977 से लेकर 1990 तक 19.6 हे. पिघलकर समाप्त हुआ है। वर्ष 1962 से 2006 तक गोमुख ग्लेशियर डेढ़ किमी. पिघला है।भूगर्भीय सर्वे आफ इंडिया, रिमोट सेंसिग एप्लीकेशन सेंटर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविघालय आदि संस्थानो के द्वारा किये गये अध्ययन से स्पष्ट है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियर पिछले 40 सालों में 25 से 30 मीटर पीछे खिसक चुका है। यदि यही स्थित रही तो 2035 तक ग्लेशियर पिघलकर समाप्त हो जायेगा। समुद्र तल से 12,770 फीट एवं 3770 मीटर ऊचाई पर स्थित गोमुख ग्लेशियर 2.5 किमी चौड़ा व 27 किमी लम्बा है, जबकि कुछ साल पहले गोमुख ग्लेशियर 32 किमी लम्बा व 4 किमी चौडा था।गोमुख ग्लेशियर पिघलने से गंगा बेसिन के क्षेत्र उत्तारांचल, बिहार, उत्तार प्रदेश का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। गोमुख क्षेत्र में लोगों का हजारों की संख्या में पहुंचना भी एक हद तक ग्लेशियर को नुकसान पहुंचा रहा है। यदि ग्लेशियर पर पर्वतारोही दलों के अभ्यास को बंद करने के साथ ही ग्लेशियर पर चढ़ने की सख्त पाबंदी लगा दी जाए तो काफी तक गोमुख ग्लेशियर की उम्र बढ़ सकती है।जिस प्रकार हमारे वेदों और अनेक ग्रंथों में सरस्वती नदी का वर्णन मिलता है उससे यह साबित होता है कि सरस्वती का कोई अस्तित्व था। पूर्णतया भूगर्भ में समा चुकी सरस्वती को फिर से पुर्नजीवित करने के प्रयास केंद्र सरकार का द्वारा किए जा रहे हैं पर इन प्रयासों को कितनी सफलता मिल पायेगी यह कहना अभी मुश्किल है। भविष्य में सरस्वती की ही तरह गंगा के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह न लगाये जाएं इसलिए आवश्यक है गंगा को हर खतरे से बचाए रखना। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://feedfury.com/content/8003710-.html"&gt;http://feedfury.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;&lt;strong&gt; &lt;br /&gt; ‘सरस्वती’ न बन जाए ‘गंगा’ &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वर्षा तिवारी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि ग्लोबल वामग से इसी प्रकार पृथ्वी का तापमान बढ़ता रहा तो बहुत जल्द सरस्वती की तर्ज पर गंगा भी लुप्त हो जाएगी।ं गंगा मात्र जलधारा नहीं वरन् भारतीय संस्कृति की आत्मा है, उसके बिना भारतवर्ष की कल्पना संभव नहीं है। गंगा आज प्रदूषण के अत्यंत भयावह दौर से गुजर रही है। यदि पृथ्वी का तापमान इसी तरह बढता रहा तो गंगा का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और गंगा भी इतिहास के पन्नों में उसी प्रकार सिमट कर रह जाएगी जैसे सरस्वती।&lt;br /&gt;पृथ्वी के तापमान में निरंतर होती वृद्वि से गंगा बेसिन क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। गंगोत्री से कुछ किमी पैदल दूरी पर गंगा का उद्गम स्थल गोमुख ग्लेशियर निरंतर पीछे खिसक रहा है। ताजा आकड़े के अनुसार वर्ष 1990 से लेकर 2006 तक गोमुख ग्लेशियर 22.8 हेक्टेयर पीछे खिसका है। इंटरनेशनल कमीशन फार स्नो एण्ड आइस के एक समूह द्वारा हिमालय स्थित ग्लेशियरों का अध्ययन किया गया। अध्ययनकर्ताओं के अनुसार आने वाले 50 वषा में मध्य हिमालय के तकरीबन 15 हिमखंड पिघलकर समाप्त हो जाएंगे। गोमुख ग्लेशियर पर अध्ययन से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार कुछ चौकानें वाले तथ्य सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1935 से 1956 तक गोमुख ग्लेशियर 5.25 हेक्टेयर, 1952 से 1965 तक 3.65 हे., 1962 से 1971तक 12 हे., 1977 से लेकर 1990 तक 19.6 हे. पिघलकर समाप्त हुआ है। वर्ष 1962 से 2006 तक गोमुख ग्लेशियर डेढ़ किमी. पिघला है।&lt;br /&gt;भूगर्भीय सर्वे आफ इंडिया, रिमोट सेंसिग एप्लीकेशन सेंटर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविघालय आदि संस्थानो के द्वारा किये गये अध्ययन से स्पष्ट है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियर पिछले 40 सालों में 25 से 30 मीटर पीछे खिसक चुका है। यदि यही स्थित रही तो 2035 तक ग्लेशियर पिघलकर समाप्त हो जायेगा। समुद्र तल से 12,770 फीट एवं 3770 मीटर ऊचाई पर स्थित गोमुख ग्लेशियर 2.5 किमी चौड़ा व 27 किमी लम्बा है, जबकि कुछ साल पहले गोमुख ग्लेशियर 32 किमी लम्बा व 4 किमी चौडा था।&lt;br /&gt;गोमुख ग्लेशियर पिघलने से गंगा बेसिन के क्षेत्र उत्तारांचल, बिहार, उत्तार प्रदेश का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। गोमुख क्षेत्र में लोगों का हजारों की संख्या में पहुंचना भी एक हद तक ग्लेशियर को नुकसान पहुंचा रहा है। यदि ग्लेशियर पर पर्वतारोही दलों के अभ्यास को बंद करने के साथ ही ग्लेशियर पर चढ़ने की सख्त पाबंदी लगा दी जाए तो काफी तक गोमुख ग्लेशियर की उम्र बढ़ सकती है।&lt;br /&gt;जिस प्रकार हमारे वेदों और अनेक ग्रंथों में सरस्वती नदी का वर्णन मिलता है उससे यह साबित होता है कि सरस्वती का कोई अस्तित्व था। पूर्णतया भूगर्भ में समा चुकी सरस्वती को फिर से पुर्नजीवित करने के प्रयास केंद्र सरकार का द्वारा किए जा रहे हैं पर इन प्रयासों को कितनी सफलता मिल पायेगी यह कहना अभी मुश्किल है। भविष्य में सरस्वती की ही तरह गंगा के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह न लगाये जाएं इसलिए आवश्यक है गंगा को हर खतरे से बचाए रखना। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.rashtriyasahara.com/NewsDetailFrame.aspx?newsid=36438&amp;catid=33&amp;vcatname=%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%A4%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%95"&gt; http://www.rashtriyasahara.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-331817826518442712?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/331817826518442712/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=331817826518442712' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/331817826518442712'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/331817826518442712'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_2377.html' title='‘सरस्वती’ न बन जाए ‘गंगा’'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-201479277855428343</id><published>2008-06-08T22:23:00.001-07:00</published><updated>2008-06-08T22:28:16.015-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ग्लेशियर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गंगोत्री'/><title type='text'>बढ़ती गर्मी से गंगोत्री ग्लेशियर ख़तरे में</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEy_RN482aI/AAAAAAAAAZU/YnidCk5zrys/s1600-h/gangotris.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEy_RN482aI/AAAAAAAAAZU/YnidCk5zrys/s400/gangotris.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5209749171468032418" /&gt;&lt;/a&gt;सुशील झा, बीबीसी संवाददाता, गंगोत्री से&lt;br /&gt;  &lt;strong&gt;पहाड़ों के बीच से गंगा पतली धार के रुप में निकलती है &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;दुनिया भर के बढ़ते हुए तापमान का भारतीय ग्लेशियरों पर व्यापक प्रभाव पड़ने वाला है और गंगोत्री जैसे बड़े ग्लेशियर अगले बीस तीस वर्षों में समाप्त हो सकते हैं. &lt;br /&gt;ये आशंकाएं एकबारगी तो फ़िल्मी कहानी जैसी लगती है लेकिन गंगोत्री ग्लेशियर के बारे में स्थानीय लोगों से बात करने पर लगता है कि ऐसा होने में देर हो सकती है लेकिन यह असंभव नहीं है. &lt;br /&gt;गंगोत्री से गोमुख यानी ग्लेशियर के पास तक पर्यटकों को ले जाने वाले गाइड गणेश कहते हैं कि उन्होंने पिछले पांच वर्षों में ही ग्लेशियर को एक किलोमीटर खिसकते देखा है. &lt;br /&gt;उनकी राय बाकी लोगों से अलग बिल्कुल नहीं है. कुली का काम करने वाले जोशी भी कहते हैं कि ग्लेशियर पिघल रहा है. वो कहते हैं ' आबादी बढ़ रही है. लोग बढ़ रहे हैं. गर्मी बढ़ रही है. ग्लेशियर तो पिघलेगा ही. पहले से तो बहुत पीछे चला गया है.' &lt;br /&gt;मिथकों के अनुसार पहले गोमुख वहां हुआ करता था जहां अब गंगोत्री शहर है यानी मिथकों की मानें तो पिछले सौ डेढ सौ साल में ग्लेशियर 18 से 19 किलोमीटर पीछे चला गया है. &lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;गंगोत्री से केवल पचास किलोमीटर दूर कई विस्फ़ोट हो रहे हैं स्थानीय निवासी मंगल सिंह रावत कहते हैं कि उत्तरकाशी से लेकर गंगोत्री के बीच बड़ी परियोजनाओं ने भी ग्लेशियर को नुकसान पहुंचाया है. वो कहते हैं ' भैरों घाटी में मनेरी बांध बना है. इसके अलावा लोहारीनाग पाला पनबिजली परियोजना चल रही है जिसके तहत पहाड़ों को काटा जा रहा है. प्रकृति के साथ खिलवाड़ तो सही नहीं है. 'स्थानीय लोगों की बात का समर्थन पिछले कई वर्षों से गंगोत्री के पहाड़ों में ही रहने वाले ब्रह्मचारी अनिल स्वरुप भी करते हैं. अनिल पिछले कुछ वर्षों में गंगोत्री बचाओ अभियान मे लगे हुए हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गंगा प्रदूषण या गंगा बचाओ&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;वो कहते हैं ' लोग गंगा के प्रदूषण की बात करते हैं लेकिन मैं कहता हूं कि गंगा को बचाना अधिक महत्वपूर्ण है. टिहरी बांध के बाद गंगा नाले जैसी बहती है. कहां है गंगा. गंगोत्री पीछे जा चुका है. इतनी गंदगी है.ग्लेशियर को बचाने का कोई उपाय नहीं किया जा रहा है.'&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;  जब भूकंप होता है या ऐसी कोई बड़ा कंपन होता है तो ग्लेशियर पर प्रभाव पड़ता है. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तो है ही&lt;br&gt;&lt;br /&gt;डॉ डोभाल, ग्लेशियर विशेषज्ञ &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;स्वरुप भी परियोजनाओं से नाराज़ है. वो कहते हैं ' मुझे लगता है कि इन परियोजनाओं के लिए जिस तरह से पहाड़ो में विस्फोट किए जा रहे हैं वो ग्लेशियरों को नुकसान पहुंचा रहा है. 'गंगोत्री से उत्तरकाशी के रास्ते में जगह जगह पर हमने भी यह देखा कि पहाड़ों में विस्फोट किए जा रहे हैं जिससे पूरी हिमालय शृंखला हिलती होगी इससे कोई इंकार नहीं कर सकता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कई और कारण&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;देहरादून में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के डॉ डोभाल भी मानते हैं कि विस्फोटों से ग्लेशियर को नुकसान होता होगा.अगर वार्मिंग नहीं रुकी तो ये बर्फ दिखाई नहीं पड़ेगी .वो कहते हैं ' देखिए जो हिमालय के ग्लेशियर हैं वो बहुत पुराने नहीं हैं. जब भूकंप होता है या ऐसी कोई बड़ा कंपन होता है तो ग्लेशियर पर प्रभाव पड़ता है. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तो है ही. गर्मी बढ़ी है. पहाड़ों में तापमान बढ़ गया है. लेकिन अगर ऐसे विस्फोट होते हैं तो स्थिति ख़राब होती ही है.'डोभाल कहते हैं कि पिछले दस वर्षो में ग्लेशियर के आस पास के इलाक़े के मौसम में भी बदलाव हुए हैं. &lt;br /&gt;वो कहते हैं ' हो ये रहा है कि गर्मी का समय बढ़ गया. नवंबर तक बर्फ गलती है. बर्फ जमा कम हो रही है. हमारे अनुमान से हर साल गंगोत्री 20 मीटर पीछे जा रहा है. '&lt;br /&gt;वो कहते हैं कि गंगोत्री ग्लेशियर के पास लाखों लोग जाते हैं और वहां गंदगी फ़ैलाते हैं प्लास्टिक फेंकते हैं जो कि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को और बढ़ा देता है. स्थानीय लोगों और वैज्ञानिकों की बात एक जैसी लगती हो लेकिन भारत में कई लोग यह मानने को तैयार नहीं कि ग्लेशियर ख़त्म होगा और गंगा जैसी नदियां समाप्त हो जाएंगी.&lt;br /&gt;जो नहीं मानते उनका कुछ नहीं हो सकता है, लेकिन कम से कम हमें अपने स्तर पर गंगोत्री जैसे ग्लेशियरों को बचाने के लिए कुछ न कुछ करना चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/04/070406_gangotri_climate.shtml"&gt;http://www.bbc.co.uk&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-201479277855428343?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/201479277855428343/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=201479277855428343' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/201479277855428343'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/201479277855428343'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_4543.html' title='बढ़ती गर्मी से गंगोत्री ग्लेशियर ख़तरे में'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEy_RN482aI/AAAAAAAAAZU/YnidCk5zrys/s72-c/gangotris.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-654200109394908515</id><published>2008-06-08T22:20:00.000-07:00</published><updated>2008-06-08T22:22:22.404-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिमनदों'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ग्लेशियर'/><title type='text'>पिघल रहे हिमालय के तीन प्रमुख ग्लेशियर</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEy91wMnnII/AAAAAAAAAZM/u5NjnOGwiKE/s1600-h/22glacier-.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEy91wMnnII/AAAAAAAAAZM/u5NjnOGwiKE/s400/22glacier-.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5209747600129367170" /&gt;&lt;/a&gt;गंगटोक [जोसेफ लेप्चा]। सिक्किम के उत्तरी क्षेत्र में हिमालय की 5200 मीटर ऊंची वादियों पर स्थित जेमू, योगसिंग व तलुंग हिमनद का करीब 150 मीटर क्षेत्र पिघल गया है। यह सिक्किम की तिस्ता व रंगीत नदियों के लिए खतरे का संकेत है। तीनों ग्लेशियर या हिमनद तिस्ता व रंगीत के मुख्य स्रोत हैं। वैश्रि्वक उत्ताप के दुष्प्रभाव के चलते विगत 82 वर्ष के तथ्यों के आधार पर पता चला है कि इस क्षेत्र के कई ग्लेशियर गायब हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह महत्वपूर्ण खुलासा ब्रिटिश पर्वतारोही दल के सदस्यों ने दैनिक जागरण से खास बातचीत के दौरान किया। ग्लेशियर के पिघलाव व पर्वतारोहण अभियान की तीन सदस्यीय टोली में कालिन नावेल्स , जार्जी एवं एड्रिन ओ कोनर (46) शामिल थे। नावेल्स ने बताया कि 1926 में पहली बार एक ब्रिटिश सैन्य अधिकारी कैप्टन बडस्टेंड ने इन हिमनदों के अध्ययन का अभियान शुरू किया था। उनकी प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार तीनों हिमनद आपस में जुड़े हुए थे, लेकिन जब उनकी टोली हिमनदों के पास पहुंची तो वहां उन्हें तीनों हिमनदों को जोड़ने वाली 200 मीटर का भाग खाली व ऊबड़-खाबड़ नजर आया। रिपोर्ट के अनुसार अब एक दूसरे हिमनद तक पहुंचना जोखिम भरा हो गया है। जार्जी ने बताया कि टोली का लक्ष्य हिमनदों को पार कर पश्चिम सिक्किम के योकसम से ग्रीन लेक होते हुए उत्तर सिक्किम के लाचेन पहुंचने का था, लेकिन बार-बार बिगड़ते मौसम के चलते वह ऐसा नहीं कर सके। इस बीच खाद्य पदार्थो का अभाव भी आड़े आ रहा था। अभियान के दौरान 5200 मीटर की ऊंचाई तक 28 दिनों के अंतराल में करीब 120 किमी की थका देने वाली पैदल यात्रा करनी पड़ी। अभियान योकसम से शुरू किया गया था व तलुंग हिमनद के नीचे स्थित योंगीटार को बेस कैम्प बनाया गया था। लेकिन अभियान में केवल योंगसिंग व तलुंग तक पहुंचा जा सका। वहां से जेमू ग्लेसियर पहुंचने के लिए तीन दिनों की असफल यात्रा की गई। योकसम से ऊपर गोचेला में पहुंचने के लिए पर्वतारोहियों को खराब मौसम के चलते बेस कैंप वापस लौटना पड़ा। एक अन्य पर्वतारोही ओ कोनर ने केंद्र व राज्य सरकार को पर्वतारोहण की अनुमति देने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि भविष्य में उक्त ग्लेशियर क्षेत्र पर्वतारोहियों को प्रेरित करता रहेगा। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_4471624/"&gt;http://in.jagran.yahoo.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-654200109394908515?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/654200109394908515/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=654200109394908515' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/654200109394908515'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/654200109394908515'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_08.html' title='पिघल रहे हिमालय के तीन प्रमुख ग्लेशियर'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEy91wMnnII/AAAAAAAAAZM/u5NjnOGwiKE/s72-c/22glacier-.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-57226715623073510</id><published>2008-06-07T01:46:00.000-07:00</published><updated>2008-06-07T01:47:23.918-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गंगा नदी'/><title type='text'>गंगा की मचलती लहरों में जहरीले रसायनों का सैलाब</title><content type='html'>&lt;strong&gt;डा. महेश परिमल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हमारी पवित्र नदी गंगा नदी. भगीरथ के प्रयासों से पृथ्वी पर लाई जाने वाली गंगा नदी, मोक्षदायिनी गंगा नदी, जीवनदायिनी गंगा नदी, कष्टहरणी गंगा नदी आज विश्व की सबसे प्रदूषित नदी हो गई है. शायद किसी को विश्वास नहीं होगा कि भारत देश की पहचान गंगा नदी के पानी में आज ऑक्सीजन की मात्रा दिनों-दिन कम होती जा रही है. लेकिन अब तक न तो कानपुर के चर्म उद्योग का विषैला पानी का आना रुका, न ही लाशों को बहाने का काम रुका और न ही आसपास के कारखानों का रसायनयुक्त पानी का आना रुका, इन्हीं कारणों से आज गंगा नदी बुरी तरह से प्रदूषित हो गई है. भगीरथ ने इस गंगा नदी को पृथ्वी पर लाने के लिए जितनी तपस्या की थी, उससे कहीं अधिक प्रयास हमारी भावी पीढ़ी को उसकी पवित्रता को वापस लाने के लिए करना होगा, इसकी भी केवल संभावना ही है. क्योंकि अब गंगा नदी को किसी भी रूप में पवित्र नहीं किया जा सकता.&lt;br /&gt;शास्त्रों में जिसे अत्यंत पवित्र और शुध्द कहा है, उसी गंगा नदी के जल में ऑक्सीजन की मात्रा तेजी से घट रही है. फलस्वरूप गंगा नदी की जल सृष्टि के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है. वैज्ञानिकों की दृष्टि में पानी में रहने वाले जलचर प्राणियों के लिए पानी में घुली हुई ऑक्सीजन आवश्यक होती है, उनके अनुसार पानी में घुलने वाली ऑक्सीजन का प्रमाण प्रति लीटर कम से कम पाँच मिलीग्राम होना चाहिए, परंतु गंगा जैसी पवित्र नदी में बहाए जाने वाले रसायनयुक्त कचरे से प्रदूषण की मात्रा बढ़ने के कारण गंगा जल में ऑक्सीजन का प्रमाण क्रमश: खूब तेजी से घटना चिंता का वायज बन गया है.&lt;br /&gt;पर्यावरणविदों ने गंगाजल प्रदूषण पर चल रहे शोध में चौंकाने वाले परिणाम दिए हैं. कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना जैसे बड़े शहरों की तमाम गंदगी के साथ खतरनाक रसायन गंगा के पानी को ंजहरीला बना रहे हैं. गंगा नदी के प्रदूषण पर शोध कर रही छात्रा वंदना श्रीवास्तव ने कहा है कि गंगा जल में ऑक्सीजन का प्रमाण तेजी से घट रहा है. गंगा जल में ऑक्सीजन का प्रमाण 680 लीटर में 9 से 11 मिलीग्राम है. वैसे देखा जाए तो पेयजल में ऑक्सीजन की मात्रा प्रति लीटर 8 मिलीग्राम से अधिक होनी चाहिए. जबकि हुगली के पास गंगा में यह मात्रा 1.2 मिलीग्राम से दो मिलीग्राम प्रति लीटर हो गई है. इस कारण जल में रहने वाले प्राणियों की संख्या लगातार कम होते जा रही है. गंगा नदी के प्रदूषण का मुख्य कारण उद्योगों का और गटर का पानी है. आपको आश्चर्य होगा कि कानपुर के चर्म उद्योग के 200 कारखानों का अतिजहरीला क्रोमियम वाला लगभग 20 करोड़ लीटर का दूषित पानी गंगा में बहाया जाता है. इससे गंगा नदी में पलने वाली डॉल्फिन अब लुप्तप्राय हो गई है. घड़ियाल, मगरमच्छ और कछुए तेजी से लुप्त हो रहे हैं. मछलियों की हालत तो और भी खराब है, उसकी कई प्रजातियों पर मौत का साया मँडरा रहा है.&lt;br /&gt;हाल ही में स्वच्छ गंगा रिसर्च लेबोरेटरी ने बनारस के तट पर शोध करके यह निष्कर्ष निकाला कि गंगा में मानव मल-मूत्र में होने वाले वैक्टिरिया की मात्रा 13 गुना अधिक थी, जो अब बढ़कर 300 गुना हो गई है. पहले गंगा के निर्मल जल में साफ दिखाई देने वाली मछलियाँ अब नहीं दिखती. एक अंदाज के अनुसार गंगा में रोज 134 करोड़ लीटर गटर का गंदा पानी बहाया जाता है. इस कारण लोग अब गंगा नदी को 'गटर गंगा' भी कहने लगे हैं. इलाहाबाद और वाराणसी में आज भी गंगा नदी में गटर का पानी बहाया जाता है. राज्य के प्रदूषण विभाग का कहना है कि जल के शुद्धिकरण के लिए अपनाई जाने वाली तकनीक क्रोमियम, कैडमियम और सीसे जैसी अतिजहरीले प्रदूषक तत्व को प्रभावित कर पाए, इसकी संभावना ही नहीं है. इस नदी के किनारे बने कारखानों से आते जहरीले रसायनों ने इसे इतना प्रदूषित बना दिया है कि इसका पानी पीने योग्य नहीं रह गया है. अब वह बात तो एक सपना बनकर रह गई है कि गंगा नदी का पानी कभी गंदा नहीं होता. अब तो यही कहा जा सकता है कि यदि मृत्यु प्राप्त करना है तो गंगा जल ही पी लो. इस पानी का प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि अब इससे सिंचाई भी नहीं हो सकती. निश्चित रूप से इस पानी से कई खेतों में सिंचाई हो रही होगी, अब आप ही समझ सकते हैं कि उन खेतों पर लगने वाली फसल कितनी सुरक्षित और खाने योग्य होगी?&lt;br /&gt;यही गंगा नदी है जिसे लोग मोक्षदायिनी कहते हैं, लेकिन यही नदी आज अपने मोक्ष के लिए तरस रही है. मौत के बाद हर कोई गंगा को ही याद करता है. इसी गंगा में रोज सैकड़ों लाशें बहाई जाती हैं. कुछ जगहों तो गंगा का पानी काला हो गया है, क्योंकि उसमें अग्नि संस्कार के बाद शेष राख, कोयला तथा अधजली लकड़ियाँ विसर्जित की जाती है, जिससे कार्बनिक तत्वों की मात्रा बढ़ रही है और ऑक्सीजन की मात्रा कम हो रही है. &lt;br /&gt;भगीरथ के अथक प्रयासों की कहानी कहने वाली गंगा अब बुरी तरह से प्रदूषित हो चली है. यदि इसकी जानकारी भगीरथ को पहले हो जाती, तो शायद यह गलती वे कभी नहीं करते. अब तो गंगा जल से सौगंध भी नहीं ली जा सकती. इससे तो अच्छा है कि ऍंजुरि में किसी कुएँ का ही पानी ले लिया जाए. हाँ यदि किसी को आत्महत्या करनी हो, तो निश्चित रूप से वह गंगा जल पीकर अपनी इहलीला समाप्त कर सकता है. निकट भविष्य में किसी नारी के लिए यह कहना कि वह गंगा की तरह पवित्र है, एक अपशब्द बनकर रह जाएगा. कोई भी सबला नारी यह आरोप बर्दाश्त नहीं कर पाएगी. गंगा माँ आज प्रदूषित हो गई है और उसे प्रदूषित करने वाले उसके ही अपने पुत्र हैं, जिन्होंने संभवत: यह शपथ ले रखी है कि देश की कोई भी नदी को हम पवित्र नहीं रहने देंगे.&lt;br /&gt;डा. महेश परिमल&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-57226715623073510?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/57226715623073510/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=57226715623073510' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/57226715623073510'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/57226715623073510'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_4105.html' title='गंगा की मचलती लहरों में जहरीले रसायनों का सैलाब'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-8137826954398369832</id><published>2008-06-07T01:42:00.000-07:00</published><updated>2008-06-07T01:43:21.016-07:00</updated><title type='text'>झीलों के संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास आवश्यक -राष्ट्रपति</title><content type='html'>झीलों एवं नम भूमि का संरक्षण‘ विषय पर आधारित इस सम्मेलन का आयोजन भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रलय द्वारा राजस्थान सरकार एवं इन्टरनेशनल लेक एन्वायरन्मेंट कमेटी, जापान के सहयोग से किया गया है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई दिल्ली, २९ अक्टूबर। राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटील ने झीलों एवं नम भूमि के संरक्षण के लिए विश्व स्तरीय प्रयास करने पर जोर देते हुए कहा कि समय आ गया है जब हम अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग के कदम उठाते हुए जल सुरक्षा पर गंभीरता से कार्य करें। &lt;br /&gt;श्रीमती पाटील सोमवार को जयपुर के बिरला ऑडिटोरियम में आयोजित पांच दिवसीय १२वें विश्व झील सम्मेलन ‘ताल-२००७‘ का विधिवत उद्घाटन करने के बाद प्रतिभागियों एवं  उपस्थित लोगों को सम्बोधित कर रहीं थीं। ‘भविष्य के लिए झीलों एवं नम भूमि का संरक्षण‘ विषय पर आधारित इस सम्मेलन का आयोजन भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रलय द्वारा राजस्थान सरकार एवं इन्टरनेशनल लेक एन्वायरन्मेंट कमेटी, जापान के सहयोग से किया गया है। &lt;br /&gt;राष्ट्रपति ने कहा कि ‘झीलों को बचाने के अभियान‘ को सफल बनाने के लिए हम सबको मिलकर प्रयास करने की जरूरत है। उन्हने कहा कि बढते शहरीकरण एवं औद्योगीकरण के कारण विश्व भर में झीलों को अनेक प्रकार से क्षति पहुंची है। इसी कारण से सभी देशों में झीलों के पुनरूद्धार एवं उनकी जल की गुणवत्ता को सुधारने के लिए सघन प्रयास किये गये हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि विकसित और विकासशील देशों के बीच झीलों के संरक्षण एवं उनके रखरखाव के संबंध में सहभागिता स्थापित करने के प्रयास किये जाने चाहिए और इसमें  तकनीकी आदान-प्रदान एवं क्षमता निर्माण पर मुख्य रूप से सहयोग होना चाहिए। &lt;br /&gt;श्रीमती पाटील ने झीलों के पुनरूद्धार के लिए सभी सरकारों, गैर सरकारी संगठनों, स्थानीय समुदाय एवं व्यक्तियों की भागीदारी प्रोत्साहित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि झीलों को स्थाई रूप से संरक्षित करने में जनभागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि गैर सरकारी संगठनों को झीलों के संरक्षण के प्रति जन चेतना जाग्रत करने के साथ-साथ स्थानीय समुदाय के क्षमता निर्माण में भी मदद करनी चाहिए। &lt;br /&gt;राष्ट्रपति ने कहा कि आज ‘‘ग्लोबल वार्मिंग‘‘ और मौसम में हो रहे परिवर्तन से विश्व भर में झीलों के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो गया है। उन्होंने ‘इन्टर-गवर्नमेंटल पैनल ऑफ क्लाईमेटिक चेंज‘ की रिपोर्ट की चर्चा करते हुए कहा कि इस रिपोर्ट के अनुसार आने वाले वर्षों में झीलों एवं नम भूमि में जल क्षेत्र एवं जैव विविधता में महत्वपूर्ण परिवर्तन होंगे। इसी को दृष्टिगत रखते हुए हमें मौसम में सुधार के प्रभाव को कम करने विशेषकर शुद्ध जल संसाधन के लिए विशेष कदम उठाने होंगे। &lt;br /&gt;श्रीमती पाटील ने झीलों के संरक्षण के लिए प्रभावी कानून बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने भारत में इस संबंध में उठाये गये कदमों की सराहना करते हुए कहा कि भारत पहला देश है जिसने कि जल प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए व्यापक कानून बनाया और इसी के साथ विश्व स्तर पर संरक्षण प्रयासों के तहत १९८१ में नम भूमि पर आयोजित रामसर कन्वेंशन में भी सक्रिय रूप से भागीदारी की थी। उन्होंने कहा कि हमारे देश में अनेक झीलों के संरक्षण के प्रयासों को विश्व स्तर पर सराहा गया है। उन्होंने कहा कि चिल्का झील के पुनरुद्धार के लिए देश को रामसर संरक्षण अवार्ड दिया गया। इसी प्रकार भोपाल झील के संरक्षण कार्य की भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा हुई है। &lt;br /&gt;राजस्थान का जिक्र करते हुए श्रीमती पाटील ने कहा कि राज्य में बारिश के पानी को एकत्रित करने के लिए झीलों के निर्माण की बहुत पुरानी परम्परा रही है। उन्होंने कहा कि राजस्थान में वर्षों पहले पिछोला, जयसमंद, फतेहसागर एवं उम्मेदसागर जैसी झीलों को निर्माण किया गया था। उन्होंने बताया कि जयपुर की मानसागर झील का निर्माण ४०० वर्ष पूर्व जयपुर की स्थापना से भी पहले किया गया था जबकि जमुवारामगढ झील का निर्माण शहर को पेयजल सुलभ कराने के लिए १२५ वर्ष पूर्व किया गया था। &lt;br /&gt;समारोह की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान के राज्यपाल श्री एस.के. सिंह ने कहा कि झीलें मानव की आजीविका को बनाये रखने तथा आर्थिक गतिविधियों में सहायक भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि विकास प्रक्रिया के साथ पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता बहुत आवश्यक है। उन्होंने झीलों के संरक्षण एवं पुनरुद्धार तथा नम भूमि को राजस्थान की राष्ट्रीय धरोहर एवं पारिस्थितिकी का हिस्सा बनाने पर जोर दिया।&lt;br /&gt;राज्यपाल ने कहा कि भारत जैव विविधता वाला देश है जिसमें विश्व के ७ प्रतिशत फ्लोरा, ६.२५ प्रतिशत फोना, एम्फीबियंस तथा रेंगने वाले जीव जन्तुओं की ६१४ प्रजातियां, पक्षियों की १२२५ तथा ‘मैमल्स‘ की ३५० प्रजातियां हैं। उन्हने कहा कि आज इनम से कुछ प्रजातियों के सामने गंभीर संकट बना हुआ है जो अधिकांश झीलों एवं नम भूमि के आसपास उपलब्ध हैं। ऐसे में आवश्यक है कि हम हालातों में सुधार एवं प्रजातियों के संरक्षण के लिए कार्य करें।&lt;br /&gt;इस अवसर पर बोलते हुए मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने कहा कि राजस्थान नम भूमि एवं झीलों की दृष्टि से विविधता वाला प्रदेश है। उन्होंने कहा कि इनके संरक्षण की सांस्कृतिक परम्परा है तथा हम जल इकाइयों को श्रद्धा से पूजते हैं। उन्होंने कहा कि पुष्कर सरोवर के किनारे प्रतिवर्ष सुप्रसिद्ध पुष्कर मेला आयोजित किया जाता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उदयपुर पर्यटकों के आकर्षण का ही नहीं बल्कि समृद्ध जैव विविधता वाला क्षेत्र है। &lt;br /&gt;उन्होंने केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री का राजस्थान में झीलों के संरक्षण के प्रस्तावों पर स्वीकृति देने के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार को भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय पार्क की नम भूमि के लिए भी आवश्यक कदम उठाने चाहिए जिससे कि वहां के जीव-जन्तु एवं पर्यावरण को भी संरक्षित किया जा सके। उन्होंने आशा व्यक्त की कि राजस्थान में केन्द्र की मदद से नम भूमि और झीलों के पर्यावरण को सुधारने में सफलता मिलेगी। &lt;br /&gt;श्रीमती राजे ने नम भूमि और झीलों के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए व्यापक जन चेतना जाग्रत करने की आवश्यकता प्रतिपादित की। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने गत वर्षों में जनभागीदारी से जल प्रबंधन एवं शिक्षा के क्षेत्र मे सफलतापवूर्वक कई कार्यक्रमों को क्रियान्वित किया है और झीलों के संरक्षण के संबंध में भी इसे अपनाया जा सकता है। &lt;br /&gt;केन्द्रीय पर्यावरण राज्यमंत्री श्री नमोनारायण मीणा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए झीलों एवं नम भूमि के संरक्षण एवं रखरखाव की आवश्यकता प्रतिपादित की और केन्द्र सरकार झील सीमा तथा इसके बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण एवं अनैतिक गतिविधियों को अपराध की श्रेणी में लाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए एक अलग से कानून बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि झीलों के अस्तित्व को बचाना आज की एक चुनौती है तथा इसके लिए लोगों में जागरूकता आवश्यक है।&lt;br /&gt;श्री मीणा ने बताया कि बढती जनसंख्या तथा बढते शहरीकरण से झीलों तथा नम भूमि के रखरखाव में काफी बदलाव आया है और प्रदूषण की समस्या बढ रही है। उन्होंने बताया कि मंत्रलय ने देश के १३ राज्यों की ४८ झीलों के रखरखाव का कार्य अपने हाथ में लिया है। उन्होंने बताया कि  राजस्थान की मानसागर झील तथा हाल ही में अजमेर की आनासागर झील तथा आबू की नक्की झील का कार्य हाथ में लिया गया है।&lt;br /&gt;उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस पांच दिवसीय सम्मेलन में झीलों के रखरखाव तथा संरक्षण के लिए अच्छे सुझाव सामने आएंगे। उन्होंने बताया कि दक्षिणी एशिया में पहली बार हो रही इस कांफ्रेंस में ६० देशों के लगभग ८०० वैज्ञानिक भाग ले रहे हैं।&lt;br /&gt;इन्टरनेशनल लेक एनवायरन्मेंट कमेटी फाउंडेशन जापान के डायरेक्टर जनरल श्री होरोनोरी हामानाका ने कहा कि झीलों तथा नम भूमि के संरक्षण के लिए सर्वप्रथम १९८४ में इस प्रकार का पहला सम्मेलन आयोजित किया गया था तथा इसके बाद दो वर्षों के अंतराल में विश्व के विभिन्न भागों में इसके सम्मेलन निरन्तर हो रहे हैं जो वैज्ञानिक सोच के साथ विकासशील देशों को झीलों तथा नम भूमि के रखरखाव के उपाय सुझाते हैं। उन्होंने आशा प्रकट की कि सम्मेलन में आने वाले सुझाव इस कार्य को एक नई दिशा प्रदान करेंगे।&lt;br /&gt;योजना आयोग के सदस्य श्री वी.एल. चोपडा ने मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए बताया कि वर्ष २००१ में योजना आयोग ने झील संरक्षण कार्यक्रम हाथ म लिया तथा इसके लिए २२० करोड रुपए का प्रावधान किया है। उन्होंने बताया कि एन.आर.सी.पी.कार्यक्रम के तहत देश की ३५ नदियां तथा २५ जोन आते हैं।&lt;br /&gt;उन्होंने जल की आवश्यकता तथा महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसके प्रति जन चेतना जाग्रत करने की जरूरत प्रतिपादित की। उन्होंने झीलों तथा नम भूमि की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। &lt;br /&gt;इस अवसर पर राज्य के पर्यावरण एवं वन मंत्री श्री लक्ष्मीनारायण दवे, इबारकी प्रीफेक्चर जापान के गर्वनर श्री हाशीमूतो, सांसद श्री गिरधारी लाल भार्गव, मुख्य सचिव श्री डी.सी. सामंत, पुलिस महानिदेशक श्री ए.एस.गिल, बडी संख्या में प्रशासनिक अधिकारी, देश-विदेश से आए वैज्ञानिक, पर्यावरण विशेषज्ञ तथा गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। सम्मेलन में ६० देशों के लगभग ६०० प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-8137826954398369832?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/8137826954398369832/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=8137826954398369832' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8137826954398369832'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8137826954398369832'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_4977.html' title='झीलों के संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास आवश्यक -राष्ट्रपति'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-4369932998805759278</id><published>2008-06-07T01:10:00.000-07:00</published><updated>2008-06-07T01:32:12.191-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एक-एक बूँद पानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डा. महेश परिमल'/><title type='text'>प्याऊ: एक परंपरा की मौत</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEpGZzu0h9I/AAAAAAAAAZE/0TrNsuKWJCA/s1600-h/water01.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEpGZzu0h9I/AAAAAAAAAZE/0TrNsuKWJCA/s400/water01.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5209053328204662738" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;डा. महेश परिमल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;समाज में कई परंपराएँ जन्म लेती हैं और कई टूट जाती हैं. परंपराओं का प्रारंभ होना और टूटना विकासशील समाज के आवश्यक है. परंपराएँ टूटने के लिए ही होती हैं. पर कुछ परंपराएँ ऐसी होती हैं, जिनका टूटना मन को दु:खी कर जाता है. पर जो अच्छी परंपराएँ हमारे देखते ही देखते समाप्त हो जाती हैं, उसे परंपरा की मौत कहा जा सकता है. कुछ ऐसा ही अनुभव तब हुआ, जब पाऊच और बोतल संस्कृति के बीच प्याऊ की परंपरा को दम तोड़ते देख रहा हूँ.&lt;br /&gt;पहले गाँव, कस्बों और शहरों में कई प्याऊ देखने को मिल जाते थे. जहाँ टाट से घिरे एक कमरे में रेत के ऊपर रखे पानी से भरे लाल रंग के घड़े होते थे. बाहर एक टीन की चादर को मोड़कर पाइपनुमा बना लिया जाता था. पानी कहते ही भीतर कुछ हलचल होती और उस पाइपनुमा यंत्र से ठंडा पानी आना शुरू हो जाता था. प्यास खत्म होने पर केवल अपना सर हिलाने की जरूरत पड़ती और पानी आना बंद. ंजरा अपने बचपन को टटोलें, इस तरह के अनुभवों का पिटारा ही खुल जाएगा. अब यदि आपको उस पानी पिलाने वाली बाई का चेहरा याद आ रहा हो, तो यह भी याद कर लें कि कितना सुकून हुआ करता था, उसके चेहरे पर. एक अंजीब सी शांति होती थी, उसके चेहरे. इसी शांति और सुकून को कई बार मैंने उन माँओं के चेहरे पर देखा हैं, जब वे अपने मासूम को दूध पिलाती होती हैं.&lt;br /&gt;कई बार रेल्वे स्टेशनों पर गर्मियों में पानी पिलाने का पुण्य कार्य किया जाता. पानी पिलाने वालों की केवल यही प्रार्थना होती, जितना चाहे पानी पीयें, चाहे तो सुराही में भर लें, पर पानी बरबाद न करें. उनकी यह प्रार्थना उस समय लोगों को भले ही प्रभावित न करती हों, पर आज जब उन्हीं रेल्वे स्टेशनों में एक रुपए में पानी का छोटा-सा पाऊच खरीदना पड़ता है, तब समझ में आता है कि सचमुच उनकी प्रार्थना का कोई अर्थ था.&lt;br /&gt;मुहावरों में 'पानी पिलाना' यानि भले ही मंजा चखाना होता हो, पर यह सनातन सच है कि पानी पिलाना एक पुण्य कार्य है. अच्छी भावना के साथ किसी प्यासे को पानी पिलाना तो और भी पुण्य का काम है. अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं है. कार्यालयों में उस चपरासी या पानी वाली बाई को ही देख लें, जो बहुत ही इत्मीनान से लोगों को पानी पिलाने का पुण्य कार्य करते हैं. हालांकि वे इस कार्य को अपनी डयूटी समझते हैं. पर यह सच है कि जब वे हमें गिलास में पानी देते हैं, तब उनके चेहरे पर एक सुकून होता है. वह सुकूनभरा चेहरा अब आपको और कहीं नहीं मिलेगा.&lt;br /&gt;समय के साथ सब कुछ बदल जाता है, पर अच्छी परंपराएँ जब देखते ही देखते दम तोड़ने लगती है, तब दु:ख का होना स्वाभाविक है. पुरानी सभी परंपराएँ अच्छी थीं, यह कहना मुश्किल है, पर कई परंपराएँ जिसके पीछे किसी तरह का कोई स्वार्थ न हो, जिसमें केवल परोपकार की भावना हो, उसे तो अनुचित नहीं कहा जा सकता. उस प्याऊ परंपरा में यह भावना कभी हावी नहीं रही कि पानी पिलाना एक पुण्य कार्य है. मात्र कुछ लोग चंदा करते और एक प्याऊ शुरू हो जाता. अब तो कहीं-कहीं प्याऊ के उद्धाटन की खबरें पढ़ने को मिल जाती हैं, पर कुछ दिनों बाद वह या तो पानी बेचने का व्यावसायिक केंद्र बनकर रहा जाता है या मवेशियों का आश्रय स्थल बन जाता है.&lt;br /&gt;कल्पना करें, कोई राहगीर दूर से चलता हुआ किसी गाँव या शहर में प्रवेश करता है, उसे प्यास लग रही है. वह पानी की तलाश में है, तब उसे कहीं प्याऊ दिखाई देता है. जहाँ वह छककर ठंडा पानी पीता है, उसकी आत्मा ही तृप्त हो जाती है. वह आगे बढ़ता है, बहुत सारी दुआएँ देकर. यही दुआएँ जो उसके दिल से निकली, कभी बेकार नहीं गई. आज एक गिलास पानी भी बड़ी जद्दोजहद के बाद मिलता है. ऐसे में कहाँ की दुआ और कहाँ की प्रार्थना? &lt;br /&gt;देखते ही देखते पानी बेचना एक व्यवसाय बन गया. यह हमारे द्वारा किए गए पानी की बरबादी का ही परिणाम है. आज भले ही हम पानी बरबाद करना अपनी शान समझते हों, पर सच तो यह है कि यही पानी एक दिन हम सबको पानी-पानी कर देगा, तब भी हम शायद समझ नहीं पाएँगे, एक-एक बूँद पानी का महत्व.&lt;br /&gt;डा. महेश परिमल&lt;br /&gt;&lt;a href="http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com "&gt;http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com &lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-4369932998805759278?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/4369932998805759278/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=4369932998805759278' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/4369932998805759278'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/4369932998805759278'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_456.html' title='प्याऊ: एक परंपरा की मौत'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_T-PEMSmKo3Q/SEpGZzu0h9I/AAAAAAAAAZE/0TrNsuKWJCA/s72-c/water01.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-3852770525005337318</id><published>2008-06-07T01:08:00.000-07:00</published><updated>2008-06-07T01:10:10.473-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पवित्र पानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नर्मदा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गंगा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डॉ. महेश परिमल'/><title type='text'>हाँ यही है पानी की हकीकत</title><content type='html'>&lt;strong&gt;डॉ. महेश परिमल &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;नदी का स्वभाव चंचल होता है,जो नदी चंचल नहीं होती, वह कुछ समय बाद अपना अस्तित्व खो देती है। हमारे देश में कई नदियाँ हैं, कुछ तो पवित्र मानी जाती हैं, तो कुछ को वरदान के रूप में माना जाता है। लोगों का नदियों के साथ अपनापा होता है। अपनी मान्यताओं के कारण ये नदियाँ लोगों की धार्मिक आस्थाओं का केंद्र बिंदु होती हैं। नर्मदा नदी, जो मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के अमरकंटक से निकलती है, मध्यप्रदेश को धन्यधान्य करती हुई गुजरात के सूखाग्रस्त क्षेत्र बनासकांठा से लेकर अब राजस्थान की धरती को हरा-भरा करने लगी है। इसी तरह पवित्र गंगा नदी, जो हिमालय से निकलकर समूचे उत्तर भारत को अपना आशीर्वाद प्रदान करती है। अब यदि इन्हीं नदियों के पानी को बोतल में भरकर बेचा जाए, तो भला कौन भारतीय नहीं होगा, जो इसे न खरीदे? लोगों की इन्हीं धार्मिक भावनाओं को पोषित करते हुए देश की कई कंपनियों ने तय किया है कि अब इन नदियों के पानी को बोतल में बंद करके बेचा जाए। पानी की इस हकीकत को समझना बहुत ही आसान है, लेकिन इसके पीछे की कुत्सित भावनाओं को यदि न समझा गया, तो लोग हवा भी बेचने से नहीं चूकेंगे, यह तय है।&lt;br /&gt;उस दिन पूजा सामग्री की एक दुकान में छोटे-छोटे कंडे देखे और एक छोटी सी बोतल में गौमूत्र देखा, तो आश्यर्च में पड़ गया, अरे! यह क्या, अब ऐसी चीों भी बिकने लगीं। भई क्या बात है। अधिक समय नहीं हुआ, जब इस तरह की चीों गौ पालक लोगों को ऐसे ही बाँट दिया करते थे, गोबर के लिए तो यही कहा जाता था कि जितना चाहे, ले जाओ। कभी कोई मनाही नहीं। आज जब यही चीों बिकने के नाम से बाजार में हैं, तो लगता है कि हम कितने आधुनिक हो गए हैं। अब हम इस पर न जाएँ कि आज पॉलीथीन का भक्षण करने वाली गाय का दूध कितना असली होता होगा और उसका मूत्र कितना लाभकारी होगा। कचरा खाने वाली गाय को गोबर भी कितना पवित्र होगा, यह तो गाय से ही पूछो, जिसे हमने ही दूध निकालकर सड़क पर अनाथ बनाकर छोड़ दिया है।&lt;br /&gt;अब जाने पानी की हकीकत। आज भारत में बोतलबंद पानी का बाजार वार्षिक 1 हजार 800 करोड़ रुपए का है और 25 पतिशत की दर से इसमें लगातार विकास हो रहा है। देश में करीब 200 प्रकार के मिनरल वॉटर के ब्रांड मौजूद हैं। आश्यर्च कि ये सभी ब्रांड मुनाफा कमा रहे हैं। इसमें से शायद ही कोई कंपनी ऐसी होगी, जो मिनरल वॉटर के लिए प्राकृतिक झरने का पानी इस्तेमाल में लाती होगी। अधिकांश कंपनियाँ जमीन के पाताल कुएँ से मुफ्त में पानी निकाल रही हैं। इसका शुद्धिकरण कर दस से बारह रुपए लीटर के भाव से इस पानी को बेच रही हैं। जमीन से एक लीटर पानी निकालने के लिए ये कंपनियाँ सरकार को मात्र ढाई पैसे चुकाती हैं, पानी को शुद्ध करने का खर्च प्रति लीटर मात्र 25 पैसा किया जाता है। इसके बाद यही पानी जब बाजार में दस से बारह रुपए लीटर बिकता है, तो हम आसानी से खरीद लेते हैं। अनजाने में हम उस कंपनी के मुनाफा देने का एक कारण बन जाते हैं। ये पानी कितना शुद्ध है, यह बताने की आवश्यकता नहीं, इस पर समय-समय पर विवाद होता ही रहता है।&lt;br /&gt;पवित्र नदियों की लोकपि्रयता को भुनाने के लिए गुजरात की अमूल डेरी ने नर्मदा के पानी को बेचने की योजना बनाई है। वड़ोदरा में एक बॉटलिंग प्लांट लगाया गया है, जहाँ नर्मदा का पानी बोतलों में बंद कर बेचा जाएगा। नर्मदा नदी भले ही मध्यप्रदेश के सुदूर गाँवों तक न पहुँच पाई हो, पर यह सच है कि अब वह बोतल में बंद होकर देश के सुदूर गाँवों तक पहुँच जाएगी। विदेशों में आज भी औषधीय गुण वाले पानी को बोतल में बंद कर बेचने की परंपरा है, उसे ही ध्यान में रखते हुए हमारे देश में भी लोगों को धार्मिक भावनाओं को पोषित करने के नाम पर नर्मदा और गंगा नदी का पानी बेचने का एक सुनियोजित षडयंत्र चल रहा है। इस कार्य में राय सरकारों का कितना हाथ है, यह शोध का विषय हो सकता है।&lt;br /&gt;विदेशों का औषधीय गुण वाला पानी 25 से 50 रुपए लीटर के भाव से बेचा जाता है। भारत मेें यदि कोइर्ण पानी अत्यंत शुध्द माना जाता है, तो वह है हिमालय की तराइयों से झरता हुआ गंगा नदी का पानी। इसे ही ध्यान में रखते हुए बिसलरी और टाटा जैसी कंपनियों ने इस पवित्र और औषधीय गुण वाले पानी को बोतल में बंद कर ऊँची कीमतों में बेचने का निर्णय लिया है। योजना तो यह भी है कि इस पानी को विदेशों में भी बेचा जाए, ताकि वहाँ रहने वाले भारतीयों की ही धार्मिक भावनाओं को डॉलर के माध्यम से भुनाया जाए। इस पानी में औषधीय गुण मात्र 5 प्रतिशत है, लेकिन कंपनी ने पानी का ब्रांड नाम ही 'हिमालय' रखा है, इसी से लोगों की धार्मिक भावनाएँ जुड़ जाती हैं। बिसलरी की योजना है कि आगामी दो वर्षों में 200 करोड़ रुपए का औषधीय पानी बोतल में बंद करके बेचा जाए। इसके लिए हिमाचल प्रदेश और उत्तरांचल में प्लांट लगाया गया है। माउंट एवरेस्ट मिनरल वॉटर नाम की कंपनी ही हिमालय के झरने का पानी बोतल में बंद कर 'हिमालय' के नाम पर बेच रही है। एक अनुमान के अनुसार यह कंपनी हर साल करीब 25 करोड़ रुपए का 'पवित्र पानी' बेच रही है। इस कंपनी के मुनाफे को देखते हुए टाटा कंपनी से इस कंपनी को खरीदने की योजना बनाई है। इस कंपनी के शेयर टाटा ने 470 करोड़ रुपए में खरीद लिए हैं। इस कंपनी का प्लांट हिमालय की पर्वतमाला में ऐसे स्थान पर स्थापित किया गया है, जहाँ भूगर्भ से कभी न खाली होने वाले जलस्रोत के भंडार हैं। यह पानी उच्च कोटि का औषधीय गुण से परिपूर्ण है। इस कंपनी ने भारत सरकार से यह जमीन 99 वर्ष के लिए लीज पर ली है। बहरहाल कंपनी हर वर्ष एक अरब लीटर पानी निकालेगी, किंतु अभीउसमें से एक करोड़ लीटर पानी भी नहीं निकाला गया है। यह कंपनी टाटा जैसी बड़ी कंपनी के हाथ में आ जाएगी, तो फिर कहना ही क्या, वह तो अरबों रुपए की कमाई करेगी, यह तय है।&lt;br /&gt;यूँ देखा जाए, तो भारतीय सादे पानी की बोतल दस से बारह रुपए में खरीदने लगे हैं, पर वास्तव में मिनरल वॉटर 25 रुपए या इससे अधिक में बेचा जा रहा है। 'हिमालय' ब्रांड मिनरल वॉटर की एक बोतल की कीमत 25 रुपए है, यह कंपनी हर वर्ष एक करोड़ लीटर पानी बेचती है। विदेश से आने वाला एवियन ब्रांड का स्प्रिंग वॉटर की एक बोतल 80 रुपए में मिलती है। इसी तरह पेरियर नाम की एक स्0श्निंप्रग वॉटर की एक बोतल 110 रुपए में हमारे ही देश में मिल रही है। इसे खरीदने में हमारे देश के ही कई लोग गर्व का अनुभव करते हैं।&lt;br /&gt;अभी हमारे देश की गरीब जनता इस तरह का मिनरल वॉटर पीने की आदी नहीं हुई है, धीरे-धीरे दस से बारह रुपए में मिलने वाली बोतल खरीदने की कोशिश कर रही है। भारतीयों की इसी मानसिकता का पूरा फायदा उठाने के लिए बड़ी-बड़ी कंपनियाँ ताक में बैठी हैं। अभी भारतीय हर वर्ष केवल 0.6 लीटर पानी ही खरीद रहे हैं, किंतु इटली में हर वर्ष लोग 183 बोतल पानी बाजार से खरीद रहे हैं। हमारे देश में जितना भी बोतलबंद पानी बेचा जा रहा है, उसमें बिसलरी का प्रतिशत केवल 16 है, इसके बाद कोक और पेप्सी का नाम आता है, उनका प्रतिशत 13-13 है। अब जब टाटा और अमूल भी इस मैदान में कूदेंगी, तो निश्चित ही इसमें कड़ी स्पर्धा होगी।&lt;br /&gt;बात जब अमूल और टाटा जैसी कंपनियों की हो, तो भला मुम्बई महानगरपालिका कैसे पीछे रह सकती है। मायानगरी में पानी की आपूर्ति करने के लिए ऍंगरेजों के जमाने की विहार, तुलसी, वैतरणा और तांसा जैसे तालाबों का इस्तेमला करने की सोच रही है। यह सच है कि इन तालाबों को ऍंगरेजों ने बनवाया, आज ये तालाब जंगल में होने के कारण इसका पानी अत्यंत शुद्ध और उच्च गुणवत्ता वाला है। वैसे इन तालाबों में जितना पानी है, वह एक करोड़ 20 लाख मुम्बईवासियों की प्यास बुझाने के लिए बहुत ही कम है। इसे ही देखते हुए मुम्बई महानगरपालिका इन तालाबों के पानी को बोतल में बंद करके बेचने की योजना बना रही है। इसके लिए 1888 में बने म्युनिसिपल एक्ट के कुछ नियमों में फेरफार किए जा रहे हैं। लेकिन यहाँ पर कहना होगा कि यह पानी अन्य बोतलबंद पानी से आधी कीमत में बेचा जाएगा, ऐसा माना जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी हिमालय का हो, या फिर गंगा या नर्मदा का। इसका निर्माण प्रकृति ने बिना किसी भेदभाव के मानवमात्र की भलाई के लिए किया है। इस पानी पर कोई कंपनी या व्यापारी अपना मालिकाना हक जताकर उसका व्यापार नहीं कर सकता। यदि कोई इस तरह से करता है, तो इसे तो मानव विरोधी प्रवृत्ति कहा जाएगा। इस पानी का व्यापारिक उपयोग के लिए भारत सरकार को किसी भी तरह की अनुमति नहीं देनी चाहिए। प्रजा को इस तरह से पानी खरीदने के लिए मना किया जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो कई देशी-विदेशी कंपनियाँ हमारे देश की पवित्र नदियों को खरीद लिया जाएगा। इसके बाद अपनी नदी, अपना पानी होने के बाद हमें इन कंपनियों को पानी के लिए धन देना पडेग़ा। प्रकृति ने तो भारत सरकार को इस तरह से नदियों को बेचने का अधिकार नहीं दिया है, तो फिर सरकार के खिलाफ ही क्यों न आवाज बुलंद की जाए। आखिर कब तक सरकार इस तरह से देशी-विदेशी कंपनियों के हाथों की कठपुतली बनी रहेगी और गरीब जनता अपने ही देश में अपनों के हाथों छलती रहेगी?&lt;br /&gt;डॉ. महेश परिमल &lt;a href="http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com/2008/05/blog-post_12.html"&gt;http://dr-mahesh-parimal.blogspot.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-3852770525005337318?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/3852770525005337318/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=3852770525005337318' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3852770525005337318'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/3852770525005337318'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_2244.html' title='हाँ यही है पानी की हकीकत'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-5950343779152133437</id><published>2008-06-07T00:00:00.001-07:00</published><updated>2008-06-07T00:00:55.792-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बड़े बांधों से होने वाले खतरों'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पनबिजली संयंत्र'/><title type='text'>नज़रअंदाज़ किया जा रहा है बड़े बांध के खतरे को</title><content type='html'>पूर्वोत्तर भारत के राज्य अरुणाचल प्रदेश में कई पनबिजली परियोजनाओं का काम शुरू किया गया है। निपको के तत्वावधान में रंगा नदी पनबिजली संयंत्र के निर्माण का काम पूरा भी हो चुका है। पिछले दिनों अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर आए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दिबांग पनबिजली संयंत्र का शिलान्यास किया ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौरतलब है कि जब नदियों पर बड़े बांध बनाकर बिजली पैदा करने के लिए कोई संयंत्र लगाया जाता है तो हमेशा ऐसी परियोजना का विपरीत प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। बड़े बांधों का विरोध जताने वाले पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि अरुणाचल प्रदेश में भूकंप आने पर बड़े बांध व्यापक तबाही मचा सकते हैं। इतना ही नहीं, ऐसे बड़े बांधों का खामियाजा पड़ोसी राज्य असम को भी भुगतना पड़ सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असम की अधिकतर नदियां अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों से निकलकर ब्रह्मपुत्र में आकर मिलती हैं। इन नदियों के ऊपरी हिस्सों पर अरुणाचल प्रदेश में बनाए जा रहे बड़े बांधों का प्रतिकूल प्रभाव असम के मैदानी इलाकों पर पड़ सकता है और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं की आशंका प्रबल हो सकती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े बांधों का विरोध कर रहे पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि मामूली भूकंप के झटके से ही बांध में दरार आ सकती है या भूस्खलन के चलते बांध को नुकसान पहुँच सकता है। अरुणाचल प्रदेश के यजाली इलाके में निपको ने जो 405 मेगावाट का रंगा नदी पनबिजली संयंत्र लगाया है, इसका प्रतिकूल प्रभाव असम के लखीमपुर जिले के मैदानी इलाके में नजर आने लगा है। यजाली में नदी पर बांध बनाए जाने की वजह से धारा का प्रवाह अवरुद्ध हो गया है और यही वजह है कि लखीमपुर जिले में नदी सूख-सी गई है। रंगा नदी के सूख जाने से लखीमपुर जिले के ग्रामीणों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि जिले के देवबिल और आमतोला इलाकों में पानी की किल्लत होने से बांस और सुपारी के पेड़ सूखते जा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह अरुणाचल प्रदेश के गेरुवामुख इलाके में एनएचपीसी 2000 मेगावाट का लोअर सुवनशिरि पनबिजली संयंत्र लगा रहा है। लगातार लोगों के विरोध को देखते हुए फिलहाल बांध बनाने का काम स्थगित रखा गया है और जनता की शिकायतों पर ध्यान देने का आश्वासन दिया गया है। गेरुवामुख में निर्माणाधीन बांध के खतरों के बारे में ग्रीन हैरीटेज और रूरल वालंटियर कमेटी जैसे ग़ैर-सरकारी संगठन आंदोलन चलाते रहे हैं। लेकिन इस गंभीर मुद्दे के प्रति असम सरकार उदासीन बनी हुई है। इन ग़ैर-सरकारी संगठनों का कहना है कि लोअर सुवनशिरि पनबिजली परियोजना से सिर्फ बहुराष्ट्रीय कंपनियों एवं विदेशी वित्तीय एजेंसियों को ही फायदा होगा, दूसरी तरफ बड़े बांध का निर्माण पूरा होने पर असम के लखीमपुर एवं धेयाजी जिले के किसानों की खेती हमेशा के लिए तबाह हो जाएगी। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में इस बांध का खामियाजा समूचे असम को भुगतना पड़ेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पड़ोसी राज्य असम के हितों की परवाह किए बिना अरुणाचल प्रदेश सरकार कई पनबिजली परियोजनाओं को हरी झंडी दिखा चुकी है, जबकि वह जानती है कि अरुणाचल की पहाड़ियों से होकर बहने वाली नदियां असम के मैदानी इलाकों में उतरती हैं और बड़े बांध बनाए जाने के बाद असम में इन नदियों का वजूद मिट सकता है। केन्द्राrय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार अरुणाचल प्रदेश में, देश में सर्वाधिक 60 हज़ार मेगावाट बिजली उत्पादन करने की संभावना है। यही वजह है कि रिलायंस सहित कई निजी कंपनियां अरुणाचल प्रदेश के संसाधन का दोहन करने के लिए उतावली नजर आ रही हैं। अरुणाचल प्रदेश की सरकार ने निजी कंपनियों की खुशामद से खुश होकर दिबांग, दिहिंग और पारे नदियों पर पनबिजली संयंत्र की घोषणा की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरुणाचल प्रदेश सरकार ने पिछले साल एनएचपीसी के साथ एक करार पर हस्ताक्षर किया जिसके तहत एनएचपीसी दिबांग पनबिजली संयंत्र की स्थापना करेगा। इस संयंत्र से देश में सबसे अधिक 3000 मेगावाट बिजली उत्पादन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। 27 हज़ार करोड़ रुपए की इस परियोजना से उत्पादित होने वाली बिजली में राज्य सरकार की 12 फीसदी हिस्सेदारी होगी। इस परियोजना के लिए एनएचपीसी ने अरुणाचल प्रदेश सरकार को अग्रिम कर्ज़ के रूप में 14 करोड़ रुपए दिए हैं। इस राशि का इस्तेमाल अरुणाचल प्रदेश सरकार ने सहकारी बैंकों को दिवालिएपन से उबारने के लिए किया है। इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि खस्ताहाल वित्तीय स्थिति से उबरने के लिए अरुणाचल की सरकार पर्यावरण विनाश की परवाह किए बिना पनबिजली संयंत्रों को मंजूरी दे रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिबांग और पारे पनबिजली परियोजना से भी असमवासियों को काफी नुकसान पहुँच सकता है। दोनों परियोजनाओं का शिलान्यास प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने किया। प्रधानमंत्री ने अरुणाचल के लिए एक हज़ार करोड़ रुपए के विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की। इस पैकेज में बाढ़ नियंत्रण के लिए 400 करोड़ रुपए अलग से निर्धारित किए गए हैं। इसका अर्थ है कि केन्द्र को इस बात की जानकारी है कि बड़े बांधों की वजह से व्यापक तबाही की स्थिति आने वाले समय में पैदा हो सकती है। जब-तब अरुणाचल में भूस्खलन का संकट पैदा होता रहा है। वैसे भी राज्य के लिए बाढ़ कभी गंभीर समस्या नहीं रही है। बड़े बांधों के निर्माण के बाद नदियों का स्वरूप ही बदल सकता है। और असम के निवासियों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब किसी नदी पर पनबिजली संयंत्र लगाने की योजना बनाई जाती है तो विभिन्न सरकारी विभागों, एजेंसियों, मंत्रियों और पड़ोसी राज्य सरकारों से अनुमति लेनी पड़ती है। असम सरकार ने बड़े बांधों से होने वाले खतरों के संबंध में अब तक चुप्पी साध रखी है। सिर्फ ग़ैर-सरकारी संगठन इस मुद्दे को उछाल रहे हैं और उनके विरोध को नजरअंदाज करती हुई अरुणाचल सरकार पनबिजली संयंत्रों का काम तीव्रता के साथ आगे बढ़ाती जा रही है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-5950343779152133437?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/5950343779152133437/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=5950343779152133437' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5950343779152133437'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/5950343779152133437'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_07.html' title='नज़रअंदाज़ किया जा रहा है बड़े बांध के खतरे को'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-8940598866389526386</id><published>2008-06-06T23:55:00.000-07:00</published><updated>2008-06-06T23:57:51.583-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नदियां बचाने की जिम्मेदारी सरकारों पर नहीं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नदियां नहीं बचीं'/><title type='text'>सकारात्मक चिंतन</title><content type='html'>25 Feb, 2008 | 10:11 PM&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बांद्राभान में हुए अंतरराष्ट्रीय नदी महोत्सव में प्रमुख रूप से दो निष्कर्ष उभरकर सामने आए। एक- नदियां नहीं बचीं, तो मानव ही नहीं, बल्कि जीवमात्र का अस्तित्व संकट में फंस जाएगा। दो- नदियां बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकारों पर नहीं छोडी जा सकती है, बल्कि यह काम जनजागृति और जनभागीदारी से ही संभव हो सकता है। नदियों को बचाने में लगे तपस्वियों ने जो ये दो निष्कर्ष निकाले हैं, इनमें अनोखा कुछ नहीं है, न ही इन निष्कर्षों पर पहुंचने के लिए बहुत ज्यादा समझदार होने की जरूरत है। सब जानते हैं कि जल ही जीवन है और अमृत की यह बूंदें नदियों से ही मिलती हैं।&lt;br /&gt;अतः सवाल यह है कि जब देश का एक-एक नागरिक जल और नदियों के महत्व से परिचित है, तो फिर हम सब मिलकर अनुपम मिश्र और फरहाद कांट्रेक्टर जैसे लोगों से प्रेरणा क्यों नहीं लेते और क्यों नदियों को बचाने के महायज्ञ में अपनी ओर से एक आहुति नहीं होमते? कोई जरूरी नहीं कि इसके लिए नदियों की सफाई में ही भागीदारी की जाए। इसमें भागीदारी हो तो बेहतर और न हो पाए, तो कोई बात नहीं। यदि हमने अपने घर के आसपास के वर्षा के जल को सहेजने का संकल्प ले लिया और उस पर अमल भी कर लिया तो समझो कि हमारे हिस्से का काम पूरा हुआ। नदियों का संरक्षण पर्यावरण और जैव विविधता के साथ ही साथ वन संरक्षण से भी जुडा हुआ है। ऐसा नहीं हो सकता कि जंगल तो कटते चले जाएं, फिर भी नदियां सदानीरा बनी रहें। ऐसा भी संभव नहीं है कि जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों की प्रजातियां लुप्त होती रहें और इनका नदियों के जल स्तर पर कोई फर्क न पडे। इसीलिए यदि हम अपनी ओर से कुछ पेड लगाते हैं, उनकी देख-रेख करते हैं या फिर वन और वन्यजीव माफिया के खिलाफ उठ खडे होते हैं, तो यह काम भी प्रकारांतर से नदियों के संरक्षण की दिशा में उठाया गया एक कदम ही है। पॉलिथीन पर्यावरण पर एक गंभीर संकट है। इसे अगर जलाओ तो वायु प्रदूषित होती है और कहीं फेंक दो तो भी वह पर्यावरण पर संकट बनती है। इससे बचने का उपाय केवल यही है कि इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाए और सच यह है कि प्रतिबंध लगाने से भी बात नहीं बनेगी। इसके विपरीत यदि हमने पॉलिथीन का उपयोग न करने का संकल्प ले लिया और उस पर कडाई से अमल किया, तो पर्यावरण पर से एक बडा भारी संकट टल जाएगा।&lt;br /&gt;क्या हम इसके लिए तैयार हैं? यदि इस प्रश्न का उत्तर हां है, तो मान लो कि हम अप्रत्यक्ष रूप से नदियों का ही संरक्षण कर रहे हैं। इस पर अभी कोई शोध नहीं हुआ है कि नदियों को सुखाने में पॉलिथीन का कितना योगदान है, लेकिन बरसात के मौसम में ऐसे शहरों में भी जो बाढ आती है, जहां न नदियां हैं, न नाले, उसमें पॉलिथीन का योगदान अब जगजाहिर है। कुल मिलाकर पर्यावरण संरक्षण का कार्य जनभागीदारी के बिना संभव नहीं है। यह ठीक है कि फैक्ट्रियों, कारखानों का जो गंदा पानी नदियों को प्रदूषित कर रहा है, उसे रोकने में सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, लेकिन सरकारें ऐसा पर्यावरण हितैषी निर्णय भी तभी लेंगी, जब उन पर जन दबाव होगा और उन्हें अपनी सत्ता खतरे में पडी दिखेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-8940598866389526386?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/8940598866389526386/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=8940598866389526386' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8940598866389526386'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/8940598866389526386'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_1796.html' title='सकारात्मक चिंतन'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-6803439845194281305</id><published>2008-06-06T23:48:00.001-07:00</published><updated>2008-06-06T23:48:53.686-07:00</updated><title type='text'>पंजाब में नदियों की सफाई के लिए जापान देगा फंड</title><content type='html'>बीएस संवाददाता / चंडीगढ़  &lt;br /&gt;पंजाब में नदियों की सफाई के लिए अब जापान से फंड आएगा। जापान ने यहां की नदियों को साफ-सुथरा करने का जिम्मा लिया है और इसके लिए वह भी फंड मुहैया करेगा।  &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;यह उम्मीद जताई जा रही है कि इस प्रस्तावित परियोजना को अगले तीन साल में पूरा कर लिया जाएगा। इस परियोजना के मद्देनजर जापान इंटरनेशनल कॉर्पोरेशन एजेंसी (जेआईसीए) के परियोजना परामर्शदाता कमता हिरोको ने पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से मुलाकात की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैठक के दौरान जेआईसीए के परियोजना परामर्शदाता ने अपनी बात रखते हुए कहा कि इस परियोजना के कार्यान्वयन के लिए पंजाब सरकार के अधिकारियों, पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जेआईसीए के विशेषज्ञों की एक संयुक्त टीम बनाई जाएगी।मुख्यमंत्री के मीडिया परामर्शदाता हरिचरण ने बताया, 'इस परियोजना के लिए जापान सरकार फंड मुहैया कराएगी। इस परियोजना को अप्रैल 2009 से शुरू किया जाएगा और अगले तीन साल में इसे मूर्त रूप दे दिया जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह देश की अपनी तरह की पहली परियोजना होगी। पंजाब की नदियों में गंदे पानी की वजह से लोगों के लिए स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं काफी बढ़ गई है और नदी का गंदा पानी यहां के  खेतों की उर्वरता को भी नष्ट कर रहा है। अब क्योंकि जेआईसीए और जापान सरकार यहां की नदियों की सफाई के लिए पहल कर रही है, इससे राज्य सरकार के लिए उम्मीद की किरण दिखाई दी  है। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://hindi.business-standard.com/hin/storypage.php?autono=3746"&gt;http://hindi.business-standard.com&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8032054811370849753-6803439845194281305?l=watercampaign.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://watercampaign.blogspot.com/feeds/6803439845194281305/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8032054811370849753&amp;postID=6803439845194281305' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/6803439845194281305'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8032054811370849753/posts/default/6803439845194281305'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://watercampaign.blogspot.com/2008/06/blog-post_7473.html' title='पंजाब में नदियों की सफाई के लिए जापान देगा फंड'/><author><name>Water Community</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_T-PEMSmKo3Q/SAhXKHeP2fI/AAAAAAAAAMk/aHHRIzYVhio/S220/minakshi+image.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8032054811370849753.post-5936557000393571395</id><published>2008-06-06T23:02:00.000-07:00</published><updated>2008-06-06T23:07:35.863-07:00</updated><title type='text'>हमारी नदियों पर मंडराता खतरा</title><content type='html'>नदियां अब अविरल नहीं बहतीं। एक समय था जब लोगों को नदियों पर भरोसा था कि वह अपने मार्ग से विचलित नहीं होगी और गंतव्य पर जरूर पहुंचेगी। लेकिन यह लोगों की करतूतों का ही नतीजा है कि दुनिया की सबसे महान नदियां तक सुरक्षित समुद्र में मिल सकेंगी इसका कोई भरोसा नहीं है। अमेरिका और मैक्सिको की सीमाओं पर बह रही रियो ग्रेन्डे नदी अक्सर मैक्सिको की खाड़ी तक पहुंचने से पहले सूख जा रही है। और ऐसा संकट झेल रही यह अकेली बड़ी नदी नहीं है। हाल यह है कि भारत की सर्वाधिक धार्मिक महत्व वाली गंगा जिसे हमने मां का दर्जा दिया हुआ है और सिंधु जो नदियों के पिता माने जाते हैं समेत नील, मरे डार्लिंग व कोलाराडो 10 बड़ी नदियां बांधों, सिंचाई व शहरों की प्यास बुझाने की तमाम योजनाओं के चलते सूखने की कगार पर हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;10 प्रमुख नदियां:&lt;/strong&gt;नदी लंबाई (किमी) प्रभावित आबादी संबंधित देश &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सालवीन&lt;/strong&gt;- 2800 60 लाख चीन, म्यामांर, थाइलैंड&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दानुबी&lt;/strong&gt; 2780 81 क़रोड़ रोमानिया समेत 19 देश&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ला प्लाटा&lt;/strong&gt; 3740 10 करोड़ ब्राजील, अर्जेंटीना, पेरुग्वे&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रियो ग्रेन्ड&lt;/strong&gt;, रियो ब्रेवो 3033 1 करोड़ अमेरिका, मैक्सिको&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;गंगा &lt;/strong&gt;2507 20 करोड़ नेपाल, भारत, चीन, बांग्लादेश&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सिंधु&lt;/strong&gt; 2900 17 करोड़ भारत, चीन, पाकिस्तान&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नील &lt;/strong&gt;लेक विक्टोरिया 6695 36 करोड़ 10 देश&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मुरे डार्लिंग&lt;/strong&gt; 3370 20 लाख आस्ट्रेलिया&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;म्कांग लेनसंग&lt;/strong&gt; 4600 57 क़रोड़ चीन, म्यामांर, थाइलैंड, कंबोडिया&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यांग्त्से &lt;/strong&gt;6300 43 करोड़ चीन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रिपोर्ट:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह रिपोर्ट विश्‍व प्रकृति निधि ने तैयार की है। इसके लिए आठ अंतरराष्‍ट्रीय सर्वेक्षण रपटों के नतीजों का अध्ययन किया गया। दो हजार से अधिक लेखकों, शोधकर्ताओं व समीक्षकों की रपटों के आधार पर 225 नदी घाटियों के लिए सर्वाधिक अहम 6 खतरों पर ध्यान केंद्रित किया गया।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मुख्य बिंदु: &lt;/strong&gt;- आज नदियों के किनारे रहने वाली आबादी का 41 फीसदी हिस्सा संकट में है; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- बीते 50 सालों में मानव ने नदियों व उससे जुड़ी पारिस्थितिकीय को जितना नुकसान पहुंचाया है उतना अब तक इतनी अवधि में कभी भी नहीं पहुंचाया गया।&lt;br /&gt;- दुनिया की 10 हजार ताजे पानी की जीवों व वनस्पतियों की प्रजातियों में से 20 फीसदी नष्‍ट हो चुकी हैं। - दुनिया की 177 बड़ी नदियों में से महज 21 (12 फीसदी) समुद्र तक बिना बाधा के बह पा रही हैं। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ये हैं प्रमुख खतरे और उनके समाधान&lt;/strong&gt;1- अत्यधिक दोहन: कृषि व घरेलू उपयोगों के लिए नदियों के पानी के अत्यधिक दोहन से यह खतरा हो गया है कि रियो ग्रेन्डे तथा गंगा नदियों पूरी तरह सूख सकती हैं;&lt;br /&gt;2- बांध व ढांचागत निर्माण: नदियों पर बांध व अन्य ढांचागत निर्माण के चलते सालवीन, ला प्लाटा तथा दानुबी नदियों पर संकट आ खड़ा हुआ है।&lt;br /&gt;3- आक्रामक प्रजातियां: कई तरह की आक्रामक प्रजातियों के चलते मुरे डार्लिंग नदी की पारिस्थतिकी संकट में जलवाय परिवर्तन – जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले तामपान बढ़ोतरी ने सिंधु व उसके प्रभाव क्षेत्र की अन्‍य हिमालयी नदियों के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। इसके चलते नील लेक विक्‍टोरिया के लिए मछली उत्‍पादन तथा जल आपूर्ति में गंभीर संकट की स्थिति है। &lt;br /&gt;4- अत्यधिक मछली आखेट: मछली के शिकार में बेतरतीब बढ़ोतरी, मछली के अधिकारों का असंतुलित बंटवारा तथा मछलियों के अत्यधिक सेवन से मेकांग जैसी नदियों व उनके पारिस्थितिकीय पर गंभीर असर पड़ा है। प्रदूषण: चीन की यांग्त्से नदी व उसकी पूरी घाटी भारी औद्योगीकरण, बांध व गाद के कारण प्रदूषण की चपेट में है। यह दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदी मानी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;समाधान:&lt;/strong&gt; प्राकृतिक बहाव सुनिश्चित करना, जल आवंटन व अधिकारों को बेहतर करना, जल उपयोग की क्षमता बढ़ाना, जल सेवाओं का भुगतान तय करना, कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहन, ऐसी कृषि सब्सिडी खत्म करना जिनसे अत्यधिक जल दोहन वाली खेती होती हो, ढांचागत निर्माण का विकल्प तलाशना, बांधों का आकार छोटा रखना, तकनीकी बदलाव, जंगलों में बढ़ोतरी, नदियों, तालाबो व अन्य जल क्षेत्रों का संरक्षण, पारिस्थितिकी को बेहतर करने के उपायों से ही जैव विविधता पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन के असर को कम किया जा सकेगा। लेकिन ये तमाम समाधान तब तक प्रभावी नहीं होंगे जब तक सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक सीमाओं से परे जाकर सहभागी रवैया नहीं अपनाया जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कैसे हैं पिता सिंधु के हाल: &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय प्रायद्वीप की सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान मानी जाने वाली सिंधु तिब्बत में मानसरोवर से शुरू होती है और 3200 किमी का सफर तय कर कश्‍मीर व पाकिस्तान से होते हुए कराची के पास अरब सागर में समा जाती है। इसका बेसिन क्षेत्र करीब 11 लाख 65 हजार वर्ग किमी में फैला हुआ है। पाकिस्तान की जीवन रेखा मानी जाने वाली यह नदी अपनी सहायक नदियों मसलन चेनाब, रावी, सतलुज, झेलम व ब्यास के साथ पंजाब, हरियाणा व हिमाचल के लिए बेहद अहम भूमिका निभाती है। पहले सरस्वती भी इनमें शामिल थी और तब सिंधु को सप्तसिंधु कहा जाता था। माना जाता है कि प्राचीन काल में सिंधु कच्छ के रण में भी बहती थी। इसके किनारों पर अब तक 1052 शहरों की खोज की जा चुकी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विशेषताएं:&lt;/strong&gt;- सिंधु का अनुमानित वार्षिक बहाव 207 घन किमी माना जाता है; इसका बेसिन वि6व में सर्वाधिक सूखा माना जाता है। सिंधु व इसकी ज्यादातर सहायक नदियां काराकोरम, हिंदु कुश तथा तिब्बत, कश्‍मीर व पाकिस्तान के उत्तरी भागों के ग्लेशियरों पर आधारित हैं। - सिकंदर के आक्रमण के समय सिंधु घाटी में घने जंगल हुआ करते थे, लेकिन सभ्यता के विकास के साथ-साथ जंगलों का तेजी से विनाश हो गया; आज शिवालिक पहाड़ियों पर हो रहा अतिक्रमण इसकी ताजा मिसाल है। सिंधु की बेसिन में मौजूद मूल जंगलों का 90 फीसदी हिस्सा खत्म हो चुका है जो जलवायु परिवर्तन तथा पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने में सहायक हो सकता था – खास तरह की डाल्‍िफन की प्रजातियां व हिल्‍स समेत कई स्‍वादिष्‍ट मछलियां भी सिंधु में मिलती हैं।‍&lt;br /&gt;- हजारों साल पहले सिंधु के पानी के इस्तेमाल के लिए नहर बनाने का सिलसिला शुरू हो गया था। भारत-पाक बंटवारे के बाद 1960 में हुई जल बंटवारा संधि के मुताबिक पाकिस्तान को नि6चित पानी देने के लिए दो बांध बनाए गए। पहला झेलम पर मंगला बांध तथा दूसरा सिंधु पर तरबेला बांध। इस संधि के मुताबिक सतलुज, ब्यास व रावी पर भारत का नियंत्रण माना गया जबकि झेलम, चिनाब व सिंधु पर पाकिस्तान का।&lt;br /&gt;- सिंधु में 147 मछलियों की प्रजातियों के अलावा 25 जलीय जीव मिलते हैं।&lt;br /&gt;- जलवायु परिवर्तन, पानी के बढ़ते इस्तमाल व घटती मात्रा के भारत-पाक के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है; साथ ही हरियाणा, पंजाब व राजस्थान के बीच भी जल बंटवारे को लेकर तनाव की स्थिति बनी रहती है।&lt;br /&gt;विवाद - जम्मू कश्‍मीर में पाक सीमा के पास डोडा जिले में चिनाब नदी पर बनने वाले बगलिहार बांध से भारत-पाक रिश्‍तों में कड़वाहट आ गई है। यह राज्य में बनने वाले 11 बांधों में से एक है, इनमें से 9 चिनाब पर बनने वाले हैं; निश्चित ही इससे न केवल नदी के बहाव पर फर्क पड़ेगा बल्कि उसकी समूची नदी घाटी संरचना प्रभावित होगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;खतरा:&lt;/strong&gt; हिमालय के ग्लैशियर पर निर्भरता के कारण सिंधु व इसकी सहायक नदियों पर जलवायु परिवर्तन का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। तापमान में बढ़ोतरी के चलते आने वाले वर्षों में कई ऐसे बड़े ग्लेशियर विलुप्त हो जाएंगे जो सिंधु व सहायक नदियों को 70 से 80 फीसदी पानी की आपूर्ति करते हैं। इसके चलते हरियाणा, पंजाब, हिमाचल व पाकिस्तान के बड़े हिस्से में पानी का गंभीर संकट हो जाएगा। - पंजाब, हरियाणा के बेसिन में पानी के अत्यधिक दोहन के चलते पहले ही स्थिति गंभीर हो चुकी है। कई जिलों में पानी की क्षारीयता खतरे के स्तर पर पहुंच चुकी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;और ये है हाल गंगा मां का : &lt;/strong&gt;मध्य हिमालय ने निकलकर नेपाल, भारत, चीन व बांग्लादेश होते हुए 2507 किमी का सफर तय कर बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इसका धार्मिक, आर्थिक व सांस्कृतिक महत्व काफी ज्यादा है। माना जाता है कि दुनिया की 8 फीसदी आबादी इसके जलग्रहण क्षेत्र में बसती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विशेषताएं - मछलियों की 140 प्रजातियां&lt;br /&gt;- मीठे पानी में पाई जाने वाली डाल्फिन&lt;br /&gt;- 35 सरीसृप तथा 42 स्तनधारी प्रजातियां&lt;br /&gt;- गंगा व ब्रह्मपुत्र का जलग्रहण क्षेत्र संयुक्त तौर पर दुनिया का सबसे बड़ा जैव विविधता वाला क्षेत्र है।&lt;br /&gt;खतरा: - गंगा व उसकी सहायक नदियों का अमूमन 60 फीसदी पानी कृषि संबंधी कामों के लिए इस्तेमाल किया जाता है।&lt;br /&gt;- बांग्लादेश सीमा से महज 18 किमी दूर बने फरक्का बैराज से गंगा में पानी में मासिक बहाव 2213 घनमीटरसेकंड से घटकर 316 घनमीटरसेकंड हो गया है।&lt;br /&gt;- टिहरी बांध से सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी के अलावा 270 मिलियन गैलन पानी हर दिन पेयजल के रूप में इस्तेमाल होता है। &lt;br /&gt;- अत्यधिक जल दोहन से गंगा में रहने वाली मछलियों क 109 प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर हैं।&lt;br /&gt;- नदी जोड़ परियोजना में गंगा के शामिल होने से आने वाले समय में इसका पानी और कम होने की आशंका है।&lt;br /&gt;- हिमालय के ग्लेशियर ग
